येरूशलम पर आमने–सामने

By Independent Mail | Last Updated: Dec 10 2017 12:29PM
येरूशलम पर आमने–सामने

इंडिपेंडेट मेल. अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने येरूशलम को इजरायल की राजधानी के तौर पर मान्यता देने का फैसला किया है. अभी येरुशलम ही इजरायल की राजधानी है लेकिन इसको अमेरिका समेत कई देशों की मान्यता नहीं है इसीलिए अमेरिका का दूतावास तेल-अवीव नमक शहर में स्थित है. अब अमेरिका के फैसले के बाद अमेरिकी दूतावास तेल अवीव से येरूशलम शिफ्ट हो जायेगा. डोनाल्ड ट्रंप का यह फैसला अमेरिका की बरसों पुरानी विदेश नीति में बहुत बड़ा बदलाव है. इस फैसले का अरब देशों में तगड़ा विरोध हुआ है और अब आगे खून खराबा होना तय है. वजह ये है कि इजरायल और फलिस्तीन दोनों ही जगह के लोग येरूशलम को पवित्र मानते हैं और उसे अपना हिस्सा बताते हैं. दोनों के बीच इसे लेकर काफी लंबे वक्त से संघर्ष चल रहा है. इजरायल हमेशा से येरूशलम को अपनी राजधानी बताता रहा है,  वहीं फिलिस्तीन का दावा है कि पूर्व येरूशलम आने वाले वक्त में बनने वाले फिलिस्तीन राज्य की राजधानी है. येरूशलम 1948 में राज्य बना, तब से अबतक किसी भी देश ने इसे इजरायल की राजधानी का दर्जा नहीं दिया था, अमेरिका ऐसा फैसला करने वाला पहला देश बना है. भारत ने अभी तक येरुशलम को इजरायल की राजधानी के रूप में मान्यता नहीं दी है

क्या है येरुशलम

·         करीब साढ़े नौ लाख आबादी वाले येरुशलम के मायने हैं पवित्र और अरबी भाषा में इसीलिए इस जगह का नाम ‘अल-क़ुद्स’ है.

·         येरुशलम भूमध्य सागर और ‘मृत सागर’ (डेड सी) के बीच स्थित शहर येरुशलम का इतिहास काबा, काशी, मथुरा, अयोध्या, रोम, कंधार जैसे प्राचीन शहरों की तरह ही है. हिब्रू में लिखी बाइबिल में इस शहर का नाम 700 बार आता है. यहूदी और ईसाई मानते हैं कि यही धरती का केंद्र है. राजा दाऊद और सुलेमान के बाद इस स्थान पर बेबीलोनियों तथा ईरानियों का कब्जा रहा फिर इस्लाम के उदय के बाद बहुत समय तक मुसलमानों ने यहाँ पर राज किया. इस दौरान यहूदियों को इस क्षेत्र से कई दफे खदेड़ दिया गया. दूसरे विश्व युद्ध के बाद इजरायल फिर से यहूदी राष्ट्र बन गया तो येरुशलम को उसकी राजधानी बनाया गया और दुनिया भर के यहूदियों को यहाँ बसाया गया। यहूदी दुनिया में कहीं भी हों, यरुशलम की तरफ मुँह करके ही उपासना करते हैं.

·         येरुशलम यहूदी, ईसाई और इस्लाम -  तीनों धर्मों की पवित्र नगरी है. यहूदियों का मानना है कि येरुशलम प्राचीन यहूदी राज्य का केन्द्र और राजधानी रहा है. यहीं यहूदियों का पवित्र सुलेमानी मन्दिर हुआ करता था, जिसे रोमनों ने नष्ट कर दिया था. ये शहर ईसा मसीह की कर्मभूमि रहा है और यहीं से हज़रत मुहम्मद स्वर्ग गए थे. येरुशलम इजरायल का एक महत्‍वपूर्ण पर्यटन स्‍थल भी है. इस शहर में 158 गिरिजाघर तथा 73 मस्जिदें हैं.

·         सन 1956 में जॉर्डन ने पूरे पूर्वी येरुशलम पर कब्जा कर लिया था. इसके बाद 1968 में हुये 6 दिन के अरब-इज़रायल युद्ध में इज़रायल ने सम्पूर्ण येरूशलम पर कब्जा कर लिया और इसे अपनी आधिकारिक राजधानी घोषित कर दिया.

कई बार नष्ट हुआ है येरुशलम

येरुशलम का विवाद बहुत ही पुराना है. दुनिया के सबसे पुराने शहरों में एक येरुशलम को कई बार जीता गया, ये कई बार तबाह हुआ लेकिन ये बार-बार उठ खड़ा हुआ. ईसाई और इस्लाम धर्म की शुरुआत से अपने लंबे इतिहास के दौरान, येरूशलम कम से कम दो बार नष्ट किया गया, इसे 23 बार घेर लिया गया, 52 बार इस पर हमला हुआ और कब्जा कर लिया गया। शहर का सबसे पुराना हिस्सा 4 सहस्राब्दी ईसा पूर्व बस गया था जबकि वर्ष 1538 में  शहर के चारों ओर दीवारों का निर्माण किया गया. आज उन दीवारों को चार तिमाहियों से जाना जाता है. इस शहर के चार हिस्से 19 वीं सदी के बाद से धर्म के आधार पर विभाजित हैं - अर्मेनियाई , ईसाई , यहूदी  और मुसलमान। यहूदी पश्चिम एशिया के उस इलाके में अपना हक जातते थे, जहां सदियों पहले यहूदी धर्म का जन्म हुआ था. यही वो जमीन थी जहां ईसाईयत का जन्म हुआ। बाद में इस्लाम का भी उदय यहीं से हुआ. मध्य काल तक इस इलाके में अरब फलिस्तीनियों की आबादी बस चुकी थी. जेहाद और क्रूसेड के दौर में सलाउद्दीन और रिचर्ड ने इस शहर पर कब्जे के लिए बहुत सारी लड़ाइयाँ लड़ी. इंग्लैंड से लड़ाके इस शहर को अपने कब्जे में करने के लिए आते थे जिन्हें क्रुसेडर्स कहा जाता था.

दूसरे विश्व युद्ध से पहले इजरायल का अस्तित्व नहीं था

·         ये जानना जरूरी है कि दूसरे विश्व युद्ध से पहले इजरायल का अस्तित्व नहीं था बल्कि यह इलाका फलस्तीन कहलाता था और इसपर 1922 से ब्रिटिश राज थाI लेकिन तब भी यहूदियों और फलिस्तीनियों के बीच संघर्ष जारी रहा करता था. दूसरे विश्वयुद्ध के बाद कुछ अरब संगठन ब्रिटिश राज के खिलाफ विद्रोह कर रहे थे वहीँ हजारों यहूदी शरणार्थी अपने ‘फादरलैंड’ यानी इजरायल में शरण मांग रहे थे. 1947 में ब्रिटिश साम्राज्य ने ऐसा उपाय निकलने की घोषणा की जिससे अरब और यहूदी दोनों संप्रदाय के लोग सहमत हों. संयुक्त राष्ट्र संघ ने इसी उपाय के तहत 29 नवम्बर 1947 को फलस्तीन के विभाजन को मान्यता दे दी. इस विभाजन में दो राज्यों का निर्माण होना था- एक अरब और एक यहूदी.

·         यहूदियों ने इस व्यवस्था को तुरंत मान्यता दे दी लेकिन अरब समुदाय ने इसको ख़ारिज कर दिया. इसी के साथ गृह युद्ध की स्थिति बन गई और करीब ढाई लाख फलिस्तीनी लोगों को अपना राज्य छोड़ना पड़ा. 14 मई 1948 को यहूदी समुदाय ने ब्रिटिश शासन से स्वतंत्रता की घोषणा कर दी और इजरायल को राष्ट्र घोषित कर दिया. इसके बाद सीरिया, लीबिया और इराक ने इजरायल पर हमला कर दिया. इसमें सऊदी अरब, यमन और मिस्र भी शामिल हो गए. लगभग एक वर्ष के बाद युद्ध विराम की घोषणा हुई और जोर्डन और इजरायल के बीच सीमा रेखा बना दी गई. मिस्त्र ने इस युद्ध में गाजा पट्टी पर कब्जा कर लिया.

·         1967 में छह दिन तक दूसरी अरब-इजरायइल जंग हुई. इस लड़ाई में इजरायल ने मिस्र के कब्जे वाले गाजा पट्टी समेत कई इलाके में कब्जा कर लिया. लेकिन मिस्र और अन्य अरब देशों ने इस तथ्य को कभी स्वीकार नहीं किया. मिस्री राष्ट्रपति अनवर सादात द्वारा 79 में ऐतिहासिक शांति समझौते और 90 के दशक में मैड्रिड शांति सम्मलेन के बाद कुछ हालात सामान्य हुए. जॉर्डन, मिस्र समेत कई अरब देशों के संग इजरायल के अलग-अलग समझौतों के बाद गाजापट्टी और पश्चिमी तट (वेस्ट बैंक) के इलाके में फलिस्तीनियों का शासन हो गया और फलस्तीनी नेता यासिर अराफात के जीवन काल तक पश्चिम एशिया में कुछ शांति रही लेकिन उनके बाद 2007 में गाजापट्टी में फलिस्तीनियों के आजादी के संघर्ष में कट्टर और आतंकी रणनीति को बढ़ावा देने वाले हमास का कब्जा हो गया. आज की तारिख में यासिर आराफात का गुट रामल्ला से येरुशलम के पश्चिमी तट पर प्रशासन चलाता है जबकि गाजा पट्टी हमास के कब्जे में है. गाजा पट्टी और रामल्ला में बसे फलिस्तीनी मुस्लिम येरुशलम को इजरायल के कब्जे से आजाद कराना चाहते हैं.

मुस्लिम – ईसाई - यहूदी सबका पवित्र स्थल है येरुशलम

सोलोमन टेंपल : बाइबिल में इसका उल्‍लेख प्रथम मंदिर के नाम से मिलता है. हिब्रू सम्प्रदाय के इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्‍दी ईसा पूर्व में हुआ था लेकिन बेबीलोन के शासकों ने 586 ई. में इसे तोड़ डाला था. बाद में यह मंदिर फिर से बनाया गया। आज भी इस मंदिर के अवशेषों को देखा जा सकता है.

वेस्‍टर्न वॉल : इसे ‘कोटेल’ के नाम से भी जाना जाता है. पुराने शहर में स्थित यह दीवार यहूदी धर्म से संबंधित है. असल में ये दीवार यहूदियों के दूसरे मंदिर का बचा हुआ भाग है. सन 1956 में जॉर्डन ने पूरे पूर्वी येरुशलम पर कब्जा करके यहां मलबा भरवा दिया था और ये 1968 तक उसी हालत में रही. इसके बाद इजरायल ने पुनः येरुशलम पर कब्जा कर लिया और इस यहूदी मंदिर को ठीक करवा कर इसे सारी दुनिया के लिए खोल दिया गया. इसे ‘वेलिंग वाल’ (दुःख की दीवार)  भी कहते हैं लेकिन यहूदी इस नाम को अपमानजनक मानते हैं और इसका उपयोग नहीं करते. यहूदी इसे ‘पवित्र दीवार’ कहते हैं. इस दीवार में बने छेदों में लोग मनौती लिखी पर्चियां डालते हैं ताकि वो यहूदी ईश्वर ‘यहोवा’ तक पहुँच जायें. ‘कोटेल’ में यहूदियों की सबसे पवित्रतम जगह है. यहूदी मानते हैं यहीं पर सबसे पहली उस शिला की नींव रखी गई थी, जिस पर दुनिया का निर्माण हुआ, जहां अब्राहम ने अपने बेटे इसाक की कुरबानी दी थी.

ये एक सबसे विवादित धर्मस्थल भी है, क्योंकि मंदिर के बीच वाले स्थान पर मुसलमानों का ‘डोम ऑफ रॉक’ स्थल है जहाँ मान्यता के अनुसार पैगंबर मोहम्मद यहीं से जन्नत में अल्लाह से मिलने गए थे.

सेपुलकर चर्च : येरुशलम के ईसाई हिस्से में पवित्र सेपुलकर चर्च है, जो दुनियाभर के ईसाइयों के लिए ख़ास है. ईसाई मान्यताओं के अनुसार, ईसा को यहीं सूली पर लटकाया गया था. इसे कुछ लोग गोलगोथा कहते हैं या कैलवेरी की पहाड़ी भी. सेपुलकर में यहीं वो जगह भी है जहां ईसा फिर जीवित हो गए थे. इस चर्च का प्रबंध संयुक्त तौर पर ईसाइयों के अलग-अलग संप्रदाय करते हैं. ये दुनियाभर के ईसाइयों का मुख्य तीर्थस्थल हैI श्रद्धालु ईसा के खाली मकबरे की यात्रा करते हैं और यहां प्रार्थना करके उद्धार और सुख की कामना करते हैं.

डेविड्स डोम : यह गुम्‍बद पुराने शहर में जियोन पहाड़ी पर बना हुआ है. हिब्रू बाइबिल के अनुसार डेविड को यहीं पर दफनाया गया था.

येरुशलम की अल अक्सा मस्जिद पर है विवाद

पुराने येरुशलम में 35 एकड़ की टेंपल माउंट पहाड़ी पर बनी विशाल अल अक्सा मस्जिद पर बहुत पुराना विवाद है. मस्जिद के कुछ हिस्से की सुरक्षा इजरायल के हाथ में है पर उसके रख-रखाव और भीतर प्रवेश करनेवाले दर्शनार्थियों को इजाजत देने का काम एक ट्रस्ट करता है, जिसमें जॉर्डन सरकार का हस्तक्षेप है. मस्जिद का लायंस गेट वह गेट है, जिससे पूर्वी येरुशलम में रहने वाले मुसलमान प्रवेश करते हैं. इस गेट के सामने वेस्टर्न वाल है, जिसे यहूदी ‘सेकेंड टेंपल’ का हिस्सा मानते हैं, और उस दीवार से मुखातिब होकर यहूदी प्रार्थना करते हैं.

वर्ष 1967 के युद्ध के बाद इजरायली पुरातत्व विभाग ने अल अक्सा मसजिद के दक्षिण-पूर्व हिस्सों की कई बार खुदाई कर भग्नावशेषों को जुटाया, और यह तथ्य स्थापित करने की कोशिश की है कि ईसा पूर्व एक हजार साल पहले यहां पर यहूदियों के राजा किंग सोलोमन ने पहला मंदिर बनाया था, जिसे बाद में रोमन शासकों ने तबाह करने की चेष्टा की थी. इजरायल के अनुसार यह वह पवित्र स्थल है, जहां तीन हजार साल पूर्व ईश्वर ने धूल-मिट्टी से आदम की संरचना की थी और कई हजार साल बाद अब्राहम ने ईश्वर में अपना विश्वास जताने के वास्ते अपने बेटे की बलि देने का संकल्प किया था.

मुस्लिम लोग मक्का में काबा और मदीना के बाद अल अक्सा मसजिद को दुनिया का तीसरा पवित्र स्थान मानते हैं. ऐसी मान्यता है कि हजरत मुहम्मद मक्का से दो हजार किलोमीटर दूर यरुशलम रातों रात पहुंचे, और अल अक्सा मसजिद वाली जगह पर आराम फरमाया. यहाँ नीचे चट्टान पर उन्होंने नमाज पढ़ी थी, और फिर स्वर्ग की ओर प्रस्थान कर गये थेI यही वह जगह है, जहां से पांचों वक्त नमाज पढ़ना तय हुआ था. कोई 1300 साल पहले खलीफा अल वालिद अब्दुल मालिक बिन मारवान ने अल अक्सा मसजिद का निर्माण कराया था.

येरुशलम के प्रमुख स्‍थल

इजरायल संग्रहालय : यह इजरायल का सबसे बड़ा म्‍यूजियम है जिसमें प्राचीनतम ग्रंथ रखे हुए हैं. यहाँ प्राचीन शहर का मॉडल भी रखा हुआ है.

याद भसीम : यह देश का होलोकास्ट (नाज़ी जर्मनी में यहूदियों का संहार) म्‍यूजियम है.

नोबेल अभयारण्य : 35 एकड़ में फैला यह अभयारण्य पुराने शहर के मुस्लिम भाग में है. यहाँ मुस्लिम काल के उम्‍मैयद शासन से लेकर ऑटोमन शासन के दौरान बनी महत्‍वपूर्ण इमारतों को संरक्षित कर के रखा गया है. यह इस्लामी शिक्षा का महत्‍वपूर्ण केंद्र भी है.

कुव्‍वत अल सकारा : यह इमारत नोबेल अभयारण्य के बीच में है और अल अक्‍सा मस्जिद का ही महत्वपूर्ण हिस्सा है. यह येरुशलम का सबसे महत्‍वपूर्ण भाग माना जाता है। इस इमारत का गुंबद सोने का बना हुआ है.

 

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