'इस दुनिया को युद्ध की नहीं बुद्ध की जरूरत'

By Independent Mail | Last Updated: Apr 5 2019 10:23PM
'इस दुनिया को युद्ध की नहीं बुद्ध की जरूरत'

मधु कांकरिया

इंसान को युद्ध इंसानियत के सबसे निचले पायदान पर फेंक देता है। सरहद पर लड़ता हर सैनिक सिर्फ सरहद पर ही नहीं लड़ता बल्कि एक कुरुक्षेत्र उसके मन की सरहदों पर भी निरंतर चलता रहता है। हर पल तनाव, मौत, खौफ, विस्फोट और बारूद उसके भीतर के सौंदर्यबोध, शुभत्व और मंगल भाव का इस कदर मटियामेट कर देते हैं कि वह एक सामान्य और स्वभाविक जीवन को तरस जाता है। मानवता के सबसे बड़े महायुद्धों के साक्षी रहे स्टीफन स्वाइग अपनी विश्व प्रसिद्ध कृति 'द वर्ल्ड आॅफ यस्टरडे' में प्रथम विश्व युद्ध की शल्य क्रिया करते हुए भी किसी नतीजे पर नहीं पहुंच पाते हैं कि यह युद्ध क्यों हुआ था?

वह कहते हैं कि इसका कोई तार्किक या व्यावहारिक जवाब नहीं है, सिवाय इसके कि वह दूसरे का माल हड़पने की ख्वाहिश और दुनिया की नंबर वन ताकत बनने के नशे से उपजा उन्माद था, लेकिन जब एक बार युद्ध छिड़ जाता है तो वह इंसान द्वारा इंसान पर गिरने वाली दुनिया की सबसे बेरहम गाज होती है। दरअसल, युद्ध स्वप्नों और संभावनाओं के सारे द्वार बंद कर दिमाग को सुन्न कर इंसान के शरीर से उसकी रूह को जुदा कर उसकी आत्मा में अंधेरा भर देता है वरना यह कैसे संभव था कि नफरत से बौराए एक अकेले हिटलर ने अपनी अमानवीय और नस्लवादी सोच से पूरी दुनिया को हांका और लाखों यहूदियों को गैस चेंबर में डाल दिया। शायद इसलिए कि युद्ध के माहौल में लोगों के जज्बातों को भड़काने के लिए एक ही नशा काम करता है, नफरत और हिंसा। इसीलिए युद्ध सारी इंसानी अनुभूतियों और मानवीय भावनाओं को कुचल कर रख देता है। वाकई आतंकवाद से लड़ना भी किसी युद्ध से कम नहीं है। 13 साल से कश्मीर में आतंक से जूझते कर्नल गौतम राजऋषि, जो कि चर्चित रचनाकार भी हैं, को 2009 में पेट और पैरों मे 5 गोलियां लगी थीं।

मौत के मुंह से निकले कर्नल को पराक्रम और सेना चक्र से नवाजा गया था। अपने अनुभव वह इस प्रकार बयां करते हैं, सरहद पर रातें लंबी होती हैं। अक्सर तो उम्र से भी लंबी, बेचैन, आशंकित, चौकस रतजगों में लिपटी हुई। इन रतजगों के जाने कितने अफसाने हैं जो लिखे नहीं जा सकते, जो सुनाए नहीं जा सकते। विज्ञान ने इतनी ऊंची उड़ान भर ली है कि वह मंगल में जीवन खोज रहा है, लेकिन सोचना होगा कि इस लाल ग्रह में जीवन मिल भी गया तो भी क्या होगा? यदि हमारे जीवन में ही मंगल नहीं बचा। दुनिया को आज युद्ध की नहीं, बुद्ध की जरूरत है। 

  • प्रसिद्ध साहित्यकार
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