जश्न का एक मौका है खिलाड़ियों का प्रदर्शन

By Independent Mail | Last Updated: Sep 5 2018 8:58PM
जश्न का एक मौका है खिलाड़ियों का प्रदर्शन

जब हमारा राजनीतिक नेतृत्व कीचड़ उछाल प्रतिस्पर्धा में उलझा है, तब हमारे खिलाड़ियों ने जकार्ता एशियाड में देश का मान बढ़ाकर बता दिया कि भारत के असली रत्न कौन हैं। हां, आबादी के लिहाज से दुनिया में दूसरे नंबर पर होने के बावजूद भारत 'एशियाड' में भी पदक तालिका में आठवें स्थान पर नजर आया लेकिन मत भूलिए कि पदक आबादी के अनुपात में नहीं मिलते, वे तो खेल के मैदान में अपने जीवट और कौशल से जीतने पड़ते हैं। जकार्ता एशियाड का सबसे उजला पहलू यही रहा कि भारतीय खिलाड़ियों ने दिखा दिया कि जीवट में वे किसी से कम नहीं हैं लेकिन कौशल निखारने के लिए प्रशिक्षण और सुविधाओं की दरकार अवश्य है। वैसे, जकार्ता एशियाड में 15 स्वर्ण पदकों समेत कुल 69 पदक जीतकर अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने वाले भारत का 1951 के पहले ही एशियाड में 15 स्वर्ण पदक जीतना भी बताता है कि देश के नौनिहालों में प्रतिभा-क्षमता की कमी कभी नहीं रही। हां, उस प्रतिभा को कम उम्र में ही पहचान कर तराशते हुए अंतरराष्ट्रीय क्षमता में तब्दील कर सकने वाला तंत्र हम आज तक विकसित नहीं कर पाये। इसके बावजूद अगर हमारे खिलाड़ियों ने जकार्ता में यादगार प्रदर्शन करते हुए देश को रिकॉर्ड 69 पदक जितवाये हैं, तो जश्न तो बनता है। 15 स्वर्ण पदक तो हमने पहले एशियाड में भी जीते थे लेकिन यह पहली बार है जब 24 रजत भी जीते हैं। बेशक 2010 के एशियाड में भी भारत ने 65 पदक जीते थे लेकिन जकार्ता की उपलब्धि चार पदकों की वृद्धि से भी कहीं बड़ी है। इंचियोन में हम दो स्वर्ण पदकों समेत महज 13 पदकों पर सिमट गये थे लेकिन जकार्ता में 16 साल के सौरभ से लेकर 60 साल के प्रणब बर्मन तक ने भारत की शान बढ़ायी। 15 साल का शार्दुल विहान भी पदक जीतने में पीछे नहीं रहा। पदकों की संख्या का महत्व अपनी जगह है लेकिन भविष्य की दृष्टि से उससे भी कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है कि किस तरह की विषम पृष्ठभूमि से आये खिलाड़ियों ने गैर-परंपरागत खेलों में पदक जीते। जिस स्वप्ना बर्मन ने हेप्टाथलॉन में देश के लिए पहला स्वर्ण जीता, उसका मजदूर परिवार जिस गांव में रहता है, वहां जाने के लिए अब रातोंरात सड़क बनायी जा रही है। याद रहे कि जकार्ता या उसके अलावा भी अंतरराष्ट्रीय खेल स्पर्धाओं में पदक जीतकर भारत की शान बढ़ाने वालों में विषम पृष्ठभूमि से आने वाली स्वप्ना अकेली नहीं है। 16 साल के निशानेबाज सौरभ के पास साल भर पहले तक अभ्यास के लिए अपनी पिस्तौल तक नहीं थी जो पिता को कर्ज लेकर खरीदनी पड़ी। व्यवस्था के नाकारापन के बावजूद खिलाड़ियों का प्रदर्शन जश्न मनाने का एक मौका है।

  • वरिष्ठ स्तंभकार राजकुमार सिंह के ब्लॉग से
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