बहुत मतलबी हो गया है समाज

By Independent Mail | Last Updated: Sep 11 2018 11:48PM
बहुत मतलबी हो गया है समाज
  • वरिष्ठ पत्रकार विजय अमरापुरकर के ब्लॉग से

कभी-कभी ऐसी खबर आती है जिससे हमारा दिल दहल जाता है। दिल्ली के मोती नगर इलाके में सीवर के अंदर गये चार मजदूरों की फिर मौत हो गयी और एक जीवन और मौत के बीच झूल रहा है। बताने की आवश्यकता नहीं कि मजदूरों की मौत अंदर की जहरीली गैस से हुई। यह समझ से बाहर की बात है कि बार-बार इस तरह की ह्रदयविदारक त्रासदी के सामने आने के बावजूद सीवर में प्रवेश करने वालों को उनके भाग्य के भरोसे क्यों छोड़ दिया जाता है, उनके लिए किसी सुरक्षा कवच की व्यवस्था क्यों नहीं की जाती? अभी पता नहीं चला है कि यह सफाई नगर निगम द्वारा करायी जा रही थी या स्थानीय लोगों द्वारा? सफाई अगर निगम द्वारा करायी जा रही थी, तो उसने अक्षम्य अपराध किया है। संबंधित अधिकारियों और उनके मातहत कर्मचारियों पर हत्या का अभियोग चलाया जाना चाहिए। अगर स्थानीय नागरिक सफाई करा रहे थे, तो गलती उनसे भी हुई है। संभव है कि उन्होंने अपने पार्षद या निगम अमले को सीवर की खराबी के बारे में सूूचित न किया हो। यह भी हो सकता है कि सूचना के बावजूद निगम कर्मचारी आये न हों। कारण जो भी हो लेकिन इसका परिणाम तो मजदूरों की मौत के रूप में ही सामने आया है। कुछ अंतराल पर ऐसी घटनाएं अब खूब होने लगी हैं। इन पर कुछ दिनों तक चर्चा भी होती है लेकिन फिर वही स्थिति बन जाती है। सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट आदेश है कि बिना सुरक्षा वस्त्र दिये किसी भी मजदूर को सीवर के अंदर नहीं उतारा जा सकता। आखिर, जब दिल्ली में लगातार ऐसी त्रासदी सामने आने के बावजूद स्थिति में बदलाव नहीं हो रहा है, तो छोटे और सामान्य शहरों में क्या होता होगा, इसकी आसानी से कल्पना की जा सकती है। मरने वाले गरीब होते हैं, इसलिए यह राजनीतिक हंगामे का विषय नहीं बनता। मीडिया भी खबर छापकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेता है। यह खबर भी कोई नहीं रखता कि मृतकों के परिजनों को मुआवजा मिला या नहीं। कई बार तो मजदूरों के गांव आदि के बारे में ठीक से पता तक नहीं चलता। ऐसे में यह कैसे मान लिया जाए कि सीवर में मरने वालों के लिए जो मुआवजा घोषित होता है, वह उन तक पहुंच भी जाता होगा। हम यह भी नहीं सोचना चाहते कि इन मजदूरों के परिजन कैसे गुजर-बसर करते होंगे? क्या हमें यह स्थिति धिक्कारती नहीं है? समाज इतना असंवेदनशील कैसे हो सकता है जो इन मजदूरों के परिजनों की परवाह ही न करे।

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