'ब्रेग्जिट' पर बुरी तरह उलझा ब्रिटेन

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 12:15AM
'ब्रेग्जिट' पर बुरी तरह उलझा ब्रिटेन

रंजीत कुमार

ब्रिटेन तो जैसे यूरोप के गले में अटक गया है। वह न तो यूरोपियन यूनियन से पूरी तरह अलग हो पा रहा है, न ही उसमें वापस लौटना चाह रहा है। हालांकि ब्रिटेन के राजनीतिक समुदाय में इन दोनों के अलावा कुछ और विकल्पों पर भी बहस चल रही है, लेकिन किसी ठोस प्रस्ताव पर ब्रिटिश संसद में सहमति नहीं बन पा रही। इसलिए ब्रिटेन की सत्तारूढ़ कंजर्वेटिव पार्टी की नेता और प्रधानमंत्री टेरेसा में परेशानी में हैं। क्योंकि यूरोपीय संघ से अलग होने के लिए जो फॉर्मूला तय हुआ, उस पर वह संसद को साथ लेकर आगे नहीं बढ़ सकीं। जून 2016 में जनमत संग्रह के बाद जब ब्रिटेन ने मामूली बहुमत से यूरोपियन यूनियन से अलग होने का फैसला किया था, तब वहां खुशी और गम दोनों का ही माहौल था। खुश वे थे जो यूनियन के मुख्यालय ब्रसल्स से शासित नहीं होना चाहते थे और दुखी वे थे, जो व्यावहारिक सोच वाले थे और आर्थिक नजरिए से इस फैसले को ब्रिटेन के हित में नहीं मानते थे। कभी दुनिया के एक बड़े इलाके यानि 50 से अधिक मुल्कों पर राज करने वाला ब्रिटेन बेल्जियम की राजधानी ब्रसल्स स्थित 28 देशों की यूरोपियन यूनियन के मुख्यालय यूरोपीय आयोग से शासित हो, ऐसा ब्रिटेन के घोर राष्ट्रवादी हरगिज नहीं चाहते। वे पुरानी औपनिवेशिक मानसिकता में जी रहे हैं, लेकिन ब्रिटेन की युवा पीढ़ी इस मानसिकता से उबर चुकी है। वह एक यथार्थवादी दुनिया में अपने को देखती है जिसमें ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को फायदा हो। इसी जनभावना को देखते हुए ब्रिटेन की कंजर्वेटिव पार्टी भी नहीं चाहती कि यूरोपीय यूनियन से ब्रिटेन का रिश्ता पूरी तरह टूट जाए। ब्रिटेन के राजनेता यूरोपियन यूनियन से जुड़े रह कर उसकी कस्टम्स यूनियन और सिंगल मार्केट से फायदा तो उठाना चाहते हैं, लेकिन यह नहीं चाहते कि यूरोपियन यूनियन की आव्रजन नीति ब्रिटेन पर लागू हो। 

इस नीति की वजह से यूरोपीय यूनियन के कुछ पिछड़े और गरीब देशों, जैसे पूर्वी यूरोप के पुराने कम्युनिस्ट मुल्कों के लाखों लोग ब्रिटेन की समृद्ध अर्थव्यवस्था से लाभ उठाने के लिए वहां रोजगार हासिल करके वहीं बसने लगे हैं। ब्रिटेन के लोगों को यह बिल्कुल रास नहीं आ रहा है। उनका कहना है कि यूरोपियन यूनियन की वजह से ब्रिटेन के लोगों की रोजी-रोटी छिन रही है और उनकी अमीरी पर बट्टा लग रहा है, क्योंकि उन्हें यूरोपीय संघ के गरीब देशों के लोगों के कल्याण के लिए वित्तीय योगदान करना पड़ता है। गौरतलब है कि 28 देशों की यूरोपीय यूनियन एक ऐसा महाद्वीपीय समूह है, जिसके सदस्य देशों ने एक-दूसरे की जनता के लिए सीमाएं पूरी तरह खोल दी हैं। एक देश की सीमा से दूसरे में प्रवेश करते वक्त अपना पासपोर्ट-वीजा नहीं दिखाना होता। इस वजह से यूनियन के किसी भी देश के नागरिक इसके किसी अन्य सदस्य देश में बिना वर्क परमिट के नौकरी कर सकते हैं। इसीलिए अपनी रोजी-रोटी छिनने के डर से ब्रिटेन के लोग यूरोपीय यूनियन से बाहर निकलना चाहते हैं, लेकिन वे यूनियन के साझा बाजार और कस्टम्स कानून के फायदे नहीं छोड़ना चाहते, ताकि ब्रिटेन यूरोप के लिए अंतरराष्ट्रीय निवेश का प्रवेशद्वार बना रहे। जैसे, भारतीय व्यापारी ब्रिटेन के जरिए यूरोपीय यूनियन के 28 सदस्य देशों के बाजार में अपनी पैठ बनाना चाहते रहे हैं। लेकिन अभी जब ब्रिटेन यूरोपीय यूनियन से अलग होने की प्रक्रिया में है तो न केवल वे बल्कि अन्य बड़ी आर्थिक ताकतें भी ब्रिटेन से किनारा करने की सोचने लगी हैं। अभी कई बाहरी कंपनियां अपना मुख्यालय लंदन से हटाकर यूरोप की किसी बड़ी राजधानी में ले जाने की तैयारी में हैं ताकि यूरोप के विशाल बाजार का सीधे फायदा उठाया जा सके। लाभ-हानि के इसी संतुलन में ब्रिटेन के राजनेता असमंजस में हैं और वे ब्रेग्जिट यानि यूरोपीय यूनियन से अलग होने के टेरेसा में के प्रस्ताव पर संसद की मुहर नहीं लगने दे रहे। 

यूनियन से अलग होने की अंतिम तारीख 29 मार्च की समय सीमा खत्म होने के बाद अब अंतिम तौर पर 12 अप्रैल तक ब्रिटेन को यह फैसला ले लेना है। ब्रिटेन यदि अलग होने का फैसला करता है तो इसके लिए एक संक्रमण काल तय होगा। लेकिन पेच यह है कि यदि यह संक्रमण काल समाप्त होने के पहले ही मई के तीसरे सप्ताह में यूरोपीय यूनियन की संसद का चुनाव हुआ तो ब्रिटेन को भी इस चुनाव में भाग लेना होगा। चूंकि ब्रिटेन ने अलग होने का मन बना लिया है लिहाजा वह इस चुनाव में भाग नहीं लेना चाहेगा। साफ है कि उसके पास अब वक्त नहीं बचा है। अगर वह यूनियन से बाहर निकल जाता है तो उसे यूनियन के साझा बाजार से हाथ धोना पड़ेगा, जिसका प्रतिकूल प्रभाव ब्रिटिश अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। यदि ब्रिटेन झटके में बाहर निकला तो उसकी सीमाएं यूरोपीय यूनियन से बिना किसी मान्य समझौते के बंद हो जाएंगी। ब्रिटिश उत्पादों पर यूरोपीय यूनियन में उसी तरह कर लगेगा जैसा दूसरे देशों के उत्पादों पर लगता है। ब्रिटिश राजनेता चिंतित हैं कि संघ से बाहर निकलने पर ब्रिटेन कहीं अलग-थलग न पड़ जाए। 

  • वरिष्ठ पत्रकार 
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