तीन तलाक को राजनीतिक चश्में से न देखें

By Independent Mail | Last Updated: Jan 11 2019 8:52PM
तीन तलाक को राजनीतिक चश्में से न देखें
  • गौतम चौधरी

इन दिनों तलाक पर बवाल मचा हुआ है। मोदी सरकार तीन तलाक पर विधेयक ले आई है। सरकार ने इसे लोकसभा में बहुमत से पास भी करा लिया है और अब यह उच्च सदन में है। संसद के निचले सदन में सत्ता और विपक्ष में इस मामले को लेकर तीखी नोक-झोंक हुई, लेकिन सरकार के पास बहुमत होने के कारण विधेयक पास हो गया। अब उच्च सदन में विधेयक पास होना है, हालांकि वहां पास होना उतना आसान नहीं है, जितना आसान निम्न सदन में था। राज्यसभा में सरकार के पास बहुमत की कमी है और उसके सहयोगी दल भी उसके साथ नहीं हैं। इस विधेयक को लेकर सरकार की मंशा पर सवाल खड़े किए जा रहे हैं। सवालों का खड़ा होना स्वाभाविक है। यह देश के लगभग 26 करोड़ मुसलमानों का मसला है। मुस्लिम नेताओं का कहना है कि देश में जम्हूरियत है। संविधान कहता है कि भारत में प्रचलित किसी जाति, धर्म, संप्रदाय की परंपराओं के साथ छेड़छाड़ न की जाए, लेकिन सरकार मुस्लिम परंपराओं पर प्रहार कर रही है, जो भारतीय संविधान की मूल प्रकृति के खिलाफ है। तीन तलाक के मामले में मुसलमानों के पास इसके अलावा और कोई तर्क नहीं है। मुस्लिम विद्वान इस मामले में बहस से बचते हैं। उनका सीधा आरोप है कि सरकार मुसलमानों के खिलाफ है, इसलिए वह मुस्लिम परंपराओं पर प्रहार कर रही है। कुल मिलाकर यह तर्क अपने स्थान पर सही हो सकता है, लेकिन इस परंपरा के कारण जिन मुस्लिम औरतों के साथ अन्याय हो रहा है, उनके बारे में मुस्लिम विद्वान और नेता मौन साध लेते हैं।

इस्लाम का आधार कुरान-ए-पाक है। मुस्लिम विद्वान बताते हैं कि कुरान-ए-पाक में तलाक तीन महीने में देने का विधान है, लेकिन कोई मर्द अपनी औरत को एक साथ तीन तलाक दे देता है, तो वह भी मान्य होगा। अब सवाल यह उठता है कि कुरान-ए-पाक में जब तीन महीने में तलाक का विधान है, तो फिर इकट्ठे तीन तलाक की परिपाटी कब प्रारंभ हुई और क्यों प्रारंभ हुई, इस पर भी विद्वान मौन साध लेते हैं। इस्लाम में जो कायदे दर्ज किए गए हैं, वे बहुत हद तक जायज हैं, लेकिन बाद के कालखंड में मर्दवादी लोगों ने औरतों पर अपनी सत्ता स्थापित करने के लिए इस प्रकार के कानून जोड़ दिए होंगे। इस्लाम के मूल में तलाक की प्रक्रिया आसान नहीं थी, लेकिन ऐसा लगता है कि मूल प्रकृति के साथ कालांतर में जरूर छेड़छाड़ की गई होगी। इसका उदाहरण हम हिन्दुओं के धर्मग्रंथों में भी देखते हैं। अवसरवादी और स्वार्थी तत्व सत्ता के सहयोग से समाज को संचालित करने वाले धार्मिक ग्रंथों में छेड़छाड़ करते हैं। हालांकि, मुसलमान नेताओं का यह कहना भी जायज है कि उनकी परंपराओं में छेड़छाड़ न की जाए, लेकिन जब परंपरा राष्ट्र की मर्यादाओं को तिरोहित करने लगे, तो सत्ता का हस्तक्षेप जरूरी हो जाता है। वर्तमान सरकार की मंशा चाहे जो हो, लेकिन मुसलमानों की यह परंपरा देश के संविधान के खिलाफ है। मुस्लिम नेता इस बात को लेकर भी मौन साध लेते हैं कि आखिर तलाक के वर्तमान स्वरूप को दुनिया के प्रभावशाली मुस्लिम देशों ने क्यों नकार दिया? पाकिस्तान में तीन तलाक के वर्तमान स्वरूप में संशोधन किया जा चुका है। वर्तमान सत्ता पक्ष के लोगों का तर्क है कि तलाक की वर्तमान प्रक्रिया कालांतर में देश की अखंडता पर चोट कर सकती है। यह तर्क भी अपने आप में महत्वपूर्ण है। आज जिस प्रकार इस विधेयक का विरोध हो रहा है, उससे तो साफ लगने लगा है कि आने वाले समय में ऐसी बहुत सी परंपराएं देश के संविधान पर प्रहार करेंगी और तब संविधान को मौन रहना पड़ेगा। यह देश की अखंडता पर चोट करेगा। ऐसे में देश चलाने वालों को इसकी चिंता जरूर करनी चाहिए। यहां शाहबानो प्रकरण का जिक्र करना जरूरी है। एक 62 वर्षीय मुसलमान महिला, पांच बच्चों की मां को 1978 में उसके पति ने तालाक दे दिया। अपनी और अपने बच्चों की जीविका का कोई साधन न होने के कारण शाहबानो पति से गुजारा लेने के लिए अदालत पहुची। मामला उच्चतम न्यायालय तक पहुंचते-पहुंचते सात साल बीत गए। उसे न्याय मिला भी। सर्वोच्च न्यायालय ने निर्देश दिया कि शाहबानो को निर्वाह-व्यय के समान जीविका दी जाए। इस निर्णय को मुस्लिम नेताओं ने इस्लाम पर प्रहार बता दिया और वे इस निर्णय को मुस्लिम विरोधी कहकर प्रचारित करने लगे।

