चाबहार यानी भारत, अफगानिस्तान की बहार

By Independent Mail | Last Updated: Dec 5 2017 3:25PM
चाबहार यानी भारत, अफगानिस्तान की बहार

इंडिपेंडेंट मेल. दिसंबर 2017 का दिन भारत और ईरान के लिए बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी दिन ईरान के राष्ट्रपति ने चाबहार पोर्ट के पहले चरण का उद्घाटन किया है. भारतीय विदेश मंत्री सुषमा स्वराज भी ईरान में हैं. महत्वपूर्ण बात ये है कि ईरान ने चाबहार के प्रबंधन का कंट्रोल भारत को नियत समय से डेढ़ साल पहले ही दे दिया है. इस बंदरगाह के जरिए भारत-ईरान-अफगानिस्तान के बीच नया रणनीतिक ट्रांजिट रूट बना है, जिसमें पाकिस्तान की कोई भूमिका नहीं है. 

चाबहार पोर्ट के जरिए भारत को अफगानिस्तान, रूस या यूरोप माल भेजने के लिए वाया पाकिस्तान नहीं जाना पड़ेगा. अभी तक भारत को अफगानिस्तान जाने के लिए पाकिस्तान होकर जाना पड़ता था. अफगानिस्तान के पास अपना कोई समुद्री मार्ग नहीं है. वह अब तक पाकिस्तान पर निर्भर रहा है, जो अफगान उत्पादों के लिए काफी महंगा साबित हो रहा था. 

चाबहार बंदरगाह के बजरिये अफगानिस्तान को मध्य एशिया के देशों तुर्कमेनिस्तान, उजबेकिस्तान, किर्गिस्तान, ताजिकिस्तान, कजाकिस्तान तक सस्ता और सुलभ मार्ग मिल सकेगा. चाबहार का जिक्र मध्य कालीन यात्री अल बरूनी ने भी किया है और इसे भारतीय उपमहाद्वीप का प्रवेश मार्ग बताया था. इस प्रवेश मार्ग का इस्तेमाल भारत मध्य एशिया में अपनी मौजूदगी स्थापित करने के लिए करेगा.

चाबहार है सामरिक दृष्टि से बहुत महत्व्पूर्ण

  • बहार ईरान में सिस्तान और बलूचिस्तान प्रांत का एक शहर है जहाँ की जनसंख्या करीब 74 हजार है जिसमें अधिकाँश बलूच हैं. चाबहार में एक फ्री पोर्ट जो ओमान की खाड़ी के किनारे स्थित है। चाबहार बंदरगाह के साथ अफगान की सीमा तक सड़क और रेलवे का विकास होने से अफगानिस्तान और पूरे मध्य एशिया में भारत की पहुंच सुनिश्चित होगी. भारत पहले ही ईरान-अफगान सीमा पर जरांग से दिलराम तक रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण 200 किमी से ज्यादा लंबी सड़क बना चुका है.
  • चाबहार बंदरगाह सामरिक दृष्टि से अति महत्त्वपूर्ण है. इस बंदरगाह को जोड़ने वाली अफगानिस्तान में देलराम से जारांज तक की सड़क अफगानिस्तान के सभी बड़े शहरों से संपर्क करती है.
  • चाबहार स्वयं एक बड़े औद्योगिक क्षेत्र तथा यातायात केन्द्र के रूप में उभर रहा है और यह परियोजना दक्षिण-एशिया तथा मध्य एशिया के आर्थिक एकीकरण में मदद करेगी.
  • भारत चाबहार में लगभग 2 लाख करोड़ रुपए का निवेश करने की योजना बना रहा है. भारत ने ईरान से समुद्री मार्ग के द्वारा गैस पाइपलाइन लाने की योजना भी बनाई है, जिसके जरिये तुर्कमेनिस्तान और ओमान भी प्राकृतिक गैस भारत में भेज सकते हैं.
  • चाबहार-जाहेदान रेल लाइन बन गई तो भारत को खनिज उत्खनन और खनिज आयात के साथ-साथ अफगानिस्तान जैसा बड़ा बाजार मिल जाएगा. अफगानिस्तान के पास तांबा, लौह, क्रोम, यूरेनियम, जिंक, सोना, चांदी, बाक्साइट, सल्फर जैसे खनिजों और रूबी, लापिज जैसे रत्नों की भरमार. बामियान के पास चीन ने ‘रेयर अर्थ मेटल’ के विशाल भंडार का एकाधिकार अफगानिस्तान से प्राप्त कर भी लिया है.
  • चाबहार पाकिस्तान के ग्वादर से मात्र 72 किलोमीटर दूर है. चीन अपने यहाँ से ग्वादर तक 46 अरब डाला का आर्थिक गलियारा बना रहा चीन इस पोर्ट के जरिए एशिया में नए व्यापार और परिवहन मार्ग खोलना चाहता है.
  • गुजरात के कांडला पोर्ट से चाबहार की दूरी 650 समुद्री मील है, जिसे डेढ़ दिन की समुद्री यात्रा माना जा सकता है. मुंबई से चाबहार की दूरी 936 समुद्री मील है, वहां कार्गो पहुंचने में दो दिन लग सकते हैं. इसके अलावा भारत के मूंदरा पोर्ट से चाबहार 950 किलोमीटर की दूरी पर है.

 भारत की डील

अप्रैल 2001 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी तेहरान गए थे, तभी चाबहार बंदरगाह की योजना बन गई थी. जनवरी 2003 में ईरान के राष्ट्रपति मोहम्मद खतामी भारत आए और चाबहार समझौते पर दस्तखत हुए. लेकिन पोर्ट के विकास का समझौता 23 मई 2016 को भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, अफगान राष्ट्रपति अशरफ गनी और ईरानी राष्ट्रपति हसन रोहानी के बीच तेहरान में हुआ. इस पोर्ट के काम में इतने विलम्ब की वजह ईरान के खिलाफ समय-समय पर अमेरिका द्वारा लगाये गए आर्थिक प्रतिबन्ध है.

 29 अक्टूबर को न शुरूआत 

चाबहार से संपर्क की शुरुआत वैसे तो पिछले 29 अक्तूबर को ही हो चुकी है जब गुजरात के कांडला बंदरगाह से अफगानिस्तान के लिए भारत ने गेहूं की एक खेप चाबहार बंदरगाह को भेजी थी. ऐसी 5 और किस्तें जानी हैं और कुल मिला कर भारत 11 लाख टन गेहूं अफगानिस्तान भेज रहा है. गेहूं की किस्तें चाबहार से सड़क मार्ग से इस प्रांत की राजधानी जाहेदान से होते हुए अफगानिस्तान के निमरुज प्रांत की राजधानी जरांज तक पहुंचाई जाएगी. लगभग नौ सौ किलोमीटर दूरी के इस सड़क-मार्ग का अधिकांश हिस्सा ईरान में पड़ता है. जरांज से गेहूं की यह किस्त अफगानिस्तान के प्रमुख शहर डेलाराम पहुंचाई जाएगी. डेलाराम से काबुल और अफगानिस्तान के कंधार, हेरात, काबुल और मजार-ए-शरीफ शहर सीधे जुड़े हैं.

रूट 606

रूट नंबर 606 के नाम से प्रसिद्घ जरांज से डेलाराम की दो सौ अठारह किलोमीटर लंबी सड़क भारत ने तालिबानी आतंकवादियों के साये में बड़ी मुश्किलों से बनाई. तालिबान इस सड़क को बनने नहीं देना चाहता था और उसने इसपर काम करने वाले मज़दूरों और इंजिनीयरों पर कई हमले किये जिनमें तमाम लोगों की जानें गईं. इस सड़क के निर्माण में भारत ने 600 करोड़ रुपये खर्च किये हैंI यह सड़क 2009 में अफगानिस्तान के सुपुर्द कर दी गई थी.

मध्य एशिया में भारत की मौजूदगी

मध्य एशिया अपने खनिजों और ऊर्जा-स्रोतों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है और यहाँ रूस और चीन की उपस्थिति प्रमुखता से है लेकिन भारत यहाँ अपनी मौजूदगी दर्ज नहीं कर सका है. जमीनी रास्ता तो पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर और चीनी कब्जे वाले अक्साई चिन के कारण भारत के लिए बंद है. चाबहार बंदरगाह डेवलप होने से भारत का मध्य एशिया से सीधा संपर्क हो जाएगाI और अब समुद्री रास्ते से वाया ईरान भारत मध्य एशिया क्षेत्र में पैर जमा सकता है. इसके अलावा हिंद महासागर में भारत को घेरने की चीन की नीति और उसके एकतरफा ‘वन बेल्ट वन रोड’ को थोपने के प्रयासों को भी झटका लगेगा. भारत, ईरान और अफगानिस्तान के बीच व्यापारिक-सांस्कृतिक संबंधों की नई शृंखला शुरू भी होगी. इससे इस क्षेत्र में पाकिस्तान और चीन का दबदबा थमेगा. चाबहार की राह एकदम सुगम हो ऐसा भी नहीं है क्योंकि अमेरिका और ईरान के रिश्ते उतार-चढ़ाव भरे और अनिश्चित हैं. 

चाबहार और ग्वादर

चाबहार और ग्वादर दोनों ऐसे पोर्ट हैं जहाँ ईरान, पाकिस्तान, चीन और भारत के हित सामरिक और आर्थिक रूप से जुड़े हुए हैं. लेकिन दोनों बंदरगाहों में भिन्नताएँ भी हैंI चाबहार कई मायनों में ग्वादर से बेहतर है क्योंकि चाबहार गहरे पानी में स्थित बंदरगाह है. यह जमीन के साथ मुख्य भू-भाग से भी जुड़ा हुआ है, जहां सामान उतारने-चढ़ाने का कोई शुल्क नहीं लगता. इस बंदरगाह के दो हार्बर हैं - शाहिद कालांतरी, जहां से 25,000 टन क्षमता वाले बंकर (जहाजों के लंगर डालने के लिए जगह) हैं और - शाहिद बाहेश्ती, जहां 40,000 टन की क्षमता वाले बंकर मौजूद हैं.  इसके अलावा यहां कुशल कामगारों की भी कमी नहीं है और यहाँ चाबहार मैरीटाइम यूनिवर्सिटी भी स्थित है. चाबहार क्षेत्र का मौसम सामान्य रहता है और हिंद महासागर से गुजरने वाले समुद्री रास्तों तक भी यहां से पहुंच बहुत आसान है.

