लोस चुनाव: पेंच-दर-पेंच फंसी बिहार की सियासत

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 2:12AM
लोस चुनाव: पेंच-दर-पेंच फंसी बिहार की सियासत

नरेंद्र नाथ, स्वतंत्र टिप्पणीकार

बदले समीकरण में बिहार की 40 सीटों पर दोनों गठबंधनों को अपने घर के अंदर ही सवालों का सामना करना पड़ रहा है। राज्य की एक दर्जन सीटों पर दोनों गठबंधन बागी उम्मीदवारों या असंतोष का सामना कर रहे हैं। बिहार की 40 सीटों पर अगर किसी एक दल ने सबसे अधिक समझौता किया तो वह बीजेपी है। 2014 में 22 सीटें जीतने वाली बीजेपी इस बार 17 सीटों पर ही चुनाव लड़ रही है। बाकी में 17 पर जेडीयू और 6 सीटों पर एलजेपी चुनाव लड़ रही है। पांच सीट त्यागने वाली बीजेपी को अपनी ही पार्टी के अंदर असंतोष का सामना करना पड़ा। बांका में पुतुल सिंह अपने ही गठबंधन के जेडीयू उम्मीदवार के खिलाफ बागी प्रत्याशी के रूप में खड़ी हो गई हैं, जिससे एनडीए परेशानी में है। वहीं बीजेपी के सीनियर नेता शहनवाज हुसैन ने भागलपुर सीट को बीजेपी कोटे से जेडीयू गठबंधन को दिए जाने पर सार्वजनिक नाराजगी जता दी। इस पर नीतीश कुमार ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी और चुनाव के दौरान पहली बार संदेश गया कि टिकट बंटवारे के बाद दोनों दलों में कुछ तल्खी पैदा हुई।

कटिहार सीट भी बीजेपी ने अपने कोटे से जेडीयू को दी, जिसके बाद वहां सीनियर नेता अशोक अग्रवाल बागी हो गए। हालांकि बाद में पार्टी नेतृत्व के हस्तक्षेप के बाद वह नाम वापस लेने पर सहमत हुए। बीजेपी के अंदर एक वर्ग इस बात पर नाराज है कि पार्टी ने अपने सहयोगियों को कुछ अधिक सीटें दे दीं। टिकट बंटवारे के दौरान एनडीए की सहयोगी जेडीयू व एलजेपी की भी राहें आसान नहीं रहीं। जेडीयू को गठबंधन में 17 सीटें तो मिल गर्इं, लेकिन इन सीटों पर जिताऊ उम्मीदवार खोजने की चुनौती बढ़ी। क्योंकि पार्टी को ऐसी सीटें अधिक मिलीं, जिन्हें 2014 की मोदी लहर में भी जीता नहीं जा सका था। वहीं पार्टी को ऐसी सीटें नहीं मिली, जहां पिछले कुछ सालों में उसने काफी मेहनत की थी। मसलन दरभंगा सीट पर नीतीश कुमार के करीबी नेता संजय झा ने पिछले कुछ सालों से चुनाव लड़ने का ऐलान कर वहीं कैंप किया था, लेकिन ऐन मौके पर वह सीट बीजेपी के खाते में चली गई। इसके अलावा जेडीयू में कुछ नेताओं ने पहली बार पार्टी में पैसे लेकर टिकट बेचने का आरोप लगाया। पार्टी के अंदर खेमेबाजी भी सामने आई। इसी तरह एलजेपी पर पार्टी के अंदर परिवार को ही टिकट बांटने का आरोप लगा।

