जनता की जेब काटकर विधायकों की वेतन वृद्धि

By Independent Mail | Last Updated: Sep 24 2018 11:16PM
जनता की जेब काटकर विधायकों की वेतन वृद्धि

गुजरात में विधायकों ने अपने वेतन में 65 फीसद की बढ़ोतरी कर ली है। पहले इनका वेतन 70 हजार 727 रुपये प्रतिमाह था, जो अब एक लाख 16 हजार 316 रुपये हो गया है। वेतन बढ़ोतरी का विधेयक विधानसभा ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया। हालांकि, एक विधायक ने उसका विरोध भी किया लेकिन उनकी आवाज को सुना नहीं गया। उत्तराखंड में विधायकों को 2.91 रुपये प्रतिमाह मिलते हैं। वहीं, तेलंगाना में 2.50, झारखंड में 2.25, हिमाचल प्रदेश में 2.10, उत्तर प्रदेश में 1.95, हरियाणा में 1.63, जम्मू-कश्मीर में 1.60, दिल्ली में 1.34 लाख, असम 1.30 और राजस्थान में भी 1.30 लाख रुपये प्रतिमाह है विधायकों का वेतन। पंजाब के विधायकों का मासिक वेतन 1.15 लाख रुपये है। बहरहाल, गुजरात में विधायकों का वेतन ऐसे समय में बढ़ाया गया है, देश की आम जनता पेट्रोल-डीजल की बढ़ती कीमतों से त्रस्त है। यानी, गुजरात विधानसभा का यह फैसला जनता के जले पर नमक छिड़कने जैसा है। हो सकता है कि वेतन वृद्धि के पीछे विधायकों के अपने वाजिब तर्क हों लेकिन बीते सप्ताह पेट्रो उत्पादों की मूल्य वृद्धि के संदर्भ में केंद्रीय मंत्री रामदास अाठवले का बयान कि पेट्रो उत्पादों की मूल्य वृद्धि से उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता, आम जनता के प्रति नेताओं के नजरिये का सैम्पल है। अब नीतिगत बात पर आते हैं। लगभग सभी पेशों में वेतन बढ़ाने के कुछ मानक होते हैं। वहां कामकाज को आधार बनाया जाता है मगर विधायिका में इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है। गुजरात के विधायकों ने तो अपने टेलीफोन भत्ते में तक वृद्धि कर ली है। पहले यह भत्ता चार हजार रुपये मासिक था जिसे अब सात हजार रुपये कर लिया गया है, जबकि मुफ्त कॉल सुविधा के इस दौर में इस भत्ते का कोई मतलब ही नहीं बनता। अब समय आ गया है, जब जनप्रतिनिधि अपने लिए गुणवत्ता के कुछ मानक करें और उन्हीं के आधार पर अपना वेतन बढ़ायें। सरकार का खर्चा पेट्रो उत्पादों से मिलने वाले राजस्व से चल रहा है। केंद्र सरकार लगातार संकेत दे रही है कि वह पेट्रो उत्पादों पर लगने वाले करों में कटौती नहीं करेगी। गुजरात सरकार भी इन पर भारी कर वसूल रही है लेकिन उसने अपने विधायकों का वेतन बढ़ा दिया। यानी, जनता की जेब काटकर विधायकों का वेतन बढ़ाने का यह तरीका ठीक नहीं है। हैरत की बात है कि कांग्रेस ने भी इसका विरोध नहीं किया। सच तो यह है कि नेताओं में अपने हितों को लेकर गजब की सहमति होती है।

पत्रकार परिधि तिवारी की फेसबुक वॉल से...

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