करतारपुर कॉरिडोर के बहाने कूटनीति

By Independent Mail | Last Updated: Nov 30 2018 10:06PM
करतारपुर कॉरिडोर के बहाने कूटनीति

पुष्परंजन, संपादक, ईयू-एशिया न्यूज

हर क्रिया की प्रतिक्रिया देने में पाकिस्तान देर नहीं करता। सार्क सम्मेलन में शामिल होने के प्रस्ताव को ठुकराए जाने के बाद पाकिस्तानी अखबार द डॉन ने 'भारत का कट्टरवादी रुख' शीर्षक से संपादकीय लिखा है। इसमें एक ही राग है कि पाकिस्तान, 'पीपुल टू पीपुल कॉन्टेक्ट' की राह पर है, मगर भारत में जिस पार्टी का शासन है, उसका रुख नरम नहीं है। सत्तारूढ़ दल, भारत सरकार के हर फैसले पर सवार है। अखबार ने अपने संपादकीय में उस आतंकवाद की एक लाइन भी चर्चा नहीं की है, जो इस इनकार की वजह है। उसे बस इसरार की उम्मीद थी।

इमरान खान के सौ दिन पूरे होने के मौके पर पाकिस्तान का एक दूसरे प्रमुख दैनिक 'द न्यूज' ने वजीर-ए-आजम द्वारा किए गए संकल्पों से पलट जाने के पचास उदाहरण गिनाए हैं। पचासवें नंबर पर अखबार ने याद दिलाया कि चुनाव के समय नरेंद्र मोदी से कड़ाई से निपटने का अहद इमरान खान ने किया था। मगर वह हैं कि अब शांति प्रस्तावों के जरिये घुटने टेके जा रहे हैं। हालांकि, भारत-पाक संबंधों की जिस राह पर अग्रसर चलने की कोशिश सौ दिनों में हुई है, उसमें पाक सेना की सहमति भी रही है। इमरान खान जब करतारपुर में यह कहते हैं कि सरकार और सेना एक ही 'पेज' पर हैं, तो बात समझ में आ जाती है कि किस रणनीति की ओर पाक का नया निजाम अग्रसर है। जब इमरान ने गद्दी संभाली, तब पाकिस्तान के पास पैसे नहीं थे। पीएमओ की कारें बिक गईं। भैंसें तक नीलाम हो गईं। ताज्जुब है कि खजाना खाली है, लेकिन सरकार रावी नदी पर 800 मीटर लंबा पुल, साढ़े चार किलोमीटर लंबी सड़क, बॉर्डर से लगी 300 मीटर की ट्रैक, दस हजार दर्शनार्थियों के रुकने के वास्ते गेस्ट हाउस, पार्किंग, अस्पताल, दुकानें बनाएगी। सब कुछ नवंबर, 2019 तक तैयार करने का लक्ष्य निर्धारित कर लिया गया है। सरकार के पास पैसा अचानक कहां से आ गया? यह पैसा कौन लोग दे रहे हैं? यह ब्रिटेन से मिल रहा है या कनाडा से? सोर्स का पता चले, तो मकसद का भी खुलासा हो जाएगा। यह तो जानी-मानी बात है कि जिन लोगों में सिख पंथ के प्रति अगाध श्रद्धा है, वे दान के वास्ते सबसे आगे रहे होंगे।

करतारपुर साहिब के वास्ते संगे बुनियाद समारोह के पहले लाहौर में खालिस्तान के बैनर, उसके समर्थन में नारे को इमरान सरकार चाहती तो रोक देती। पाक सेना प्रमुख जनरल कमर जावेद बाजवा खालिस्तान समर्थक नेता गोपाल चावला से मिलने से परहेज कर सकते थे। समारोह स्थल पर चावला के साथ मुलाकात की तस्वीरें किनके लिए वायरल की गईं? जाहिर-सी बात है, कनाडा-ब्रिटेन में अलगाववाद के सपने पाले जो लोग बैठे हैं, उनसे भी धन उगाही व छिपे एजेंडे के वास्ते इस तरह की तस्वीरें काम में आती हैं। शायद, ऐसी ही तस्वीरें मोदी समर्थक मीडिया के भड़कने का सबब बनीं। ऐसे में सार्क का न्योता स्वीकार करने का मतलब था, 2019 के वास्ते विपक्ष की झोली में एक विवादित विषय डाल देना। सरकार को सिख वोट बैंक भी दिख रहा था, जिसके सरमाएदार नवजोत सिंह सिद्धू न बन जाएं, उसे भी रोकना था। मगर जिस तरह से सरकार के दो मंत्री हरसिमरत कौर बादल और हरदीप पुरी करतारपुर में उपेक्षित से रहे, वह भी विदेश मंत्रालय के लिए खलिस का एक कारण तो बन ही रहा था। बुधवार का पूरा दिन पंजाब में सिख वोट बैंक की सियासत करने वालों के लिए क्रेडिट लेने की होड़ में गुजर गया।

