तरह-तरह के सुरक्षा घेरे

By Independent Mail | Last Updated: Dec 6 2017 1:06PM
तरह-तरह के सुरक्षा घेरे

इंडिपेंडेंट मेल. भारत में वीआईपी लोगों को तरह तरह की सुरक्षा मिली हुयी है. अभी केंद्र सरकार ने लालू प्रसाद यादव, मौलाना बुखारी समेत 7 लोगों की सुरक्षा में कटौती की है जिससे विवाद पैदा हो गया है. लेकिन ये तरह-तरह की सुरक्षा है क्या और इनमें क्या फर्क होता है? जेड सिक्योरिटी, वाई सिक्योरिटी जैसी अलग-अलग केटेगरी के तहत सुरक्षा प्रदान की जाती है. अभी भारत में प्रमुख रूप से चार सुरक्षा श्रेणियां हैं. इनमें जेड प्लस (36 सुरक्षाकर्मियों का घेरा), जेड (22 सुरक्षाकर्मियों का घेरा), वाई (11 सुरक्षाकर्मियों का घेरा) और एक्स (2 सुरक्षाकर्मियों का घेरा) शामिल हैं. वैसे ये सब जानते हैं कि जान-माल के खतरे से अधिक अपने साथ एक पुलिसकर्मी रखना रसूख वाले लोगों के लिए स्टेटस सिंबल बन गया गया है. केंद्र सरकार की तरफ से इस प्रवृति को खत्म करने के लिए कई कदम उठाए गए हैं. लाल बत्ती प्रतिबंधित करना ऐसा ही एक कदम है. आंतरिक सुरक्षा चूंकि राज्य का विषय है इस लिए राज्य सरकारें किसी भी व्यक्ति को पुलिस सुरक्षा देने के लिए अपने नियम बना लेती हैं. जिन लोगों को पुलिस सुरक्षा मिल रही है, उनमें से ज्यादातर लोगों ने अपनी जान को खतरा बताया है. वास्तविकता भले ही इसके विपरीत हो.

सुरक्षा वीआईपी की

एक ओर जहाँ वीआईपी लोगों के लिए जेड, वाई, जेड प्लस आदि सुरक्षा केटेगरी हैं और करीब 20 हजार वीआईपी की सुरक्षा में लगभग 56,944 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं वहीं 663 आम लोगों पर केवल एक पुलिसकर्मी का औसत बैठता है।एक वीआईपी की सिक्यूरिटी पर औसतन तीन पुलिसकर्मी हैं. इसके ठीक उलट आम जनता के लिए पुलिसकर्मियों की भारी कमी है. ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवेलपमेंट (बीपीआर ऐंड डी) के 2016 के आंकड़ों के अनुसार देश में कुल 19.26 लाख पुलिसकर्मी हैं. जिनमें से 56,944 पुलिसकर्मी केवल 20,828 लोगों की सुरक्षा में लगाए गए हैं. भारत के 29 राज्यों और सात केंद्र शासित प्रदेशों में वीआईपी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या औसतन पौने तीन लाख है. सिर्फ लक्षद्वीप देश का अकेला केंद्रशासित प्रदेश है, जहां किसी भी वीआईपी की सुरक्षा में पुलिसकर्मियों को तैनात नहीं किया गया है.

आम जनता किसके भरोसे?

