कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है, पड़ी है ठण्ड इतनी कि,,,

By Independent Mail | Last Updated: Jan 18 2018 5:57PM
कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है, पड़ी है ठण्ड इतनी कि,,,

 नवल कान्त सिन्हा

अमा देख लो, पता कर लो। कोई छूटा तो नहीं, सब के सब आ तो गए न दो हज़ार अठारह में... कसम से बहुत जाड़ा पड़ रहा है, डर लगता है कि कहीं कोई रजाई में दुबकने की वजह से दो हज़ार सत्रह में न रह गया हो। एक तो ठण्ड, उस पर से नए साल का जश्न... बिहार के कुछ भूतपूर्व शराबियों का जवाब सुनकर दिल भर आया। कहने लगे कि अब क्या नया साल क्या, पुराना साल क्या... सब एक जैसा है। पता ही नहीं चलता कि साल बदल गया है। न मय, न मयखाना, न साकी, न प्याला। ऊपर से ये मुई ठंड भी कहाँ समझती है कि बिहार में शराबबंदी है। ये तो उससे भी ज़्यादा पड़ रही है, जैसी कि पहले पड़ती थी। अरे दिल्ली जैसी सर्दी पड़े तो दिल्ली जैसा माहौल भी तो होना चाहिए न, है कि नहीं।

अब दिल्ली की बात हुई तो याद आ गए दिल्ली के मुख्यमंत्री यानी कि अपने अरविंद केजरीवालजी। वैसे भी जाड़े में मफलर याद आता है और मफलर के साथ केजरीवालजी भी। सचमुच वो जानते हैं कि सर्दी का कहर क्या होता है। उन्होंने खतरनाक खांसी झेल रखी है। स्वाभावतः सरल हैं, इसलिए उन्होंने कोशिश की होगी कि पार्टी के सूरमाओं के गर्मी बनी रहे। तभी तो छांट-छांट के राज्यसभा के टिकटों की घोषणा की। अब उनकी मंशा तो थी पार्टी के माहौल को गरम करना। इस पर कुमार विश्वास और आशुतोष ठण्डे पड़ गए तो इसमें केजरीवाल की क्या गलती। वैसे भी उच्च सदन एक्सपर्टों, विद्वानों, कुलीनों, सभ्रांतों के लिए होता है। फिर भी संजय सिंह को पार्टी ने टिकट दे दिया कि पार्टी का मनोबल न गिरे। वैसे भी मेहनती नेता संजय सिंह की लोकप्रियता बढ़ाने की भी तो जरूरत थी। अब आप पूछेंगे कि कुमार विश्वास पार्टी के नेता नहीं थे क्या। हां, बिलकुल थे। लेकिन खुदा खैर करे, उनकी लोकप्रियता तो पूरे देश में पहले से है। महंगे कवि हैं। कविता का मंच उनके पास है, वहां से भी कविताओं के जरिये मुद्दे उठा सकते हैं। आप कहेंगे कि आशुतोष क्यों नहीं, तो जान लीजिये कि वो टीवी पत्रकारिता और अपने रोने की अदा की वजह से पहले से पापुलर हैं। वैसे भी टिकट नहीं मिला तो कौन सा पहली बार रोयेंगे। इसीलिए सोच-समझकर आम आदमी पार्टी ने संजय सिंह, एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता को राज्यसभा का उम्मीदवार बनाया। बाकायदा पॉलिटिकल अफेयर्स कमिटी की बैठक हुई, जिसमें राज्यसभा के लिए उम्मीदवारों के नामों पर चर्चा हुई। अलग-अलग क्षेत्रों के विशेषज्ञों से संपर्क किया गया। पार्टी के अन्दर ही नहीं, पार्टी से बाहर के भी 18 लोगों से संपर्क किया गया। मनीष सिसोदिया तो कह ही चुके हैं कि कुछ ने मना कर दिया कि वो राजनीति से जुड़ना नहीं चाहते थे। यानी बड़ी मुश्किल से एनडी गुप्ता और सुशील गुप्ता तैयार हुए होंगे। और आपको बता तो चुका ही हूँ कि राज्यसभा संवैधानिक रूप से उच्च सदन है और वहां तो उनको ही भेजा जाना चाहिए जो विशिष्ठ हों और चुनाव लड़कर संसद जाने की स्थिति में न हो। अब अपने कुमार साहब तो राहुल गांधी जैसे देश के सबसे बड़े नेता के खिलाफ चुनाव लड़ कर हार चुके हैं, नैतिकता का तकाजा है कि वो चुनाव लड़कर संसद जाएँ। बड़ी मुश्किल से दो एक्सपर्ट तैयार हुए, उन्हें पार्टी क्यों न राज्यसभा भेजे। वैसे एक्सपर्ट वाली थ्योरी पर संजय सिंह भगवान को दुआएं दे रहे होंगे कि अच्छा हुआ पार्टी को तीसरा एक्सपर्ट समझ नहीं आया, नहीं तो काम ही लग जाता। अब एनडी गुप्ता चार्टर्ड अकाउंटेंट हैं। जीएसटी के बड़े जानकार हैं। चार्टर्ड अकाउंटेंट असोसिएशन के प्रेसिडेंट रह चुके हैं। भाई, जीएसटी पर भाजपा से भिड़ना है तो ऐसा एक्सपर्ट तो होना ही चाहिए था न। फिर दो साल से ‘आप’ की अकाउंटिंग का काम गुप्ता ही देख रहे थे। वैसे सुशील गुप्ता भी किसी कम नहीं हैं। सोशल ऐक्टिविस्ट हैं और पूर्व कांग्रेसी होने के नाते सियासत की भी अनुभव है। दिल्ली में 10 से ज्यादा चैरिटेबल हॉस्पिटल और कई स्कूल उनकी सफलता की गवाही देते हैं। फिलहाल जो भी हो, केजरीवाल सर ने चाहे जितना तापमान बढाने की कोशिश की हो लेकिन कुमार विश्वास को देखकर तो यही लगता है कि उनके सामने धुंध छा गयी और आशुतोष रजइया में दुबक कर बैठ गए। अब मैं नहीं कहता कि कुमार विश्वास ये गा रहे होंगे- ‘कोई दीवाना कहता है कोई पागल समझता है, पड़ी है ठण्ड इतनी कि मेरा दिल समझता है। टिकट की लायक मैं भी हूँ, ये सब जानते होंगे, टिकट कटने का जो है दर्द, वो केवल मैं समझता हूँ।’ वैसे राजनीतिक ठण्ड हो सकता है कि केवल कुमार विश्वास को लगी हो, राजनीतिक धुंध केवल आशुतोष के सामने छायी हो। लेकिन ओरिजनल ठण्ड तो सभी दल के नेता झेल रहे हैं। अब किसी विपक्ष के नेता से मत पूछ लीजिएगा ठण्ड और कोहरे के बारे में, नहीं तो हो सकता है कि कह दे- ये कोहरा भाजपा सरकार की गलत नीतियों के कारण हैं। कहाँ गए अच्छे दिन। फिर उसका ये सवाल किसी भाजपा नेता के सामने भी मत रख दीजिएगा, वरना ये जवाब आ सकता है- अच्छे दिन तो आ चुके हैं लेकिन कोहरे के कारण दिख नही रहे हैं।

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