मगर क्या करतारपुर के सवाल पर केंद्र सरकार कुछ अजीब-सी कन्फ्यूजन वाली स्थिति में नहीं रही है? मई, 2017 में मोदी सरकार की पार्लियामेंट्री स्टैंडिंग कमेटी ने यह फैसला लिया कि करतारपुर तक हम पुल या गलियारा नहीं बनाएंगे, बल्कि सीमा पर दूरबीन फिट करा देते हैं, जहां से श्रद्धालु दर्शन कर लिया करेंगे। ऐसा किया भी। इस फैसले का कारण घुसपैठ को रोकना और कहीं न कहीं खालिस्तान की जड़ें पनपने से रोकना भी था। मगर यही सरकार डेढ़ साल बाद कॉरिडोर के वास्ते तैयार हो जाए, तो सवाल पूछने वाले कहां चूकेंगे?

पाकिस्तान में प्राचीन गुरुद्वारे कई सारे हैं। मगर दुनियाभर के सिखों के लिए दो गुरुद्वारे सर्वाधिक रूप से महत्वपूर्ण हैं। पहला गुरुद्वारा ननकाना साहिब है, जहां गुरु नानक जी का जन्म हुआ था और दूसरा पवित्र करतारपुर गुरुद्वारा है, जहां उन्होंने देह का त्याग किया था। गुरुद्वारा ननकाना साहिब का पुराना नाम 'राय भोई दी तलवंडी' रहा है। यह लाहौर से 80 किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। गुरु नानकदेव जी के आध्यात्मिक प्रभामंडल को उनकी बहन नानकी और उस इलाके का शासक राय बुलर भट्टी ने पहचाना था। राय बुलर ने तलवंडी शहर के आसपास की 20 हजार एकड़ जमीन गुरु नानकदेव जी को उपहार स्वरूप दी थी, जिससे यह इलाका ननकाना साहिब कहलाने लगा। दूसरा, लाहौर से 118 किलोमीटर दूर करतारपुर गुरुद्वारा है। यहां गुरुनानक देव जी 18 साल रहे थे। वर्ष 1539 में उनका देहावसान इसी गुरुद्वारे में हुआ था।

सीमा पर होने की वजह से करतारपुर साहिब गुरुद्वारा भारत-पाक कूटनीति को लगातार प्रभावित करता रहा है। नवंबर, 2019 में गुरु नानकदेव जी की 550वीं जयंती है। दिलचस्प है कि पाकिस्तान की कैबिनेट ने इस जयंती के वास्ते प्रस्ताव पास किया, इधर 22 नवंबर, 2018 को मोदी कैबिनेट ने भी इस जयंती को ग्लोबल लेबल पर मनाने का प्रस्ताव पास किया है। तो क्या दोनों तरफ इसकी कोशिश हो रही थी कि देव नीति के बहाने कूटनीति के बर्फ की पिघलाया जाए?

प्रश्न यह है कि ऐसी कोशिश क्या पहले नहीं हुई है? एक अक्तूबर, 2010 को बादल सरकार के समय विधानसभा में बाकायदा प्रस्ताव पास किया गया कि केंद्र सरकार करतारपुर कॉरिडोर खुलवाने के वास्ते पहल करे और फिर 27 अगस्त, 2018 को कैप्टन अमरिन्दर सिंह की सरकार ने लगभग वैसा ही प्रस्ताव विधानसभा में पास कर केंद्र के पास भेजा। यह प्रस्ताव नवजोत सिंह सिद्धू के पाकिस्तान से लौटने के दसवें दिन रखा गया था। इसलिए क्रेडिट केवल किसी एक दल को देना भी अनुचित होगा। उधर, पाकिस्तान में भी नहीं कह सकते कि केवल इमरान खान की सरकार ही करतारपुर कॉरिडोर के वास्ते सक्रिय हुई है। जनरल परवेज मुशर्रफ के राष्ट्रपति रहते करतारपुर गलियारे के वास्ते 50 फीसद सड़क पाकिस्तान की ओर से बनाई गई थी। जो चिंता वाली बात है, वह यह कि इस गलियारे के खुल जाने के बाद सुरक्षा एजेंसियों का काम बढ़ जाएगा। पंजाब में अतिवादियों के 19 मॉड्यूल अब तक पकड़े जा चुके हैं। इनमें से दो मॉड्यूल ऐसे थे, जिनमें कश्मीरी छात्र थे।

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