टिकट बंटवारे में कांग्रेस के सामने भी मुश्किलें रहीं। जब से कांग्रेस ने बिहार में शक्तिसिंह गोहिल को राज्य का प्रभारी और मदन मोहन झा को प्रदेश अध्यक्ष बनाया, तब से राज्य में दूसरे दलों के नेताओं व पार्टी के पुराने नेताओं को साथ जोड़ने का सिलसिला शुरू हुआ। इनमें अधिकतर ऐसे नेता थे जो पार्टी में टिकट या दूसरे पद की भी उम्मीद रख रहे थे। लेकिन जब टिकट बंटवारे की बात शुरू हुई तो एक सीट, कई दावेदार वाली स्थिति पैदा हो गई। दरभंगा सीट से मौजूदा सांसद कीर्ति आजाद बीजेपी छोड़कर कांग्रेस में आए थे, लेकिन वह सीट आरजेडी के खाते में चली गई। उसी तरह औरंगाबाद सीट, जो सालों से कांग्रेस की पारंपरिक सीट थी, वह भी पार्टी के हाथ से चली गई। हालांकि पूर्णिया में चुनाव से ठीक पहले कांग्रेस में शामिल होने वाले उदय सिंह को जरूर टिकट मिला। उसी तरह बाहुलबी नेता अनंत सिंह की पत्नी को भी मुंगेर से टिकट मिला।

साथ ही कांग्रेस ने सालों बाद राज्य में अपने पांरपरिक वोट बैंक सवर्ण, मुस्लिम, दलित को अपने पक्ष में करने की नीति बनाई। लेकिन गठबंधन में 9 ही सीट मिलने से कांग्रेस अपने हिसाब से चीजों को अमल में नहीं ला सकी। कांग्रेस के अंदर एक वर्ग राज्य में अकेले लड़ने की भी जिद पर अड़ा। कांग्रेस को अपनी सीट सुपौल पर भी दिक्कत आई, जहां रंजीत रंजन मौजूदा सांसद हैं। उनके पति पप्पू यादव के महागठबंधन की सीटों पर बागी खड़ा होने के बाद उस सीट पर भी कांग्रेस-आरजेडी में विवाद हुआ था। लेकिन अंत में केंद्रीय नेतृत्व ने हस्तक्षेप कर हालात के अनुरूप समझौता किया और साथ मिलकर चुनाव लड़ने की हिदायत दी। अभी भी राज्य में कांग्रेस दो सीटों पर अपने उम्मीदवार घोषित नहीं कर पाई है। आरजेडी भी घरों में उठी बागी आवाज से बच नहीं पाई। गठबंधन मजबूरी के कारण आरजेडी इस बार सबसे कम 19 सीटों पर चुनाव लड़ रही है। पार्टी के कई सीनियर नेताओं ने इस फैसले पर आपत्ति जताई। दरभंगा जैसी सीट पर अब्दुल बारी सिद्दीकी को टिकट देने के बाद पार्टी का मुस्लिम चेहरा रहे अली अशरफ फातमी बागी हो गए और अलग पार्टी बनाने का ऐलान कर दिया।

खुद लालू प्रसाद के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव ने अपनी पसंद के उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिए जाने के बाद बगावत कर दी और अलग मोर्चा बना लिया। सूत्रों के अनुसार पार्टी के आधे दर्जन नेता अभी भी नाराज हैं। वहीं यूपीए गठबंधन के अंदर इस बार छोटे दलों को उम्मीद से अधिक सीटें मिलीं। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी को 5 सीट तो जीतन मांझी व मुकेश सहनी की पार्टी को 3-3 सीटें मिलीं। सीटें तो मिल गर्इं, लेकिन जब उम्मीदवार तय करने की बारी आई तो इनके पास उम्मीदवारों का अकाल सा दिखा। जीतन मांझी एक सीट पर खुद लड़े तो दो सीटों पर एनडीए में टिकट कटने के बाद आए दो नेताओं को टिकट देना पड़ा। उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी तो अपने कोटे की 5 सीटों पर अब तक उम्मीदवारों के नाम घोषित नहीं कर पाई है। सूत्रों के अनुसार उनके कोटे पर कांग्रेस के एक सीनियर नेता के बेटे चुनाव लड़ सकते हैं। यही तस्वीर मुकेश सहनी की पार्टी की है जो अब तक एक सीट पर उम्मीदवार नहीं खोज पाई है।

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved