जानिए ‘डार्क वेब’ का भेद

By Independent Mail | Last Updated: Dec 3 2017 11:40AM
जानिए ‘डार्क वेब’ का भेद

 

इंडिपेंडेंट मेल. डार्क और डीप वेब चर्चा में फिर है, इस बार बाजार नियंत्रक ‘सेबी’ ने इन्टरनेट के इस हिस्से में होने वाले कारनामों पर नज़र जमाई हैI सेबी सिर्फ ‘डार्क वेब’ ही नहीं बल्कि  ‘व्हाट्सऐप’ और ‘टेलीग्राम’ जैसे प्लेटफार्मों पर भी नजर रखेगा. यह काम मुखबिरों के जरिये किया जाएगा. असल में इन डीप-डार्क वेब और ‘टेलीग्राफ’ जैसे मेसेजिंग प्लेटफार्मों का इस्तेमाल बाजार और कंपनियों की अंदरूनी जानकारी का आदान-प्रदान करने के लिए किया जाता है. चूँकि इन प्लेटफार्म पर की गयी बात या लिखी गयी सामग्री पकड़ी नहीं जा सकती सो कोई कार्रवाई भी नहीं हो पातीI अब ऐसे तत्वों का राज बताने के लिए लोगों को प्रोत्साहित करने का फैसला किया गया है. बाजार को चढ़ाने उतारने में लगे लोग और समूह इंटरनेट पर ऐसी साइटों का इस्तेमाल करते हैं, जिनको गूगल जैसे सामान्यत: इस्तेमाल किए जाने वाले सर्च इंजनों के जरिए पकड़ना मुश्किल होता है. डार्क वेब और टेलीग्राम जैसे कई नए सुरक्षित मैसेजिंग ऐप को ट्रैक करना मुश्किल होता है. दो प्रमुख एक्सचेंज बीएसई और एनएसई ऐसे सिस्टम हैं जिनमें कोई भी एक टोल-फ्री फोन नंबर, ईमेल या सीधे अपनी वेबसाइट पर कोई भी गुप्त सूचना दे सकता है.

क्या है डार्क-डीप वेब

इंटरनेट का मतलब सिर्फ गूगल, वाट्सएप, फेसबुक, ट्विटर और तमाम वेबसाइटें ही नहीं होता है. इंटरनेट की एक और दुनिया बसती है, जिसे ‘डीप वेब’ या ‘डार्क वेब’ कहते हैं. इन्टरनेट की ये दुनिया कितनी बड़ी है इसका कोई अनुमान नहीं है. कहा जाता है कि सामान्य इन्टरनेट से 500 गुना तक बड़ा है डीप और डार्क वेब. चूँकि डीप वेब और डार्क वेब की कोई लिस्टिंग होती नहीं सो इसका आकार कितना फैलता जा रहा है ये कोई भी नहीं पता कर सकता.

इन वेबसाइटों को सर्फ करने, यहाँ से कुछ खरीदने पर पहचान छुपी रह जाती है, इसलिए आपराधिक गतिविधियों में इनका इस्तेमाल ज़्यादा होता रहा है. आसान भाषा में कहें तो डार्क वेब गूगल की तरह का सर्च इंजन नहीं है. न ही इसे क्रोम या सफारी जैसे सामान्य ब्राउजर से एक्सेस किया जा सकता है. डार्क वेब में अधिकांश सामग्री अजीबीगरीब और असमान्य चीजों, चुराए हुई निजी जानकारियों और शोध पत्रों व अनुसंधान में सेंध से भरी हुई है. आमतौर पर सार्वजनिक इंटरनेट पर ग़ैरकानूनी काम करने वालों तक सुरक्षा एजेंसियां आसानी से पहुंच जाती हैं, लेकिन डार्क वेब में साइबर अपराधी बड़े आराम से ग़ैरकानूनी गतिविधियां करते हैं, क्योंकि उनके पकड़े जाने का खतरा वहां कम होता है. तकनीक़ी जगत के कई लोग इसे साइबर जगत का अंडरवर्ल्ड भी कहने लगे हैं और इस आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता कि बैंकिंग और सुरक्षा से लेकर कई अहम जानकारियों से लैस इंटरनेट के लिए वेब का ये छिपा हिस्सा एक बड़ा ख़तरा बनकर उभरा है. समझा जाता है कि ‘ब्लू व्हेल’ गेम भी डार्क वेब की उपज है.

क्या है टॉर

इंटरनेट का वो हिस्सा जहां पर आम ब्राउज़र (क्रोम, फायरफॉक्स) से नहीं पहुंचा जा सकता वहां पहुंचाता है टीओआर (द ऑनियन रूटर) या ‘टॉर’ ब्राउज़र. यह ख़ास किस्म का ब्राउज़र है. इसे अमेरिकी नेवी रिसर्च लैब ने बनाया था ताकि इंटरनेट पर बिना ट्रैक हुए गुप्त रूप से सर्फिंग किया जा सके.

किसी साइट को खोलने पर जो डिजिटल चिह्न पीछे छूटते हैं, ‘टॉर’ ब्राउज़र उन्हें समझ पाना इतना कठिन बना देता है कि ब्राउज़िंग लगभग पूरी तरह गुप्त हो जाती है. दूसरा यह कि ‘टॉर’ में कई साइट ‘डॉट कॉम’ की जगह ‘डॉट ऑनियन एक्सटेंशन’ में खुलती हैं. ये साइट छुपी होती हैं और सिर्फ ‘टॉर’ पर ही दिखती हैं. गूगल और बिंग जैसे सर्च इंजन पर भी ये लिस्ट नहीं होतीं. वैसे ये भी समझ लेना चाहिए कि ‘टॉर’ का इसका इस्तेमाल सिर्फ पोर्नोग्राफी या आपराधिक गतिविधियों के लिए ही नहीं बल्कि पत्रकारिता, रिसर्च दस्तावेज और गोपनीय जानकारी भेजने के लिए भी किया जाता है.

तीन तरह के इंटरनेट

जिस इन्टरनेट का इस्तेमाल हम सब करते हैं वह समूचे इन्टरनेट का मात्र एक हिस्सा ही माना जाता है और बाकि बचे इन्टरनेट को आम जन कभी देख भी नहीं पाते. जो नेट सामान्य रूप से देखा जाता है उसको ‘सरफेस नेट’ कह सकते हैं. इस इन्टरनेट पर कोई भी आसानी से जा सकता है. सरफेस नेट की सामग्री को कोई भी सर्च इंजन (गूगल, याहू, बिंग आदि) असानी से पकड़ लेता है और हमको रिजल्ट दिखा देता है. सरफेस वेब की दुनिया में हम किसी भी वेबसाइट को एक सीमा में रहकर देख सकते हैं. यानी जितना उस वेबसाइट का मालिक दिखाना चाहता है बस उतना ही कोई देख सकता है. वेबसाइट के एडमिन एरिया को खोला नहीं जा सकता और न कोई प्राइवेट जानकारी देखी जा सकती है. कुछ चीजे इंटरनेट पर सर्च करते वक्त गूगल या कोई भी सर्च इंजन उस शब्द को दिखा नहीं पाता है. इसका मतलब यह है कि उससे संबंधित इंटरनेट पर कोई जानकारी नहीं है. या हो सकता है वह कंटेंट गूगल ने जानबूझकर छुपाया हो. क्योंकि गूगल कानून के दायरे में रहकर काम करता है जिससे किसी से देश या किसी समुदाय को हानि न हो. गूगल से कह कर सरकारें किसी भी चीज को हटवा सकती हैं. कई बार गूगल में ऐसा किया भी गया है.

