नुकसानदायक दवाओं पर प्रतिबंध का स्वागत

By Independent Mail | Last Updated: Sep 14 2018 8:44PM
नुकसानदायक दवाओं पर प्रतिबंध का स्वागत
  • मुंबई के हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ. जगदीश ओझा के फेसबुक पेज से...

तुरंत आराम के लिए दवा की दुकान पर सहज सुलभ टिकिया खरीदकर खाना सेहत के लिए महंगा पड़ रहा है। आम लोगों को इसी संकट से बचाने के लिए सरकार ने तुरंत लाभ देने वाली 328 कांबिनेशन दवाओं के निर्माण, बिक्री और वितरण को तत्काल प्रभाव से प्रतिबंधित कर दिया है। ड्रग एडवाइजरी बोर्ड की सिफारिशों पर इन्हें सेहत के लिए खतरनाक माना गया है। इस फैसले से अत्यंत लोकप्रिय सेरीडॉन, विक्स एक्शन 500 और कोरेक्स जैसी तुरंत राहत देने वाली दवाओं सहित कम से कम छह हजार दवाएं प्रभावित होंगी। इन पर प्रतिबंध से फार्मा सेक्टर को करीब डेढ़ हजार करोड़ का झटका लग सकता है लेकिन इस बात से तो कोई भी सहमत होगा कि इंसान की सेहत से बड़ा नुकसान कुछ और नहीं हो सकता और इससे समझौता नहीं किया जाना चाहिए। सच तो यही है कि किसी भी दवा का बिना डॉक्टरी सलाह के लिया जाना ही प्रतिबंधित हो जाना चाहिए लेकिन उससे पहले हमें अपना सिस्टम इतना विकसित करना होगा कि चिकित्सा सही अर्थों में सहज-सुलभ और सस्ती हो जाए। ऐसी व्यवस्था बनानी होगी जिसमें किसी को न तो दवा के लिए घंटों लाइन में लगना पड़े, न जरा-जरा सी बात पर मोटी फीस लेने वाले निजी अस्पतालों के चक्कर लड़ाने पड़ें। बहरहाल, सरकार ने जिन दवाओं पर प्रतिबंध लगाया है, उनमें सिरदर्द, खांसी-जुकाम-बुखार के लिए प्रचलित तमाम नामों का शामिल होना बताता है कि हमारे देश में सेहत को लेकर आम जनता ही नहीं, जिम्मेदार एजेंसियां भी लापरवाह हैं? सवाल यह है कि ये दवाएं वर्षों से बनती और बिकती कैसे आ रही थीं? क्यों ये दवाएं पंसारी की दुकान पर तक मिल जाती हैं? अब इन दवाओं के साइड इफेक्ट को प्रचारित किये जाने की जरूरत है। लोगों को बताया जाना चाहिए कि ये क्यों नुकसानदेह हैं और बिना डॉक्टरी सलाह के इन्हें लेना कितना खतरनाक है। कुछ दवाएं पशुओं के लिए इसलिए प्रतिबंधित कर दी गयीं कि उनके मरने के बाद उन्हें खाने से गिद्धों की मौत हो रही थी। यानी ये दवाएं गिद्धों की पूरी प्रजाति के लिए खतरा बन चुकी थीं, इसीलिए उन्हें पशुओं के लिए प्रतिबंधित किया गया। कुल मिलाकर यह एक अच्छी पहल है लेकिन देखा यह भी जाता है कि प्रतिबंधित दवा नाम बदलकर आसानी से बाजार में फिर आ जाती है। यानी, नुकसानदायक दवाओं पर पाबंदी लगाने मात्र से कुछ नहीं होगा। एक ऐसी नीति बनानी होगी जो इस तरह की दवाओं को बनने ही न दे।

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