नागरिकता विधेयक पर बवाल स्वाभाविक

By Independent Mail | Last Updated: Jan 10 2019 4:03PM
नागरिकता विधेयक पर बवाल स्वाभाविक

सुबीर भौमिक

लोकसभा में नागरिकता (संशोधन) विधेयक- 2019 के पारित होने से पूर्वोत्तर भारत में उथल-पुथल के एक नए चरण की शुरुआत हो गई है। असम गण परिषद (एजीपी) ने बिल के विरोध में भाजपा से गठबंधन तोड़ लिया है और मेघालय, नगालैंड एवं मिजोरम में अन्य क्षेत्रीय दलों ने भी, जिन्होंने भाजपा के समर्थन से सरकार बनाई है, इस बिल का तीखा विरोध किया है। उन्हें भय है कि यह विधेयक, जो धार्मिक उत्पीड़न से बचने के लिए बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान से भागकर आए गैर-मुस्लिम प्रवासियों को भारतीय नागरिकता प्रदान करना चाहता है, उससे उनके राज्य में बांग्लादेश से आए बंगाली हिंदुओं और बौद्धों को भी वैधता मिल जाएगी। विधेयक का विरोध भाजपा के भीतर भी हुआ है। उसके प्रवक्ता मेहदी आलम बोरा ने इस विधेयक के विरोध में पार्टी से इस्तीफा दे दिया है। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस ने भी इस विधेयक का विरोध किया है। उनका तर्क है कि भारतीय संविधान के तहत धर्म के द्वारा किसी की नागरिकता निर्धारित नहीं की जा सकती। दोनों पार्टियों को डर है कि इससे पश्चिम बंगाल और पूर्वोत्तर के राज्यों में बंगाली हिंदुओं के बीच भाजपा की स्थिति मजबूत होगी और मुसलमानों के लिए असहज स्थिति पैदा हो जाएगी, खासकर पूर्वी बांग्ला मूल के लोगों के लिए, जिनकी आबादी अच्छी-खासी है। असम में सत्तारूढ़ भाजपा, जिसके एक मंत्री हेमंत बिस्व शर्मा ने यह कहकर बिल को उचित ठहराया है कि 18 सीटों (विधानसभा की) को जिन्ना (इसे मुस्लिम पढ़ें) के हाथों में जाने से रोकने का यही एक मात्र उपाय है। ऐसा करने का मतलब असम में छह अन्य पिछड़ा वर्ग समुदायों (ओबीसी)-चाय जनजाति-आदिवासी, ताई-अहोम, चुटिया, मोरन, मोटोक और कोच-राजबोंगशी की स्थिति अनुसूचित जनजातियों (एसटी) जैसी हो जाएगी। मोदी सरकार ने इसका वादा किया था। भाजपा को लगता है कि इस कदम से स्वदेशी समुदायों के एक बड़े हिस्से के बीच खोई जमीन वापस पाने में मदद मिलेगी। 2011 की जनगणना के अनुसार, असम में लगभग 40 लाख आदिवासी हैं, जो राज्य की 3.1 करोड़ आबादी का 13 प्रतिशत हिस्सा हैं। जब इन छह ओबीसी को एसटी का दर्जा दे दिया जाएगा, तो राज्य में एसटी की आबादी बढ़कर कुल आबादी का 54 फीसद हो जाने की संभावना है। हालांकि, अभी एसटी के रूप में जो समुदाय सूचीबद्ध हैं, वे केंद्र के इस फैसले को सहजता से नहीं ले रहे हैं, लेकिन भाजपा को उम्मीद है कि ये समुदाय उसके फैसले का जबर्दस्त स्वागत करेंगे। इन छह समुदायों की 49 फीसद आबादी ने एसटी का दर्जा पाने के लिए भाजपा को वोट दिया था। इसने मुख्यरूप से कांग्रेस के वोट बैंक में सेंध लगाई, खासकर चाय जनजातियों में, जो छोटानागपुर मूल की हैं। 2011 के असम चुनाव के दौरान यह संख्या 33 फीसद थी। एसटी का दर्जा देने से इन समुदायों में भाजपा का वोट शेयर ज्यादा नहीं, तो दोगुना हो सकता है, ऐसा पार्टी के प्रबंधक बिस्व शर्मा मानते हैं। भाजपा असम की आशंकाओं को यह कहते हुए शांत करने की कोशिश कर रही है कि इसके लागू होने का मतलब होगा कि 126 सीटों वाली राज्य विधानसभा में आदिवासियों के लिए आरक्षित विधानसभा सीटों की संख्या में वृद्धि होगी। यहां तक कि अगर यह 50 प्रतिशत का आंकड़ा पार नहीं करता है, तो यह निश्चित रूप से 40 प्रतिशत से अधिक होगा। जातीय असमियों के वर्चस्व वाली सामान्य सीटों को भी इसमें जोड़ दें, तो भाजपा को उम्मीद है कि इससे राजनीतिक ताकत हमेशा स्वदेशी समूहों के पास रहेगी। यह न केवल हिंदुओं को एकजुट करेगा, नागरिकता बिल से बंगाली हिंदुओं (जो असम की आबादी में करीब 12 फीसद हैं) को निष्ठावान वोट बैंक में बदला देगा। मुसलमानों को सत्ता से बाहर रखना और उन्हें किंग मेकर की भूमिका से अपदस्थ करना, मेहनती कार्यबल की हैसियत प्रदान करना और राजनीतिक ढांचे में उनका प्रभाव खत्म करना भी इससे संभव होगा। भाजपा नेताओं का कहना है कि नए आरक्षित निर्वाचन क्षेत्र में बांग्ला भाषी मुसलमानों के वोट घट जाएंगे। लेकिन यह कदम असमिया समाज को एसटी और गैर-एसटी क्षेत्रों में विभाजित करेगा और असमिया राष्ट्रीयता के गठन की प्रक्रिया को बाधित करेगा। अगर एनआरसी बहिष्कार और नागरिकता बिल से परेशान ब्रह्मपुत्र घाटी के बंगाली मूल के मुसलमान 2021 की जनगणना में अपनी मातृभाषा बंगाली बताते हैं, तो राज्य में असमिया बोलने वालों की तुलना में बंगाली बोलने वाले अधिक होंगे। इस तरह असम की जातीय-धार्मिक बिसात में इतने जोखिम हैं कि एक गलत चाल से पूरा खेल बिगड़ सकता है। मगर सरकार ने पांसा फेंक दिया है और उससे पूर्वोत्तर में जो जिन्न पैदा हो गया है, देखना है कि भाजपा उसको कैसे शांत करती है। अगर उसके पांसे उल्टे पड़ जाएं तो हमें आश्चर्य नहीं हाेना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार

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