डीप वेब

दूसरा इन्टरनेट है ‘डीप वेब’; इसको सर्च इंजन पकड़ नहीं पाते और आपके सर्च में इसका रिजल्ट दिखाई नहीं पड़ता. इसका इस्तेमाल गोपनीय जानकारी रखने के काम में किया जाता है. यहाँ जाने के लिए उस साईट का लिंक होना चाहिए. जो वेबसाइट ‘नो-इंडेक्स’ कोड का इस्तेमाल करके सर्च इंजन की निगाह से बच जाती हैं. क्लाउड स्टोरेज की वेब साइट्स इसका सबसे बड़ा उदहारण है जिनका कभी इंडेक्स नहीं किया जाता. ऑनलाइन बैंकिंग, व्यक्तिगत जानकारियां, कोई ईमेल, आदि डीप वेब के अंतर्गत मानी जायेंगी क्योंकि इनको एक्सेस करने के लिए स्पेशल यूआरएल और परमिशन की जरूरत होती है. इस तरह की वेबसाइट पर गोपनीय जानकारी सेव की जाती है, या सरकारी डाटा एक जगह से दूसरी जगह पर भेजा जाता है. या इस पर डेटा बेस बनाकर रखा जाता है या ईमेल लिस्टिंग की जाती हैI सरकारी दस्तावेज भी इसी प्रकार की साइट पर होती है. अनुमान है कि दुनिया में सबसे ज्यादा डीप वेब की साइट्स रूस के पास हैं.

डीप वेब के सर्च इंजन

·         वर्चुअल लाइब्रेरी

·         सरफेसवैक्स

·         आइसराकेट

·         स्टंपेडिया

·         फ्रीबेसटेक डीप वेब

डार्क वेब

तीसरा इन्टरनेट है डार्क वेब. यह इन्टरनेट की दुनिया का सबसे गहरा हिस्सा है. इस दुनिया में वैध और अवैध दोनों तरह के काम किये जाते हैं. इन साइट्स को कोई भी सर्च इंजन शो नहीं करता और न इनकी लिंक्स देता है. डार्क वेब का इस्तेमाल करने के लिए स्पेशल इंटरनेट ब्राउज़र की जरूरत पड़ती है जिसे ‘टोर’ ब्राउज़र कहते हैं. इसके इस्तेमाल से कोई भी यूजर अपना इन्टरनेट प्रोटोकॉल (आईपी) एड्रेस को छुपा सकता है. इससे इंटरनेट पर यूजर की पहचान गुप्त रहती है. डार्क वेब की कोई अथॉरिटी नहीं है. इसीलिए काली दुनिया भी कहा जाता है. किसी वेबसाइट को हैक कर उसके सभी यूजर्स का निजी डेटा चुरा लेने वाले या किसी मैलवेयर या रैनसमवेयर के जरिये यूजर्स की निजी जानकारी हैक करने वाले इसी वेब का इस्तेमाल करते हैं. इस तरह के डेटा और जानकारियों का सौदा डार्क वेब पर ही होता है. डेटा की कीमत इस आधार पर निर्धारित होती है कि इसे किस देश से चुराया गया है और इससे उस देश को कितना प्रभाव पड़ेगा. अगर किसी नामी शख्सियत का डेटा चुराया गया है, तो उसकी कीमत भी ज्यादा होगी. यहां वर्चुअल मनी से पेमेंट किया जाता है. इसके अलावा डार्क वेब में चाइल्ड पोर्न, अवैध हथियारों की तस्करी, इंसान की तस्करी, सायबर अपराध की योजना जैसे कामों को अंजाम दिया जाता है. यहां भी एक्सेस करना आसान नहीं होता है.

डार्क वेब की शुरुआत लगभग 10 साल पहले हुयी थी और तब इसका इस्तेमाल वैज्ञानिक रिसर्च और रक्षा सेवाओं के लिए किया जाता था. लेकिन समय के साथ तमाम ग़ैरकानूनी गतिविधियों के लिए इसका इस्तेमाल होने लगा. डार्क वेब की सामग्री एक्सेस करना अवैधानिक है सो इसकी कोशिश नहीं करनी चाहिए.

2001 में हुयी थी शुरुआत

कंप्यूटर विज्ञानी माइकेल बर्गमैन ने 2001 में ‘डीप वेब’ शब्द शुरू किया था. डीप वेब की सामग्री एचटीएमएल फॉर्म्स के पीछे छिपी होती है. इसमें तमाम ऐसी सामग्री होती है जिनको प्राप्त करने के लिए यूजर को पैसा देना पड़ता है, जैसे कि वीडिओ ऑन डिमांडI डीप वेब की सामग्री हासिल करने के लिए डायरेक्ट यूआरएल होना चाहिए या फिर विशिष्ट आईपी एड्रेस. 2001 में माइकेल बर्गमैन ने बताया कि इन्टरनेट पर सर्फिंग करना समंदर की सतह पर जाल फैलाने के सामान है. यानी कि जाल में आयेगा तो बहुत कुछ लेकिन समंदर की गहराइयों वाली चीजें पकड़ में नहीं आयेंगी. 

तर्क दूसरे भी हैं

ड्रग्स, चाइल्ड पोर्न, भाड़े के हत्यारे, प्रतिबंधित चीजें वगैरह, 'डार्क वेब’ को यही पहचान मिली हुई है. 2013 में जब 'सिल्क रोड’ नामक वेबसाइट का संचालक गिरफ्तार किया गया था तब बहुतों को इंटरनेट के छिपे हिस्से की जानकारी मिली. लेकिन जिस तरह डार्क वेब बना हुआ है उसमें यह पता कर पाना असंभव है कि किसी भी साइट में क्या चल रहा है.

लेकिन ब्राउजर 'टॉर’ जो छिपी हुई साइट्स तक पहुंचाता है, इसके ढेरों और विभिन्न प्रकार के वैधानिक इस्तेमाल भी हैं. डार्क वेब का विश्लेषण करने वाली कंपनी टेरबियम लैब्स ने तमाम ‘ओनियन साइट्स’ पर कुछ नए शोध किए हैं. इन साइट्स को इनके उद्देश्य और कंटेंट के आधार पर अलग अलग किया गया. शोध के नतीजों से पता चला कि आधी से ज्यादा साइट्स में गैरकानूनी चीजें हैं. लेकिन आधी साइट्स में वैधानिक सामग्री और उद्देश्य थे. ऐसी साइट्स में फेसबुक और प्रोपब्लिका जैसी साइट्स के प्रतिरूप, कंपनियों और राजनीतिक दलों की वेब साइट्स के अलावा तकनीक, गेम्स, प्राइवेसी आदि पर चैटिंग करने के फोरम पाए गए. सामान्य या साफ इंटरनेट की तरह बहुत सी वेबसाइट्स पोर्नोग्राफी से संबंधित थीं। जिन साइट्स को देखा गया उनमें 15 फीसदी से ज्यादा ऐसी साइट्स थीं जहां औषधियां और नशीली दवाएं बेची जाती हैं, हैकिंग, फ्रॉड, गैरकानूनी पोर्न और आतंकवाद से संबंधित साइट्स भी इनमें शुमार थीं.

टेरबियम के शोध ने डार्क वेब का बहुत ही छोटा हिस्सा देखा और इसका अध्धयन नहीं किया कि इंटरनेट के इस हिस्से पर लोग क्या देखने आते हैं. वैसे, एक अध्ययन के मुताबिक डार्क वेब पर 80 फीसदी से ज्यादा लोग चाइल्ड पोर्न साइट्स पर जाते हैं. लेकिन यह पता करना करना मुश्किल है कि यह कौन लोग हैं. यह भी पता करना मुश्किल है कि डार्क वेब में कितनी साइट्स होंगी. टॉर के ही मुताबिक उसके ब्राउजर से जिन छिपी साइट्स को देखा गया उनकी तादाद पिछले साल छह हजार थी.  टॉर के मुताबिक इसके नेटवर्क पर आने वाले कुल ट्रैफिक का मात्र दो फीसदी ही डार्क वेब पर गया. वैसे डार्क वेब की साइट्स की संख्या बीसों लाख हो सकती है. टेरबियम ने जिन साइट्स पर शोध किया उनके नतीजे इस प्रकार थे : 47 फीसदी वैधानिक साइट्स, 12.3 फीसदी ड्रग्स संबंधी, 6.8 फीसदी पोर्न साइट्स शामिल थीं. 

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