आम जनता के लिए भारत आज भी विश्व का सबसे कम पुलिसकर्मियों वाला देश है. भारत में 663 लोगों पर औसतन एक पुलिसकर्मी है. चुनिन्दा ‘ख़ास’ लोगों को स्पेशल सुरक्षा देने के मामले में पूर्वी और उत्तर भारत सबसे आगे है. आम जनता की सुरक्षा के लिहाज से सबसे खराब स्थिति बिहार की है जहाँ 3,200 वीआईपी की सुरक्षा के लिए 6,248 पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं. वहीं बंगाल में कुल 2,207 वीआईपी हैं, जिसकी सुरक्षा 4,233 पुलिसकर्मियों को सौंपी गई है. तीसरे नंबर पर जम्मू-कश्मीर है जहां 4,499 पुलिसकर्मी 2,075 वीआईपी नागरिकों की सुरक्षा में तैनात हैं. वहीं वीआईपी कल्चर को पूरी तरह से खत्म करने की बात करने वाले यूपी के सीएम योगी आदित्यनाथ का राज्य भी इस मामले में ज्यादा पीछे नहीं है. उत्तर प्रदेश में कुल 1,901 वीआईपी की सुरक्षा में 4,681 पुलिसवाले तैनात हैं. उधर पंजाब में 1,852 वीआईपी लोगों की सुरक्षा में 5,315 पुलिस वाले तैनात हैं. हालांकि दिल्ली और मुंबई जैसे बड़े शहरों में वीआईपी लोगों की लिस्ट छोटे शहरों के मुकाबले में काफी कम है लेकिन इनकी सुरक्षा में तैनात पुलिसकर्मियों की संख्या काफी ज्यादा है. दिल्ली में जिन 489 नागरिकों को सुरक्षा प्रदान है, उनकी सुरक्षा में 7,420 पुलिसकर्मी तैनात हैं, जबकि महाराष्ट्र में सिर्फ 74 वीआईपी लोगों की सुरक्षा में 961 पुलिसकर्मी तैनात हैं. दक्षिण की बात करें तो केरल में सिर्फ 54 वीआईपी हैं, जिन्हें 214 पुलिसकर्मी सुरक्षा मुहैया करा रहे हैं.

देश की सुरक्षा श्रेणियां

·        जेड प्लस - 36 सुरक्षाकर्मियों का घेरा

·        जेड - 22 सुरक्षाकर्मियों का घेरा

·        वाई - 11 सुरक्षाकर्मियों का घेरा

·        एक्स - 02 सुरक्षाकर्मियों का घेरा

इन एजेंसियों पर है जिम्मा

·        स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप (एसपीजी)

·        नेशनल सिक्युरिटी गार्ड (एनएसजी)

·        भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी)

·        सेंट्रल रिजर्व पुलिस फोर्स (सीआरपीएफ)

·        दिल्ली पुलिस

कैसे मिलती है सुरक्षा

अगर किसी वीआईपी या नेता को जान का खतरा हो तो उसे सरकार की तरफ से सुरक्षा मुहैया कराई जाती है. ये सुरक्षा मंत्रियों को मिलने वाली सुरक्षा से अलग है। संबंधित व्यक्ति अपनी जान पर खतरे के बारे में सरकार से आवेदन करता है और सरकार खुफिया एजेंसियों के जरिए पता लगाती है कि खतरे की बात में कितनी सच्चाई है. यदि खतरे की पुष्टि होती है तो सुरक्षा मुहैया कराई जाती है. गृह सचिव, महानिदेशक और मुख्य सचिव की समिति यह तय करती है कि संबंधित व्यक्ति को किस श्रेणी की सुरक्षा उपलब्ध कराई जाए. हालांकि राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट जज, राज्यों के गवर्नर, मुख्यमंत्री और कैबिनेट मंत्री अपने आप ही सुरक्षा के पात्र हो जाते हैं.

कौन करता है सुरक्षा

पुलिस के साथ साथ कई एजेंसियां हैं जो वीआईपी, वीवीआईपी को सुरक्षा कवर मुहैया कराती हैं. जैसे स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप एनपीजी, राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड एनएसजी, भारत तिब्बत सीमा पुलिस आईटीबीपी और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल सीआरपीएफ. वैसे तो विशिष्ट व्यक्ति की सुरक्षा का जिम्मा एनएसजी के कंधों पर ही होता है, लेकिन जिस तरह से जेड प्लस सुरक्षा लेने वालों की संख्या में इजाफा हुआ है उसे देखते हुए सीआईएसएफ को भी यह काम सौंपा जा रहा है. मौजूदा वक्त में एनएसजी 15 लोगों को जेड प्लस सुरक्षा दे रही है, जबकि सीआईएसएफ भी कुछ को यह सुरक्षा मुहैया करा रही है.

क्या होती हैं श्रेणियां

जेड प्लसः इसके तहत 36 जवानों को सुरक्षा में लगाया जाता है, जिसमें 10 से अधिक एनएसजी कमांडो और पुलिस अधिकारी शामिल होते हैं. अधिकतर नेता इस सुरक्षा घेरे की जुगत में लगे रहते हैं। प्रधानमंत्री, पूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिजन को जेड प्लस सुरक्षा मिली है. इन लोगों की सुरक्षा का दायित्व एसपीजी का है. हालांकि प्रधानमंत्री के सुरक्षा दस्ते में एसपीजी के अलावा एनएसजी अधिकारी भी होते हैं.

जेडः इस श्रेणी में 22 जवान सुरक्षा मुहैया कराते हैं, जिसमें 5 एनएसजी कमांडो के साथ पुलिस अधिकारी होते हैं. मुख्य रूप से कैबिनेट मंत्री, राज्यों के मुख्‍य मंत्री, हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के जज, प्रमुख राजनीतिज्ञ और वरिष्ठ नौकरशाहों को ये सुरक्षा मिली हैं.

वाईः इसमें संबंधित व्यक्ति को 11 जवानों का सुरक्षा कवच मिलता है, जिसमें 1 या 2 एनएसजी कमांडो  और पुलिसकर्मी शामिल होते हैं.

एक्सः 5 या 2 जवानों वाले इस सुरक्षा कवच में केवल सशस्त्र जवान ही शामिल होते हैं.

कौन करता है पीएम की सुरक्षा

प्रधानमंत्री की सुरक्षा का जिम्मा स्पेशल प्रोटेक्शन ग्रुप यानी एसपीजी उठाती है। वैसे भूतपूर्व प्रधानमंत्री और उनके परिजनों को भी यह सुरक्षा मिलती है, लेकिन केवल एक साल के लिए। हालांकि कुछ विशेष कानूनी प्रावधानों के जरिए यह सुविधा राजीव गांधी और अब उनके परिजनों को अनिश्चितकाल के लिए दी गई है.

इनकी सुरक्षा हो गयी कम

लालू प्रसाद की सुरक्षा को ‘जेड प्लस’ श्रेणी से घटाकर ‘जेड’ कर दिया गया है और उनको ब्लैक कैट कमांडो की तरफ से मुहैया कराए गए राष्ट्रीय सुरक्षा गार्ड (एनएसजी) कवर को भी हटा दिया गया है. इसके अलावा बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी की सुरक्षा को भी ‘जेड प्लस’ श्रेणी से घटाकर ‘जेड’ कर दिया गया है, केंद्रीय मंत्री हरिभाई पार्थिभाई चौधरी, जेडीयू के पूर्व अध्यक्ष शरद यादव, पूर्व चीफ जस्टिस टीएस ठाकुर, दिल्ली के पूर्व उपराज्यपाल नजीब जंग, पूर्व मुख्य निर्वाचन आयुक्त सैयद नसीम अहमद जैदी की भी सुरक्षा घटाई गई है. चौधरी की सुरक्षा को ‘जेड’ से घटाकर ‘वाई प्लस’ कर दिया गया है. लालू प्रसाद को आठ एनएसजी कमांडो के साथ एनएसजी और केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (सीआरपीएफ) के दो सिक्यूरिटी वाहन दिए किए गए थे अब नए निर्देशों के लागू होने के बाद उन्हें 35 सीआरपीएफ कमांडो ही दिए जाएंगे जबकि सभी आठ एनएसजी कमांडो को हटा दिया गया है.

अम्बानी को भी जेड सुरक्षा

रिलायंस इंडस्ट्रीज के मालिक मुकेश अंबानी देश के उन चुनिंदा 200 लोगों में शामिल हैं जिन्हें केंद्र की यूपीए सरकार ने जेड सुरक्षा दी थी. वैसे अंबानी ने इस सुरक्षा कवच का खर्च (करीब 14 लाख रुपये प्रति माह) खुद वहन करने का फैसला किया था.

