अमा जाने दो, पिद्दी बिस्कुट खाये और हम खिचड़ी...

By Independent Mail | Last Updated: Jan 18 2018 6:13PM
अमा जाने दो, पिद्दी बिस्कुट खाये और हम खिचड़ी...

 

नवल कान्त सिन्हा

 

पहले तो ये क्लीयर कर दूं कि मेरी शादी हुए कई साल गुजर गए हैं इसलिए मुझे ब्रांड खिचड़ी से कोई आपत्ति नहीं है। अब शुरू करता हूँ आगे की कहानी। जानकारी मिली कि देश के कई नवाब आजकल इतने परेशान हैं कि जितना रियासत जाते समय भी नहीं हुए थे। समझने की कोशिश की तो पता चला कि उनके तनाव की वजह खिचड़ी है। उनके हाइपरटेंशन की वजह सुनकर मेरा भी बीपी बढ़ गया। गुस्से में एक नवाब साहब के कारिंदे को फोन कर दिया। बोला- ‘इन नवाब साहबों को समझाओ, भला ये भी कोई वजह होती है तनाव की।’ कारिंदा तो फिर कारिंदा ठहरा। बोला नवाब साहब को नहीं समझाना, समझना तो आपको ही पड़ेगा। मैंने कहा- ‘कौन सी समस्या। अमा खिचड़ी खाना कम्पलसरी थोड़ी हो रही है।’ कारिंदा बोला- ‘समझिये, नवाब साहब तो नवाब ही हैं न। रियासत रही नहीं, कोठी की पुताई के पैसे पैसे कहां से लायेंगे।’ कारिंदे के इस रायते पर मेरे दिमाग का दही हो गया। मैंने कहा कि खिचड़ी में क्या सोना-चांदी डालेंगे। उसने कहा खफा मत होइए, लॉजिक समझिये। नवाब साहब ठहरे ब्रांड कांशस और खिचड़ी बन गयी है ब्रांड। इसलिए वो खायेंगे जरूर। अब खिचड़ी वो तभी खाते हैं, जब पेट नासाज़ हो। इसके लिए जरूरी है कि वो पहले मुगलाई पराठा, शाही कोरमा, मटन चाप, चिकन मलाई टिक्का, सींक कबाब, मुर्ग मुसल्लम, कुलचा नहारी, पनीर पसंदा, केसरिया खीर, शाही टुकड़ा और न जाने क्या-क्या खाएं। इससे उनका पेट खराब होगा। फिर जाकर खिचड़ी का नंबर आयेगा। मुझे भी समझ में आ गया कि पहले की प्रक्रिया इतनी कॉस्टली है कि नवाब साहब को खिचड़ी महंगी पड़ेगी। खैर, दुनिया में केवल दो ही तरह के लोग ही होते हैं, एक वो जो खिचड़ी खाते हैं और दूसरे वो जो खिचड़ी नही खाते हैं। इस हिसाब से तो खिचड़ी हमेशा से सुपर फ़ूड रही है। इसमें भी कोई शक नहीं कि अमीर और गरीब दोनों खिचड़ी खाते हैं लेकिन बस फर्क इतना है कि अमीर अक्सर डॉक्टर के कहने पर खिचड़ी खाते हैं और गरीब के पास अक्सर खिचड़ी ही उपलब्ध होती है। खिचड़ी के मुद्दे पर एक साहब का बयान आया कि वो सातों दिन खिचड़ी खाते हैं इसलिए सबसे बड़े देशभक्त हैं। इस पर एक ज्योतिषाचार्य खफा हो गए। बोले कि परम्पराओं को तोड़ने वाला कैसे देशभक्त हो सकता है। जिज्ञासा का भी निवारण कर दिया। बताया कि जैसे शनिवार को खिचड़ी खाना जरूरी होता है, उसी तरह से गुरूवार को खिचड़ी नहीं खाई जाती। अब जो परम्पराओं को तोड़कर गुरूवार को खिचड़ी खाता है, वो कैसे राष्ट्रभक्त हो सकता है।  बहरहाल ब्रांड खिचड़ी सामने है। अब तो बड़ी-बड़ी पार्टी में खिचड़ी होगी। लड़का हुआ तो खिचड़ी, चुनाव जीते तो खिचड़ी, लॉटरी खुली तो खिचड़ी, पास हो गए तो खिचड़ी, मीटिंग में खिचड़ी, डेटिंग में खिचड़ी, जिधर देखो उधर खिचड़ी। हालांकि शादीशुदा लोगों का हाल तो पहले जैसा ही रहेगा। उनके जीवन में पहले भी खिचड़ी थी और अब भी खिचड़ी ही रहेगी। उन्हें गम तो इस बात का है कि बीवी के मायकेवालों के आने पर जो बढ़िया खाना मिलता था, वो भी बंद हो जाएगा। इन शादीशुदाओं में जो पति खिचड़ी खाने से मनाकर खुद के मर्द होने का अहसास कराते थे, वो भी देशद्रोही होने के डर से चुप रहेंगे। अब राहुल गांधी का तो पता नहीं लेकिन खिचड़ी के ब्रांड बनने से राहुल गांधी का कुत्ता पिद्दी जरूर खुश है। उसकी खुशी का भी लॉजिक है। यानी पूरा देश खिचड़ी खायेगा और वो आज भी बिस्कुट खाकर खुद के ख़ास होने का अहसास करेगा। वैसे भी आजकल वो पहले से ही खुश है क्योंकि केवल एक हफ्ता बीता है और देश की ज़्यादातर लोगों ने ये स्वीकार कर लिया कि पिद्दी किसी चिड़िया को नहीं बल्कि राहुल गांधी के कुत्ते को कहते हैं। कन्फर्म करने के लिए मैंने कई लोगों से पूछा भी कि पिद्दी कौन है और सबने एक स्वर में बताया कि राहुल गांधी का कुत्ता। यानी खिचड़ी के इस दौर में लोग न तो असली पिद्दी को पहचान पा रहे हैं और न पिद्दी के शोरबे को। उधर भाजपा नेताओं पर दबाव बढ़ गया है, अब उनके सामने अपने कुत्ते को खिचड़ी खिलाते हुए वीडियो वायरल करने की चुनौती है। मेरा कन्फ्यूज़न अलग है, जिस देश का राष्ट्रीय पशु बाघ हो, वहां मुख्य भोजन खिचड़ी हज़म नहीं हो रही। लेकिन डेयरी और कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने के लिए खिचड़ी की ब्रांडिंग भी जरूरी थी। बात समझ में नहीं आयी तो समझ लीजिये। कहावत है कि खिचड़ी के चार यार, पापड़, घी, दही, अचार। यानी जब खिचड़ी खाने का चलन बढेगा तो पापड़, घी, दही, अचार की बिक्री भी बढ़ेगी। यानी डेयरी उद्योग और गृह उद्योग को बढ़ावा मिलेगा। कुल मिलाकर बात इतनी है कि हमें खिचड़ी के साथ दांत काटी रोटी जैसे संबंध बनाने होंगे। 

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