इस मामले को लेकर 1986 में कांग्रेस के नेतृत्व वाली राजीव गांधी की सरकार ने एक कानून पास किया, जिसने शाहबानो मामले में उच्चतम न्यायालय के निर्णय को पलट दिया। इस कानून के अनुसार वह आवेदन जो किसी तलाकशुदा महिला के द्वारा अपराध दंड संहिता 1973 की धारा-125 के अंतर्गत किसी न्यायालय में इस कानून के लागू होते समय विचाराधीन है, अब इस कानून के अंतर्गत निपटाया जाएगा। निःसंदेह राजीव सरकार के द्वारा लाया गया कानून संविधान की मूल प्रकृति के खिलाफ था, जिसे देश के हित के लिए नहीं एक खास धार्मिक समूह के हित के लिए लाया गया था। इस प्रकार यदि हर साम्प्रदायिक, सांस्कृतिक समूह यह मांग करने लगे, तो देश की अखंडता खतरे में पड़ सकती है। इसलिए इस देश को एक व्यवस्थित और प्रभावी समान नागरिक संहिता की भी जरूरत है।

रही बात परंपराओं पर चोट करने की, तो इस देश में केवल मुस्लिम परंपराओं पर ही चोट नहीं की जा रही है। इससे पहले हिन्दुओं के विवाह एक्ट में भी व्यापक संसोधन किया जा चुका है। हिन्दुओं में बेटी को पिता की संपत्ति में हक का विधान नहीं है, लेकिन इस परंपरा को तोड़ा गया और बाकायदा कानून बना दिया गया। इसलिए यह तर्क देना कि भारत सरकार केवल मुस्लिम विरोध के कारण तीन तलाक पर कानून बनाना चाहती है, सरासर गलत है। इस मामले में मोदी सरकार को मुस्लिम विद्वानों का सहारा लेना चाहिए था। भारत के ज्यादातर मुस्लिम संगठन इस परंपरा के खिलाफ हैं, लेकिन सरकार अपने राजनीतिक फायदे को लेकर जल्दबाजी में दिख रही है। मुस्लिम संगठन और विद्वानों को विश्वास में लेकर इस प्रक्रिया को यदि आगे बढ़ाया जाता, तो ज्यादा ठीक रहता। यदि राज्यसभा में यह विधेयक पारित नहीं हुआ, तो इसके लिए विपक्ष से ज्यादा सरकार दोषी होगी, क्योंकि वह मन से विधेयक को पारित कराने की कोशिश करती, तो यह पास हो सकता है। इस विधेयक में भी सरकार अपना राजनीतिक नफा-नुकसान देख रही है। उसे यह लग रहा है कि विधेयक पास हो गया, तो भी उसे फायदा है और पास नहीं हुआ तो भी। सरकार केवल बहुसंख्यक वोट बैंक की राजनीति को साधने के लिए ऐसा कर रही है। इस मामले में विपक्ष की राजनीति भी बेहद नकारात्मक है। यह मसला केवल राजनीति का नहीं है। यह देश और संविधान की मार्यादा का ममला है। विपक्ष भी इस मामले को लेकर राजनीति कर रहा है। उसे मुस्लिम वोट बैंक की राजनीति करनी है। विपक्ष को अपने अड़ियल रुख को बदलना चाहिए। यदि इस मामले में वह सकारात्मक भूमिका नहीं निभाएगा, तो आसन्न लोकसभा चुनाव में उसे घाटा भी हो सकता है।

  • वरिष्ठ पत्रकार

 

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