जायज है विपक्ष की वीवीपीएटी की पर्चियां गिनने की मांग

By Independent Mail | Last Updated: Feb 6 2019 2:52PM
जायज है विपक्ष की वीवीपीएटी की पर्चियां गिनने की मांग

अंबिका दत्त मिश्रा

चुनावों में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) के इस्तेमाल के खिलाफ विपक्ष का विरोध जारी है। देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतपत्रों और मतपेटियों के युग में लौटने से निर्वाचन आयोग के स्पष्ट इंकार के बावजूद हाल ही में कई विपक्षी दलों की बैठक में आम चुनाव में ईवीएम की जगह मतपत्र के इस्तेमाल की मांग दोहराई गई है। विपक्षी दलों के इस रुख का क्या यह मतलब निकाला जाए कि वह मतपत्रों और मतपेटियों को लूटने तथा मतदान केन्द्रों पर कब्जा करने के उस युग में लौटने की हिमायत कर रहा है, जब चुनाव के दौरान कई राज्यों में बड़े पैमाने पर हिंसा होती थी और वोट बाहुबलियों के निर्देश पर डाले जाते थे।

यह भी अजीब-सी स्थिति है कि देश में लोकसभा और विधानसभा चुनावों में पिछले दो दशकों से ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है। लेकिन अब ईवीएम को हैक करने या उसके साथ छेड़छाड़ करने का दावा करके इसकी विश्वसनीयता पर संदेह पैदा करने का प्रयास किया जाता है। हालांकि, इस संदर्भ में ठोस प्रमाण कोई पेश नहीं कर पाता। शायद यही वजह है कि 2014 के लोकसभा चुनावों में ईवीएम में छेड़छाड़ किए जाने का लंदन में प्रेस कॉन्फ्रेंस करके दावा करने वाले स्वयंभू साइबर विशेषज्ञ सैयद शुजा के खिलाफ निर्वाचन आयोग को दिल्ली पुलिस में प्राथमिकी दर्ज करानी पड़ी है। स्थिति यह है कि निर्वाचन आयोग ने दो-टूक शब्दों में मतपत्र और मतपेटी के युग में लौटने की संभावना से इंकार करते हुए कहा है कि देश में चुनाव में ईवीएम और वीवीपीएटी का इस्तेमाल जारी रहेगा। मुख्य निर्वाचन आयोग सुनील अरोड़ा ने कहा कि चुनाव प्रक्रिया में सुधार के लिए किसी भी राजनीतिक पक्ष की आलोचना और सुझावों का स्वागत है, लेकिन उनसे हम परेशान होने वाले नहीं हैं। अब कांग्रेस सहित 21 दलों के 26 नेताओं ने निर्वाचन आयोग को ईवीएम के मुद्दे पर ज्ञापन देने का फैसला किया है। इसमें ईवीएम के साथ 50 फीसद गणना वीवीपीएटी पर्चियों की भी करने और ईवीएम तथा वीवीपीएटी की पर्चियों की गणना में अंतर होने पर वीवीपीएटी की गणना अंतिम मानने का अनुरोध भी शामिल है। मतपेटियों को लूटने तथा मतदान केन्द्र पर कब्जे के साथ बड़े पैमाने पर हिंसा की घटनाओं पर काबू पाने के लिए देश के 10वें मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के कार्यकाल में चुनावों में ईवीएम के प्रयोग की अवधारणा पर काम शुरू हुआ था और उनके उत्तराधिकारी, जो बाद में राज्यसभा के सदस्य भी बने, डॉ. एमएस गिल ने इसे आगे बढ़ाया था। बहरहाल, देश के दो सार्वजनिक उपक्रमों ने इन मशीनों का निर्माण किया और इनमें समय के साथ सुधार भी किए गए। हालांकि, स्वदेशी ईवीएम को लेकर राजनीतिक दलों और देश की जनता में बहुत ही उत्सुकता थी। फिर, ईवीएम का प्रयोग शुरू होने के बाद मतदान और मतगणना में लगने वाले समय में कमी आते ही जनता ने इसका जोरदार स्वागत किया। चुनाव के नतीजे भी तेजी से मिलने लगे। स्थिति यह है कि आज लगभग हर स्तर के चुनाव में ईवीएम का इस्तेमाल हो रहा है। ईवीएम की विश्वसनीयता पर 2009 में सबसे पहले डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, जो इस समय भाजपा के सांसद हैं, ने सवाल उठाया था। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट में एक याचिका दायर की थी। कोर्ट ने जनवरी, 2012 में अपने फैसले में मतदान के साक्ष्य के रूप में इन मशीनों के साथ मतदान की पर्ची निकालने की व्यवस्था करने का डॉ. स्वामी का अनुरोध अस्वीकार कर दिया था। निर्वाचन आयोग ने भी दावा किया था कि ईवीएम के साथ किसी प्रकार की छेड़छाड़ संभव नहीं है, क्योंकि इन्हें विशेष निगरानी में तैयार किया जाता है। लेकिन बाद में आयोग ईवीएम के साथ ही पर्ची निकालने की मशीन जोड़ने की व्यवस्था के लिए तैयार हो गया। इन मशीनों के डिजाइन में बदलाव करके इनमें वीवीपीएटी प्रणाली लगाई गई और पहली बार सितंबर, 2013 में नगालैंड विधानसभा की एक सीट पर हुए उपचुनाव मे इसका प्रयोग किया गया। यह प्रयोग सफल रहा और इसके बाद 2014 के चुनावों में भी वीवीपीएटी मशीनों को ईवीएम के साथ जोड़ा गया। यह सही है कि प्रत्येक चुनाव के दौरान कुछ मशीनों के सही तरीके से काम नहीं करने या इनमें गड़बड़ी की शिकायतें मिलती हैं, लेकिन इसका मतलब यह नहीं हो सकता कि हम पूरी ईवीएम व्यवस्था को ही नकार दें। हालांकि, विपक्ष की वीवीपीएटी की पर्चियों की गिनती की मांग जायज है, लेकिन ईवीएम से पीछे हटना ठीक नहीं है। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि ईवीएम के बाद मतदान और मतगणना की प्रक्रिया सरल हुई है। इसे फिर से कठिन नहीं बनाया जा सकता।

  • वरिष्ठ पत्रकार
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