आडवाणी ने पढ़ाया 'राजधर्म' का पाठ

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 2:11AM
आडवाणी ने पढ़ाया ''राजधर्म'' का पाठ

आशीष श्रीवास्तव, स्वतंत्र टिप्पणीकार

भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का अपनी पार्टी की स्थापना दिवस के पूर्व लिखा गया ब्लॉग वर्तमान राजनीति में व्यवहार के लिए दिशा-निर्देश की तरह है। जिसको लेकर बड़ा बवाल मचा हुआ है। कांग्रेस आडवाणी के ब्लॉक को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह पर सीधा हमलावर हो गई है। कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता रणदीप सिंह सुरजेवाला ने तो यहां तक कह डाला कि आखिर ये सच्चाई भी सामने आ ही गई कि भाजपा में अब यह सिद्धांत चल पड़ा है कि पार्टी के वर्तमान नेता अपने राजनीतिक विरोधियों को अपना दुश्मन समझ बैठते हैं, जैसा कि उनके वरिष्ठ राजनेता ने अपने ब्लॉग में लिखा है। जबकि आडवाणी ने लिखा है कि राजनीतिक विरोधियों को हमने कभी दुश्मन नहीं माना। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उस लेख को ट्वीट कर कहा है कि ऐसी पार्टी का कार्यकर्ता होने पर हमें गर्व है।

इसका सामान्य अर्थ यही हुआ कि भाजपा की सबसे पुरानी पीढ़ी के नेता तथा वर्तमान नेतृत्व के बीच इस स्तर पर वैचारिक समानता है कि राजनीति में वैचारिक विरोधी तो हो सकते हैं, दुश्मन नहीं। किंतु इस समय जिस तरह का राजनीतिक व्यवहार हमारे सामने है, उसमें पता नहीं राजनीति की यह सामान्य मर्यादा रेखा कब लांघ दी गई। इसमें अकेले भाजपा का दोष नहीं है। ज्यादातर पार्टी नेता जिस तरह दूसरी पार्टियों एवं नेताओं पर हमले करते हैं, उनमें वैचारिकता कम निजी टिप्पणियां ज्यादा होती हैं। चैनलों से लेकर सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा का प्रयोग हो रहा है, उसकी कुछ वर्ष पूर्व कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। आज राजनीति का स्तर इतना गिर गया है कि नेता सिंद्धातों के बजाय व्यक्ति विशेष पर कटाक्ष करते नजर आते हैं। हालांकि यह परंपरा सिर्फ भाजपा में ही नहीं बल्कि सभी राजनीतिक दलों में देखने को मिलती है। ऐसा लगता ही नहीं कि ये एक ही देश के अलग-अलग पार्टियों के नेता और कार्यकर्ता हैं। यह भाषा धीरे-धीरे आम सभाओं को भी अपने आगोश में लेती जा रही है। पार्टी आधारित संसदीय लोकतंत्र के लिए यह चिंताजनक स्थिति है। आडवाणी ने अपने ब्लॉग से कम से कम भाजपा के नेताओ और कार्यकर्ताओं को तो अवश्य ही सीख दी है कि राजनीतिक विरोधियों के लिए सयंमित और संतुलित भाषा का प्रयोग किया जाए। इसमें यह तर्क नहीं चलता कि जब सामने वाला हमारे लिए गंदे शब्दों का प्रयोग कर रहा है या हमारे नेता की निंदा कर रहा है तो हमारे सामने ऐसा करने की विवशता है।

आडवाणी का ब्लॉग बताता है कि आपको हर हाल में अपनी परंपरा पर कायम रहना है। यानि दूसरे हमारे लिए क्या शब्द प्रयोग करते हैं, उनसे विचलित होकर हमें उस स्तर पर नहीं जाना चाहिए। आडवाणी के पूरे राजनीतिक जीवन को देखें तो वह इसी आचरण शैली से आबद्ध दिखेंगे। आडवाणी पर भी लंबे समय तक निजी हमले हुए, लेकिन उन्होंने कभी सीमा नहीं लांघी। आज भारी संख्या में भाजपा के नेता और कार्यकर्ता इस आचरण-शैली से दूर जा चुके हैं। वे जिस तरह अपने विरोधियों की निंदा करते हैं, उनसे लगता ही नहीं कि यह वही पार्टी है जिसकी चर्चा आडवाणी कर रहे हैं। अगर पार्टी कार्यकर्ता के रूप में मोदी ने इसे सही मानकर ट्वीट किया है तो इसीलिए कि सभी इसे पढ़ें और इसके अनुसार आचरण करें। हम चाहेंगे ऐसा हो, पर इसकी उम्मीद कठिन है।

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