पुलिस की कमी का रोना

केंद्र सरकार के अनुसार जनवरी 2015 तक भारत में पांच लाख पुलिसवालों की कमी थी. हाल ये है कि 90 फीसदी तक हमारे पुलिसवाले रोजाना नियत आठ घंटे से ज्यादा काम करते हैं. बीपीआरडी की रिपोर्ट बताती है कि 68 फीसदी पुलिसवाले रोजाना 11 घंटे से ज्यादा काम करते हैं जबकि 28 फीसदी पुलिसवाले 14 घंटे से अधिक काम करते हैं. करीब आधे पुलिसवालों का दुखड़ा है कि महीने में छुट्टी के दौरान उन्हें कम से कम आठ से दस बार ड्यूटी पर बुलाया जाता है. गृह मंत्रालय के अनुसार, 36 राज्यों और संघ शासित प्रदेशों में 1.72 करोड़ पुलिसवाले हैं जबकि पुलिस की संख्या 2.26 करोड़ होनी चाहिए. सरकारी अनिवार्य अनुपात के अनुसार, प्रति 547 भारतीयों पर एक पुलिस अफसर होना चाहिए, लेकिन वर्तमान में यह संख्या प्रति 720 भारतीयों पर एक पुलिस अफसर है. यह संख्या दुनिया में सबसे कम पुलिस-जनसंख्या अनुपात में से है. पुलिसकर्मियों पर काम का भारी दबाव है और इस वजह से वे मानसिक अवसाद से ग्रस्त हो जाते हैंI साइबर अपराधों की तादाद में लगातार वृद्धि ने पुलिसवालों के काम का बोझ और बढ़ा दिया है.

भारत की रैंकिंग बहुत नीचे

प्रति व्यक्ति जनता पर पुलिसवालों की 50 देशों की रैंकिंग में भारत नीचे से दूसरे स्थान पर है और हमारे नीचे केवल युगांडा का स्थान है. अमेरिका में प्रति 436 लोगों पर एक पुलिस अफसर है जबकि स्पेन में प्रति 198 लोगों पर और दक्षिण अफ्रीका में प्रति 347 लोगों पर एक पुलिस अफसर है. संयुक्त राष्ट्र के मानकों के अनुसार प्रति 454 लोगों पर एक पुलिस अफसर होना चाहिए. अगर इन मानकों का पूरा पूरा पालन किया जाये तो बिहार में तीन गुना से भी अधिक पुलिसकर्मियों की आवश्यकता है. यह भी समझने वाली बात है कि बिहार में तय भारतीय मानकों के अनुसार भी पुलिसकर्मियों की संख्या की तुलना में ढाई गुना अधिक पुलिस फ़ोर्स की आवश्यकता है. छत्तीसगढ़ में माओवादी उग्रवाद इलाका प्रति 574 लोगों पर एक पुलिस अफसर है, जोकि भारतीय मानक से अधिक दूर नहीं है.

हाल आम जनता की पुलिस का

·        वीआईपी सुरक्षा की बात अलग कर दें तो देश के चार सौ से ज्यादा थानों में एक अदद टेलीफोन तकनहीं है, लगभग दो सौ थानों के पास अपना एक भी वाहन नहीं है.

·        देश में कुल 15 हजार 55  थानों में से दस हजार 14 शहरी इलाकों में हैं और पांच हजार 25 ग्रामीण इलाकों में हैंI बाकी थाने रेलवे पुलिस के हैं.

·        पूर्वोत्तर के उग्रवादग्रस्त राज्य मणिपुर के 43 थानों में कोई फोन या वायरलेस सेट नहीं है

·        मध्य प्रदेश के 111 थानों में भी टेलीफोन नहीं है.

·        छत्तीसगढ़ के 161 थानों के पास अपना कोई वाहन नहीं है.

·        उत्तर प्रदेश में विकास के तमाम दावों के बावजूद 51 थानों में कोई टेलीफोन तक नहीं है.

 

 

 

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