गठबंधन करने में पिछड़ती चली जा रही है कांग्रेस

By Independent Mail | Last Updated: Mar 9 2019 11:12PM
गठबंधन करने में पिछड़ती चली जा रही है कांग्रेस
  • सुनीता मिश्रा, टीवी पत्रकार

लोकसभा चुनाव के लिए छोटे-छोटे दलों से गठबंधन करने में कांग्रेस पिछड़ती चली जा रही है। एक तरफ तो भाजपा ने उत्तर प्रदेश में अनुप्रिया पटेल और ओमप्रकाश राजभर को साध लिया है, दूसरी तरफ कांग्रेस ने दिल्ली में आम आदमी पार्टी (आप) को खो दिया है। यूपी में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी को वह पहले ही खो चुकी है। इन दोनों दलों में गठबंधन हो चुका है और शुरुआत में इस गठजोड़ ने कांग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली यानी कुल दो सीटें छोड़ी थीं। लेकिन बाद में नौ सीटों की पेशकश की गई, फिर एक समय ऐसा भी आया, जब कांग्रेस के लिए 14 सीटें देने की पेशकश अखिलेश यादव और मायावती ने की, लेकिन बात बनी नहीं। अब समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी, दोनों प्रियंका गांधी और ज्योतिरादित्य सिधिंया की प्रतीक्षा कर रहे हैं, ताकि उत्तर प्रदेश में गठबंधन की कहानी को फिर से नया रूप दिया जा सके। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक प्रमुख समाजवादी नेता ने बार-बार गैर-एनडीए पार्टियों के बीच मध्यस्थता करने की कोशिश की, लेकिन उनकी अपील को समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी की हताशा के संकेत के रूप में देखा गया। कांग्रेस ने उनकी पहल का गलत अर्थ लगाया, जबकि उसे नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाले एनडीए का सामना करने के लिए अपनी रणनीति बदलने की जरूरत है। अहंकार या एक ही व्यक्ति की श्रेष्ठता के बजाय गठबंधन और साझेदारी के लिए फिर से काम शुरू करने के लिए संघर्ष जरूरी है, खासकर उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा, पंजाब आदि राज्यों में, जहां भाजपा ने सबसे ज्यादा चुनावी लाभ लेने की तैयारी प्रारंभ कर दी है। ममता बनर्जी, शरद पवार और चंद्रबाबू नायडू चाहते हैं कि कांग्रेस जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात तक आमने-सामने की लड़ाई लड़े, जहां लोकसभा की 273 सीटें हैं। इस समय इनमें से 220 सीटें एनडीए के पास हैं। संयुक्त विपक्ष इनमें से कम से कम सौ सीटें छीनने की उम्मीद कर रहा था, लेकिन त्रिकोणीय या चार-कोणीय मुकाबले में यह काम संभव नहीं है। दिल्ली में कांग्रेस और आप के बीच वार्ता पवार, ममता और चंद्रबाबू की सलाह पर तय की गई थी। लेकिन शीला दीक्षित गठबंधन से बचने के लिए अड़ी रहीं, ताकि उनके अनुयायियों को लोकसभा चुनाव में टिकट मिल सकें और वे विधानसभा चुनाव तक उनके साथ बने रहें। इसके अलावा शीला दीक्षित ने ऐसा इसलिए भी किया, ताकि उनके बेटे संदीप दीक्षित को उनकी राजनीतिक विरासत मिल सके। कपिल सिब्बल का मानना था कि आप गठबंधन के साथ चुनाव जीतना उनके लिए आसान था। अजय माकन भी सिब्बल के पक्ष में थे और वह भी नई दिल्ली लोकसभा सीट से चुनाव जीतने की उम्मीद कर रहे थे। दिल्ली के पुराने लोग हैरान थे कि राहुल गांधी ने दिल्ली में गठबंधन के लिए खुली और स्वतंत्र चर्चा क्यों की। अक्टूबर, 2016 में उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमेटी के विचारों को सुने बिना उन्होंने समाजवादी पार्टी के साथ एकतरफा गठबंधन किया था। ऐसा ही मामला पश्चिम बंगाल में हुआ, जहां कांग्रेस आला कमान ने विधानसभा चुनाव से पहले अपनी बंगाल इकाई की बात सुने बगैर वाम दलों के साथ गठबंधन कर लिया। अब तस्वीर अलग बन रही है।

कांग्रेस को समझना चाहिए कि भाजपा और उसके सहयोगियों के खिलाफ एक मजबूत उम्मीदवार खड़ा करने का विचार कहने में जितना आसान है, करने में उतना ही कठिन है। अभी तक पश्चिम बंगाल में सीट समायोजन के लिए ममता बनर्जी या वामदलों के साथ बहुत कम या कोई बातचीत नहीं की गई है। इससे भी बदतर स्थिति ओडिसा में है, जहां नवीन पटनायक के नेतृत्व में बीजू जनता दल के कांग्रेस के साथ आने की संभावना नगण्य है। आंध्र प्रदेश में तेलुगूदेशम पार्टी और कांग्रेस तेलंगाना में अपने गठबंधन को लगी चोट को सहलाने में व्यस्त हैं, जिसे हाल ही में विधानसभा चुनाव में भारी हार का सामना करना पड़ा था। हालांकि, उत्तर प्रदेश में गठबंधन की कहानी अभी गंभीर है, पर खत्म नहीं हुई है। यह एक खुला रहस्य है कि मायावती उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को समायोजित नहीं करना चाहती हैं। बदले में कांग्रेस के पास मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, पंजाब और महाराष्ट्र आदि में सपा एवं बसपा को सीटें देने का अप्रिय विकल्प है। उत्तर प्रदेश में इज्जत बचाने के लिए सीट देने के बदले में इनके पास मजबूत संगठन नेटवर्क, चुनावी मशीनरी और जीतने वाले उम्मीदवार हैं।विडंबना देखिए कि उत्तर प्रदेश में गैर-भाजपा पार्टियों के पास साथ आने की संभावन शून्य से लेकर सौ फीसदी तक है। लेकिन जैसा कि कहा जाता है, जहां चाह, वहां राह। यदि सपा, बसपा और कांग्रेस पूरी ईमानदारी के साथ एक साथ आती हैं, तो एक-दूसरे के प्रति गर्मजोशी न होने के बावजूद अस्सी सीटों का चयन व बंटवारा कोई बड़ी समस्या नहीं है। यही वह क्षेत्र है, जहां सोनिया गांधी अपनी सद्भावना का उपयोग कर सकती हैं। अहमद पटेल और एके एंटनी के जरिये वह सीटों का समायोजन करवा सकती हैं। लेकिन इस अंकगणितीय गणना पर ही कांग्रेस की चिंता समाप्त नहीं होती है। एक प्रभावी रोड-शो के बाद प्रियंका और ज्योतिरादित्य सिंधिया ने अपने 72 घंटे के मैराथन दौरे (जिसमें मात्र सात घंटे उन्होंने आराम किया) के दौरान 200 प्रभावी नेताओं से मुलाकात की। लोगों की प्रतिक्रिया थी कि कांग्रेस में एक विश्वसनीय लड़ाई लड़ने और खुद को भाजपा का राष्ट्रीय विकल्प के रूप में पेश करने की क्षमता है। गठबंधन को जोड़ने की संभावनाएं छोटी थीं और जाति आधारित पार्टियों का भी पता लगाया गया। आशावादी कांग्रेस अब अगले पांच वर्षों के लिए विपक्ष की सीट पर बैठने की संभावना पर विचार कर रही है। मोदी को बाहर रखने के लिए अपने स्वार्थों को त्यागने का जुआ उलटा भी पड़ सकता है और रुककर विचार करने के लिए अब समय नहीं है। कांग्रेस अगर गठबंधन करने के बाद चुनाव में उतरे, तो संभावनाएं बदल सकती थीं। लेकिन पार्टी धीरे-धीरे समय निकलता चला जा रहा है। प्रियंका गांधी के राजनीति में प्रवेश के बावजूद कांग्रेस की चुनावी रणनीति में वैसी तेजी नहीं आई है, जैसी अपेक्षित थी।

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