पकिस्तान को झटका

भारत और ईरान के लिए चाबहार परियोजना का बहुत महत्व है जबकि पाकिस्तान को लगता है कि अगर यह परियोजना सफल हुई तो वो अलग-थलग पड़ सकता है. पाकिस्तान के लिए ख़तरा यह है कि व्यापार में भारत-ईरान-अफ़ग़ानिस्तान का सहयोग, रणनीति और अन्य क्षेत्रों में भी बढ़ेगा और इसके पाकिस्तान के लिए नतीजे अच्छे कतई नहीं होने वाले. पाकिस्तान इस्लामिक जगत में ख़ुद को बड़ी ताक़त के रूप में पेश करना चाहता है और ईरान की मजबूती से उसकी कोशिशों को धक्का ही लगना है. ईरान उस लिहाज़ से उसका प्रतिद्वंद्वी भी हैI एक धार्मिक पहलू भी जुड़ा हुआ है कि ईरान शिया बहुल देश है जबकि पकिस्तान सुन्नी बहुल हैI इसके अलावा ईरान ही क्षेत्र का एकमात्र देश देश है जो अमेरिका के दबाव में नहीं है.

ईरान – भारत रिश्ते

  • भारत और ईरान के बीच राजनयिक सम्बन्ध 1950 में स्थापित हुए थे.
  • भारत उस दौर में रूस के करीब था जबकि ईरान अमेरिका के इसलिए भारत और ईरान में ज्यादा प्रगाढ़ता नहीं बनने पाई.
  • ईरान में 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद उसके अमेरिका से रिश्ते ठन्डे पड़ गए और भारत से ताल्लुकात कुछ मजबूत होने शुरू हुए.
  • ईरान द्वारा लगातार पाकिस्तान को सहयोग और ईरान-इराक युद्ध में भारत द्वारा इराक को समर्थन दिए जाने से हालात बिगड़ गए, लेकिन 90 के दशक में स्थितियां सुधरीं और दोनों देशों ने 2002 में रक्षा समझौता किया.
  • 1993 में तत्कालीन पीएम नरसिम्हा राव ईरान गए थे, जिसके बाद दोनों देशों के रिश्तों में सुधार आना शुरू हुआ.
  • 2003 में ईरानी राष्ट्रपति मोहम्मद खातमी दिल्ली आए और गणतंत्र दिवस परेड के मुख्य अतिथि बने.
  • 2008 में ईरानी राष्ट्रपति महमूद अहमदीनेजाद भारत यात्रा पर आए थे.
  • 2013 में अमेरिका ने भारत पर बहुत दबाव डाला कि वह ईरान से तेल लेना बंद करे और उससे अपने संबंधों पर रोक लगा ले लेकिन भारत किसी दबाव में नहीं आया.
  • 2009 में भी ऐसी ही स्थिति बनी थी लेकिन तब भारत दबाव में झुक गया था.
  • 22 मई 2016 को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ईरान यात्रा पर गए थे और इस यात्रा के दौरान कई समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए थे.

व्यापारिक रिश्ते

  • ईरान भारत का दूसरा सबसे बड़ा तेल सप्लायर है और रोजाना सवा चार लाख बैरल कच्चा तेल देता है.
  • इसके अलावा ईरान से पेट्रोलियम पदार्थ, केमिकल और मशीनरी भी भारत आयातकर्ता है. भारत से ईरान को निर्यात मुख्यतः चावल, मशीनरी, उपकरण, मेटल, स्टील, औषधियां, टेक्सटाइल, एग्रो केमिकल्स, रबर आदि का है. अमेरिका द्वारा ईरान पर तमाम तरह के प्रतिबन्ध लगाये जाने के बाद से भारत ने ईरान से तेल आयात में कटौती भी की है.
  • ईरान में भारत की एस्सार, टाटा स्टील, स्टेट बैंक ऑफ़ इंडिया आदि की मजबूत मौजूदगी है.
  • दोनों देशों के बीच कुच्ज संयुक्त उपक्रम भी हैं जैसे कि ईरानो हिन्द शिपिंग कंपनी, मद्रास फ़र्टिलाइज़र कंपनी और चेन्नई रिफाइनरी.
  • ईरान अपने तेल और प्राकृतिक गैस भंडार की वजह से दुनिया के अमीर मुस्लिम देशों में शामिल है.
  • 2014 में ईरान में प्रति व्यक्ति आय 1,73,770 डालर थीI इसको यूं भी समझ सकते हैं कि 2016 में भारत की प्रति व्यक्ति आय मात्र 6,490 डॉलर थी.

 

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved