पश्चिम बंगाल में भारत के संघीय ढांचे पर हमला

By Independent Mail | Last Updated: Feb 8 2019 10:55PM
पश्चिम बंगाल में भारत के संघीय ढांचे पर हमला

गौतम चौधरी

केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) का झगड़ा अभी शांत भी नहीं हुआ था कि वह एक नए विवाद में फंस गया। कोलकाता के पुलिस कमिश्नर राजीव कुमार से सीबीआई की टीम पूछताछ करने के लिए कोलकाता गई थी। वह राजीव से पूछताछ करती, उससे पहले ही कोलकाता पुलिस ने उस टीम को थाने में बिठा लिया। यह देश की पहली घटना है, जब किसी केंद्रीय जांच एजेंसी की टीम को किसी राज्य की पुलिस ने थाने में बिठाया। यह घटना देश के संघीय ढांचे पर हमला है। हालांकि, इसे लेकर ममता सरकार के पास अपने तर्क हैं और सीबीआई को नियंत्रित करने वाली केंद्र सरकार के पास अपने तर्क। वैसे भी हर घटना को नैतिक और कानूनी तौर पर वैध ठहराने के तर्क गढ़ ही लिए जाते हैं, लेकिन जो हरकत पश्चिम बंगाल की पुलिस ने की है, वह गलत है।

यहां मैं कुछ उदाहरण देना चाहूंगा। पंजाब के खालिस्तानी चरमपंथी जरनैल सिंह भिंडरांवाला को किसी समय में एक खास राजनीतिक दल की ओर से संरक्षण मिला था। एक मामले में उस पर मुकदमा चलाया गया था, लेकिन उसने अदालत में जाने से इंकार कर दिया और कहा कि मैं भारत की अदालत में विश्वास नहीं करता। तब उसकी सुनवाई गुरदर्शन प्रकाश गुरुद्वारा, मेहता चौक, जिला अमृतसर में हुई।उसका प्रतिफल पूरा देश देख चुका है। प्रथम चरण में संरक्षण देने वाले राजनीतिक दल को भिंडरांवाला से फायदा दिखा, लेकिन बाद में वह देश की एकता के लिए खतरा बन गया। लालू यादव के मामले की चर्चा यहां करना मैं जरूरी समझता हूं। मामला बेहद रुचिकार है। कोर्ट के आदेश पर सीबीआई बिहार में चारा घोटाले की जांच कर रही थी। ज्वाइंट डायरेक्टर यूएन विश्वास जांच टीम को लीड कर रहे थे। बिहार के तत्कालीन मुख्यमंत्री लालू प्रसाद के अनुरोध पर सुप्रीम कोर्ट ने पटना हाईकोर्ट को जांच की निगरानी का जिम्मा सौंपा। सीबीआई ने जांच की प्रारंभिक रिपोर्ट कोर्ट में पेश की। सीलबंद रिपोर्ट पढ़ कर न्यायाधीश चौंक पड़े। उन्होंने विश्वास से पूछा कि क्या यह आपकी रिपोर्ट है? विश्वास ने इंकार में सिर हिलाते हुए अपनी जेब से दूसरी रिपोर्ट निकालकर अदालत को दी।

जजों ने दूसरी रिपोर्ट भी पढ़ी, फिर पूछा-दोनों रिपोर्ट में अंतर क्यों है? विश्वास ने बताया की नियमानुसार उन्होंने अपनी रिपोर्ट सीबीआई निदेशक को भेजी थी। वहां से एडिट होकर रिपोर्ट कोर्ट में पहुंची है, लेकिन उन्होंने अपनी रिपोर्ट की एक कॉपी रख ली थी। सीबीआई के तत्कालीन डायरेक्टर जोगिंदर सिंह भी कोर्ट में मौजूद थे। उनका चेहरा स्याह पड़ चुका था। मूल रिपोर्ट में परिवर्तन क्यों किया गया, कोर्ट के इस सवाल का वह जवाब नहीं दे सके। जजों को मामला समझते देर नहीं लगी। कोर्ट ने तत्काल जोगिन्दर सिंह को चारा घोटाले की जांच से अलग कर दिया। इसके बाद जो जांच हुई, तो वह घोटालेबाजों को सलाखों के पीछे करके ही रुकी। 20 साल तक बिहार पर राज करने की घोषणा करने वाले लालू को छह साल के बाद ही मुख्यमंत्री की गद्दी छोड़ जेल जाना पड़ा।

यहां यह भी बता दें कि कालांतर में ममता बनर्जी जितनी घातक तो नहीं, लेकिन कुछ इसी प्रकार की परिपार्टी भाजपा शासित प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने भी की है। 2012 में रमन सिंह के शासनकाल के दौरान सीबीआई के अधिकारियों को बंधक बना लिया गया था। मार्च, 2011 में छत्तीसगढ़ के बस्तर में ताड़मेटला कांड हुआ था। इस कांड में 300 घरों को आग लगा दी गई थी और तीन लोगों की हत्या कर दी गई थी। इस हत्याकांड के आरोप लगे थे, छत्तीसगढ़ के विशेष सुरक्षा बलों पर, जिन्हें एसपीओ कहा जाता है। मामले की जांच सीबीआई कर रही थी। इस कांड की जांच के लिए सीबीआई के छह अधिकारी नौ फरवरी, 2012 की शाम ताड़मेटला पहुंचे। उसी दिन सुकमा के एएसपी डीएस मरावी पर माओवादियों ने हमला कर दिया। इसमें एक एसपीओ करलम सूर्या की मौत हो गई। वहीं माओवादियों से बात करने पहुंचे स्वामी अग्निवेश पर भी हमला हुआ। इस खराब माहौल में सीबीआई के अधिकारी ताड़मेटला कांड की जांच के लिए पहुंच गए। उन्हें देखकर एसपीओ भड़क गए और आरोप लगाया कि सीबीआई के अधिकारी ही एसपीओ की मौत के लिए जिम्मेदार हैं। इसके बाद सीबीआई के अधिकारियों ने खुद को एक रूम में बंद कर लिया। उन्होंने आरोप लगाया कि एसपीओ के पास हथियार और हथगोले थे और उन्होंने फायरिंग भी की थी।

2012 में शिवराज सिंह चौहान की सरकार ने सीबीआई के खिलाफ मोर्चा खोला था। 12 अक्टूबर, 2012 को शिवराज सरकार के गृह विभाग ने एक नोटिफिकेशन जारी किया। उसमें कहा गया था कि मध्य प्रदेश सरकार दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना अधिनियम-1946 के तहत इस बात की इजाजत देती है कि केंद्र सरकार की जांच एजेंसियां प्रदेश में जांच कर सकती हैं, लेकिन वे राज्य सरकार के तहत आने वाले आईएएस, आईपीएस और आईएफएस अफसरों की जांच नहीं कर सकतीं। इसका सीधा मतलब यह था कि कोई भी केंद्रीय एजेंसी मध्य प्रदेश के अधिकारियों को हाथ नहीं लगा सकती।

वैसे पश्चिम बंगाल के मामले में मोदी सरकार की भी भूमिका बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती। वैधानिक रूप से सीबीआई राज्य सराकर की बिना अनुमति प्रदेश में किसी प्रकार का कोई अभियान नहीं चला सकती। भारतीय संघीय ढांचे में राज्यों को स्वायत्ता मिली हुई है। कई राज्य पहले से सीबीआई के प्रवेश को लेकर लिखित अनुमति केंद्रीय गृह मंत्रालय को दे चुके हैं, लेकिन कई राज्य सरकारें केस के आधार पर सीबीआई को अनुमति प्रदान करती हैं। इधर जब सीबीआई में उठा-पटक हुई, तो उसकी विश्वसनीयता पर प्रश्न खड़ा करते हुए आंध्र प्रदेश की सराकर ने अपनी अनुमति वापस ले ली। फिर पश्चिम बंगाल सरकार ने भी यही किया। ऐसे में यह मामला केंद्र सरकार को राजनीतिक हस्तक्षेप करके संभालना चाहिए था, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया और सीबीआई पश्चिम बंगाल पहुंच गई। हालांकि, इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय अच्छा रहा। पुलिस अधिकारी राजीव कुमार से पूछताछ की अनुमति कोर्ट ने दे दी है। लेकिन संघीय ढांचे पर जो आक्रमण हुआ, उस पर न तो कोर्ट कुछ कहने के लिए तैयार है और न ही केन्द्र सरकार।

यदि यही परिपाटी चली, तो फिर हर प्रदेश अपने आंतरिक मुद्दों को ध्यान में रखकर संघीय ढांचे पर प्रहार करेगा। भारत विभिन्न सभ्यताओं, संस्कृतियों, भाषाओं, पंथों, जातियों और धर्मों का देश है। इस देश को एक बनाने में हमारे संविधान की महत्वपूर्ण भूमिका है। देश की एकता और अखंडता सर्वोपरि है। यह राष्ट्र तभी एकीकृत रहेगा, जब हम अपनी-अपनी हद में रहेंगे। इस मामले में ममता बनर्जी को भी तसल्ली से काम लेना चाहिए था।

  • वरिष्ठ पत्रकार
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