समुद्र का खारा पानी अब बनेगा पीने लायक

By Independent Mail | Last Updated: Feb 7 2018 2:31PM
समुद्र का खारा पानी अब बनेगा पीने लायक

इंडिपेंडेंट मेल। हर साल देश के बड़े हिस्से पानी की किल्लत होती है। इसके बीच अब समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने की तकनीक विकसित होने की वजह से लोगों के लिए उम्मीद की नई किरण जगी है। वैज्ञानिकों ने ऐसा तरीका खोज निकाला है, जिसके जरिये समुद्र के पानी को पीने लायक बनाया जा सकेगा। इस तरह की तकनीक का ताजा उदाहरण पीएम नरेन्द्र मोदी की इजराइल यात्रा के दौरान देखने को मिला था।

मोदी को इजराइल के पीएम बेंजामिन नेतन्याहू के साथ समुद्र में एक ख़ास तरह की जीप में बैठे देखा गया था और यह गाड़ी समुद्र के पानी में चलते हुए समुद्री खारे जल को मीठे पेयजल में बदलने का काम करती है। उसके बाद नेतन्याहू ने भारत यात्रा पर आकर यह गाड़ी भारत को भेंट की और इससे गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) के लिए पीने लायक पानी बनाया जाएगा।

दुनिया में इजराइल इकलौता देश है, जिसने समुद्र के खारे पानी को पीने लायक बनाने की तकनीक ईजाद की है। ऐसा अनुमान है कि 2050 तक जब विश्व की 40 फीसदी आबादी जलसंकट झेल रही होगी, तब भी इजराइल में पीने के पानी का संकट नहीं होगा। दुनिया के वैज्ञानिक लगातार इस कोशिश में लगे हैं कि समुद्र के खारे पानी को पीने के लायक बना लिया जाए और ऐसा बड़े स्तर पर लगातार किया जा सके।

डिसेलिनेशन

डिसेलिनेशन या विलवणीकरण उन कई प्रक्रियाओं को कहते हैं, जिनसे पानी से नमक तथा दूसरे खनिजों को निकाला जाता है। खारे पानी को मीठे पानी में बदलने के लिए डिसेलिनेशन किया जाता है ताकि यह पीने के लायक या सिंचाई के लिए उपयुक्त बना रहे। कभी कभी इस प्रक्रिया द्वारा खाने वाला नमक एक सह-उत्पाद के रूप में बनता है। इसका प्रयोग समुद्री जहाज़ों और पनडुब्बियों में किया जाता है। उन क्षेत्रों में जहां ताज़े पानी की उपलब्धता सीमित है या हो रही है, वहां सस्ते ढंग से ताज़े पानी को उपलब्ध कराने के लिए आजकल डिसेलिनेशन पर ध्यान केन्द्रित किया जा रहा है।

बड़े पैमाने पर डिसेलिनेशन के लिए आम तौर पर अधिक मात्रा में ऊर्जा के साथ, विशेष बुनियादी सुविधाओं की आवश्यकता पड़ती है, जिससे इसकी लागत नदियों अथवा भूमि से प्राप्त ताज़े जल की तुलना में अत्यधिक बढ़ जाती है। दुनिया का सबसे बड़ा डिसेलिनेशन संयंत्र संयुक्त अरब अमीरात का जेबेल अली संयंत्र (चरण 2) है। यह एक दोहरे उद्देश्य वाली इकाई है जो मल्टी स्टेज फ़्लैश का प्रयोग करती है और प्रति वर्ष 300 मिलियन घन मीटर पानी का उत्पादन करने में सक्षम है।

इसकी तुलना में संयुक्त राज्य अमेरिका का सबसे बड़ा डिसेलिनेशन संयंत्र टेम्पा बे, फ्लोरिडा में है, जिसने दिसम्बर 2007 में प्रति वर्ष 34.7 मिलियन घन मीटर जल का डिसेलिनेशन शुरू किया। अंतर्राष्ट्रीय डिसेलिनेशन एसोसिएशन के अनुसार, दुनिया भर में 13,080 डिसेलिनेशन संयंत्र प्रति दिन 12 बिलियन गैलन से अधिक पानी का उत्पादन करते हैं।

पायलट प्लांट

भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (बार्क) के वैज्ञानिकों ने तमिलनाडु के कलपक्कम में एक पायलट प्लांट तैयार किया है। इस प्लांट में समुद्र के पानी को शुद्ध करने के लिए अपशिष्‍ट भाप (वेस्‍ट स्‍टीम) का उपयोग किया जाता है।  इस प्लांट की क्षमता प्रतिदिन 6.3 मिलियन लीटर पानी को शुद्ध करने की है। हालांकि इस समय कुडनकुलम न्‍यूक्लियर प्‍लांट में ताजे पानी को इस्‍तेमाल किया जा रहा है। वैज्ञानिकों ने ऐसा शोधन तरीका (फिल्टरेशन मेथड) भी खोज निकाला है, जिससे आर्सेनिक और यूरेनियम युक्‍त पानी को भी पीने लायक बनाया जा सकता है।

प्लांट में शुद्ध किए गए पानी में समुद्र के पानी जैसा खारेपन का स्‍वाद नहीं, बल्कि यह ताज़े और साफ़ पानी जैसा ही होगा। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर मुंबई के डायरेक्टर केएन व्यास के अनुसार, यूरेनियम-आर्सेनिक युक्त पानी को भी कम लागत में पीने लायक बनाया है। ऐसे कई प्लांट पंजाब के अलावा पश्चिम बंगाल में भी स्थापित किए गए हैं। उन्होंने बताया कि इतना ही नहीं 'बार्क ने ऐसी झिल्लियां भी विकसित की हैं, जिनके जरिये बेहद कम लागत पर यूरेनियम या आर्सेनिक युक्त पानी को साफ और शुद्ध करके पीने लायक बनाया जा सकता है।'

सफल टेस्ट हुआ

केंद्र सरकार के विज्ञान व प्रोद्यौगिकी विभाग के सहयोग से आस्ट्रेलिया की एक कंपनी की मदद से एक ऐसी तकनीक विकसित हुई है, जो पानी बर्बाद किए बगैर खारे पानी को मीठा बनाती है। हरियाणा के झज्जर के दिक्कल गांव में इस मशीन का सफल टेस्ट हो चुका है। सेंट्रल ग्राउंड वॉटर बोर्ड के पूर्व चेयरमैन और ग्लोबल हाइड्रो जियोलॉजिकल के अध्यक्ष डॉ. डीके चड्ढा के मुताबिक अभी तक जिस आरओ सिस्टम से पानी साफ किया जाता है उसमें काफी मात्रा में पानी बर्बाद हो जाता है। इस तकनीक में जमीन के अंदर पानी के दो भंडार के लिए ड्रिलिंग की जाती है। अंदर ही पानी को मेंब्रेन के जरिए साफ किया जाता है, जबकि ट्रीटमेंट के दौरान बर्बाद होने वाले पानी को जमीन के अंदर ही डाला जाता है। इससे अंडरग्राउंड वॉटर लेवल पर असर नहीं पड़ता। खारा पानी जमीन के अंदर ना जाए इसके लिए पाइप के दोनों ओर सीलिंग कर दी जाती है।

एक साधारण मशीन प्रति घंटा 600 लीटर से 800 लीटर पानी जमीन से निकालकर साफ करती है। यानी एक दिन में 12 हजार लीटर खारे पानी को मीठे पानी में तब्दील किया जा सकता है। इसकी क्षमता एक दिन में 60 हजार लीटर तक बढ़ाई जा सकती है।

ब्रिटेन में प्रयोग

ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी ऑफ़ मैनचेस्टर के वैज्ञानिकों के एक दल ने ग्रैफीन की एक ऐसी चलनी विकसित की है, जो समंदर के खारे पानी से नमक को अलग कर देती है। ग्रैफीन ग्रैफाइट की पतली पट्टी जैसा तत्व है, जिसे प्रयोगशाला में आसानी से तैयार किया जा सकता है। ग्रैफीन ऑक्साइड से निर्मित यह छलनी समुद्र के पानी से नमक अलग करने में सक्षम है, लेकिन इससे उत्पादन बहुत महंगा पड़ता है।

नैनो टेक्नोलॉजी का उपयोग

अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने बेहद सस्ती तकनीक से खारे पानी को मीठे पानी में बदलने का दावा किया है। वहां एक विशेष प्रकार की फंगस से नैनो सामग्री तैयार की, इसकी माप नैनो मीटर से होती है। इनमे पहले छेद किया गया जिनसे केवल पानी ही रिस कर बाहर निकला है, अन्य लवणयुक्त कण फंगस के ऊपर ही रहे जाते हैं। इस पानी को साफ करने के लिए विषेश प्रकार का फिल्टर बनाया जाएगा, जिसमें नैनो सामग्री डाली जाएगी। जब खारे पानी को यहां से प्रवाहित किया जाएगा तो वह शुद्ध होकर निकलेगा।

समुद्र का पानी पीने लायक नहीं

नीति आयोग के एक आकलन के अनुसार दुनिया के मुकाबले भारत की आबादी 17 प्रतिशत है, लेकिन इसी तुलना में साफ पानी सिर्फ 4 फीसदी उपलब्ध है। समस्या तब और बढ़ जाती है, जब इस उपलब्ध जल का असमान वितरण होता है। आकलन में कहा गया है कि भारत में फिलहाल प्रति व्यक्ति 1700 से 1000 क्यूबिक मीटर जल उपलब्ध है। वैश्विक पैमानों पर देखें तो यदि प्रति व्यक्ति 1554 क्यूबिक मीटर जल ही उपलब्ध है, तो यह पानी के भीषण संकट का संकेत है। इस तरह से भारत एक गंभीर जल संकट वाला देश है, क्योंकि यहां जल उपलब्धता इससे भी नीचे है।

पृथ्वी का 71 प्रतिशत हिस्सा पानी में डूबा हुआ है, 1.6 प्रतिशत पानी धरती के नीचे है और 0.001 फीसदी वाष्प और बादलों के रूप में है। पृथ्वी की सतह पर जो पानी है, उसमें 97 प्रतिशत सागरों और महासागरों में है, जो नमकीन होने के कारण पीने लायक नहीं है। कुल उपलब्ध पानी में से केवल तीन प्रतिशत पानी ही पीने योग्य है। इसमें से 2.4 फीसदी हिमखंडों के रूप में उत्तरी और दक्षिणी ध्रुवों पर बर्फ के रूप में जमा हुआ है। भूगर्भीय जल भण्डारों का बेइंतहा दोहन करने और शुद्ध पानी के प्राकृतिक भण्डारों के ऊपर बहुमंजिला इमारतें खड़ी किए जाने से कई शहरों में भूजल समाप्त होने की स्थिति में है। इनमें सबसे बुरा हाल मुंबई का है। मुंबई में जिस तेजी से जल दोहन किया जा रहा है, उससे लगता है कि 2030 तक मुंबई के मीठे पानी के जल भण्डार खाली हो जाएंगे। मुंबई जैसा हाल ही अन्य महानगरों का है।

समुद्र के खारे जल को मीठे पानी में बदलने की यह प्रक्रिया आसान नहीं है। नमक छान कर समुद्री जल को मीठे पानी बनाने में फिलहाल थर्मल डिसेलिनेशन तकनीक को काम में लाया जा रहा है, पर रिवर्स ऑस्मोसिस के इस काम की लागत काफी ज्यादा है। डिसेलिनेशन की प्रक्रिया में बहुत अधिक ऊर्जा खर्च होती है, जो उससे मिलने वाले पानी को बेहद महंगा बना देता है। हालांकि ऑस्ट्रेलिया जैसे देश मुख्यत: इसी प्रक्रिया पर निर्भर हैं, क्योंकि उनके अन्य जल स्त्रोतों से जरूरत के मुताबिक पानी नहीं मिल पाता। फिलहाल, भारत जैसे देश में इस तरह डिसेलिनेशन से मिलने वाले पानी की मौजूदा कीमत 50-55 रुपए प्रति लीटर बैठती है, जो बोतलबंद पानी से कई गुना ज्यादा है।

लेकिन डिसेलिनेशन की लागत को कम करना होगा क्योंकि आखिर में हमारे पास समुद्र ही होंगे जहां पानी होगा। निश्चय ही भविष्य की जरूरतों के लिहाज से इन प्रयोगों को अमल में लाते वक्त हमें बाकी दुनिया के अनुभवों पर गौर करना चाहिए। डिसेलिनेशन की इन योजनाओं को लेकर सबसे बड़ा ऐतराज आर्थिक है पर रिवर्स ऑस्मोसिस यानी नमक छान कर मीठा पानी बनाने की लागत हर साल घट रही है, लेकिन अब भी यह मौजूदा वाटर सप्लाई से काफी महंगी है।

पानी की कमी पूरी करने के लिए पिछले कुछ समय से जो समाधान सुझाए जा रहे हैं, उनमें से एक है कि हिमालय के ग्लेशियरों से पाइप-लाइनें बिछाई जाएं जो उत्तर भारत को पानी सप्लाई करें। हालांकि पर्यावरणविद् ऐसी तकनीक के विरोधी हैं। उनका तर्क है कि बर्फबारी में साल-दर-साल कमी आने के कारण ग्लेशियरों से गंगा-यमुना नदियों को भी पर्याप्त पानी नहीं मिल पा रहा है। इस स्थिति में बदलाव भी आता नहीं दिख रहा है। इसलिए भारत को जरूरी है कि वह समुद्री जल को मीठे पानी में बदलने की प्रौद्योगिकी को जल्द से जल्द सरल रूप में विकसित कर ले।

 

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved