बलूचिस्तान-बाल्टिस्तान : पाकिस्तान का काला अध्याय

By Independent Mail | Last Updated: Dec 2 2017 3:24PM
बलूचिस्तान-बाल्टिस्तान : पाकिस्तान का काला अध्याय

इंडिपेंडेंट मेल. बलूचिस्तान और गिलगित-बाल्टिस्तान पकिस्तान के काले अध्याय हैं.इन इलाकों पर पकिस्तान के कब्जे के विरोध में लगातार संघर्ष जारी है लेकिन दमन के दम पर पकिस्तान वहां पैर जमाये हुए है. आमतौर पर बलूचिस्तान के हालात की जानकारी कम -देखने व पढ़ने को मिलती है, लेकिन बलूचिस्तान का सच यह है कि यह पाकिस्तान का सबसे बड़ा और सबसे पिछड़ा प्रांत है. बलूचिस्तान समूचे पाकिस्तान के क्षेत्रफल का 44 फीसदी है.

पाकिस्तान बनने के बाद से ही बलोच बाशिदों ने अपने अधिकारों की आवाज उठानी शुरू कर दी थी, लेकिन पिछले 70 साल में पाकिस्तानी सरकारों ने उनकी आवाज को अनसुना और उनकी दुर्दशा पर पर्दा डाल रखा है. यही कारण है कि पिछले कई दशकों के दौरान यहां कई बार खूनी संघर्ष हुआ, हजारों लोग मारे गए. अकबर बुग्ती समेत कई बलोच नेताओं ने अपनी जानें भी गंवाईं. बलोच महिलाएं देश-विदेश में विभिन्न मंचों पर अपनी कौम के हक में बेहद मजबूती से खड़ी हैं.

विश्व बलोच फोरम ने पाकिस्तानी सरकार व सेना की तरफ से बलूचिस्तान के लोगों पर ढाए जा रहे जुल्म रोकने के लिए भारत से मदद की अपील की है. फोरम ने भारत से कहा है कि वो नैतिक जिम्मेदारी को पूरा करने के लिए बलूचिस्तान में चल रहे नरसंहार को रोकने में आगे आकर अपनी भूमिका अदा करे, जबसे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पाक अधिकृत कश्मीर और बलूचिस्तान में मानवाधिकारों के उल्लंघनों का सवाल उठाया है, बलूच आन्दोलनकारियों के संघर्ष को बल मिला है. इन दोनों इलाकों के लोगों की उम्मीदें भारत से बहुत हैं.

बलूचिस्तान

राजधानी : क्वेटा

क्षेत्रफल : 3,47,190 वर्ग किमी

आबादी : 1,31,62,222

प्रांतीय असेंबली : 65 सीटें

जिले : 32

गिलगित- बाल्टिस्तान

बाल्टिस्तान में 2 जिले हैं

गिलगित में 5 जिले आते हैं

गिलगित- बाल्टिस्तान की आबादी 9,70,347 है, जबकि क्षेत्रफल है 72,971 वर्ग किलो मीटर

पाक-चीन आर्थिक गलियारे का विरोध

चीन और पकिस्तान मिल कर एक आर्थिक गलियारा बना रहे हैं जो बलूचिस्तान और गिलगित से हो कर गुजरेगा.इन दोनों ही इलाकों के लोग इस गलियारे का जबरदस्त विरोध कर रहे हैं.2442 किलोमीटर लंबा चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा दक्षिण-पश्चिमी पाकिस्तान में ग्वादर बंदरगाह से चीन के उत्तर-पश्चिमी स्वायत्त क्षेत्र शिंजियांग तक का है.इस गलियारे के जरिये तेल और प्राकृतिक गैस की डिलीवरी बहुत कम समय में की जा सकेगी. 2015 में लांच की गयी इस परियोजना पर 46 बिलियन डॉलर खर्च होने का अनुमान है.चूँकि यह गलियारा पाक अधिकृत कश्मीर से हो कर गुजरेगा इसलिए भारत को इसपर सख्त आपत्ति है.

क्या हैं बलूचिस्तान और गिलगित बाल्टिस्तान

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में बलूचिस्तान और गिलगित बाल्टिस्तान दोनों का ज़िक्र किया था.क्षेत्रफल के हिसाब से बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है, हालांकि चारों प्रांतों के मुक़ाबले वहां की आबादी सबसे कम है.इसकी सीमाएं ईरान और अफ़ग़ानिस्तान से मिलती है और ये प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल है.वहां गैस, कोयला, तांबा और कोयला के बड़े भंडार हैं  लेकिन इसके बावजूद अब भी बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे ग़रीब प्रांत है.

बलोच राष्ट्रवादी नेताओं का आरोप है कि पाकिस्तान की केंद्रीय सरकार उनका उत्पीड़न कर रही है और उन्हें उनके वाजिब अधिकार उन्हें नहीं दे रही है जबकि पाकिस्तान का कहना है कि वो बलूचिस्तान में अलगावादियों के ख़िलाफ़ लड़ाई जीत रहा है.बलोच कार्यकर्ताओं का कहना है कि पाकिस्तानी सेना वहां अपहरण, उत्पीड़न और हत्याएं कर रही है जिसके कारण वहां पाकिस्तान के ख़िलाफ़ भावनाएं भड़क रही हैं.

दशकों से नाराजगी

बलूचिस्तान के लोगों में नाराज़गी दशकों से रही है लेकिन चरमपंथ की ताज़ा लहर 2006 में उस वक़्त शुरू हुई जब पाकिस्तानी सेना ने बलोच क़बायली नेता नवाब अकबर बुगती को मार दिया था.बहुत से पाकिस्तानी राजनेता बलूचिस्तान को एक राजनीतिक समस्या मानते हैं और बातचीत के ज़रिए उसके शांतिपूर्ण समाधान के पक्ष में हैं लेकिन पाकिस्तान में आने वाली सरकारें इस दिशा में बहुत ज़्यादा कोशिश नहीं कर पाई हैं.बलूचिस्तान लिबेरशन आर्मी, बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट, यूनाइटेड बलोच आर्मी, लश्कर-ए-बलूचिस्तान, बलूचिस्तान लिबेरशन यूनाइटेड फ्रंट जैसे कई संगठन बलूचिस्तान की आज़ादी के लिए संघर्ष कर रहे हैं.

गिलगित- बाल्टिस्तान

भारत जिस हिस्से को 'पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर' कहता है, उसे पाकिस्तान में दो अलग अलग हिस्सों में बांटा गया है - एक है गिलगित- बाल्टिस्तान का इलाक़ा, जिसे पहले नॉर्दन एरिया के नाम से जाना जाता था और दूसरा वो जिसे पाकिस्तान 'आज़ाद कश्मीर' कहता है. गिलगित- बाल्टिस्तान की सीमाएं एक तरफ़ पाकिस्तान के ख़ैबर पख्तून ख्वाह प्रांत से लगती हैं तो दूसरी तरफ जम्मू कश्मीर से. इसी इलाके में सियाचिन क्षेत्र है.यह इलाका चीन और अफ़ग़ानिस्तान से भी सटा हुआ है. गिलगित बाल्टिस्तान शिया बहुल इलाक़ा है जबकि पाकिस्तान सुन्नी बहुल देश है. इस इलाके से भी पाकिस्तान-चीन आर्थिक कोरिडोर परियोजना के विरोध की खबरें हैं. इस इलाके में 2009 में पहली बार चुनाव हुए थे. गिलगित-बाल्तिस्तान को उस हिस्से से अलग रखा गया है, जिसे पाकिस्तान आजाद कश्मीर के नाम से बुलाता है. इस इलाके से पाकिस्तान सालाना पांच हजार करोड़ रुपये का टैक्स वसूलता है.

इस क्षेत्र को पाकिस्तान ने चीन को आर्थिक गलियारा बनाने के लिए सौंप दिया है. पाकिस्तान इसे पांचवां प्रान्त इसलिए बनाना चाहता है क्योंकि चीन - पाकिस्तान आर्थिक गलियारा इसी इलाके से गुजर रहा है और चूंकि, ये विवादित इलाका है, इसलिए चीन चाहता है कि गलियारा तैयार होने के पहले इसके तमाम कानूनी पहलू पूरे कर लिए जाएं.चीन ने इस इलाके के खनिजों और पनबिजली संसाधनों के दोहन के लिए बड़े पैमाने पर निवेश किया है.

मुगलों-अंग्रेजों ने किया राज

बलूचिस्तान का इतिहास सिंधु घाटी सभ्यता से जुड़ा है. यह इलाका हमेशा से आजाद रहा लेकिन कालांतर में यहां भी बाहर के आक्रमणकारियों ने शासन किया. इस्लाम के उदय के बाद खलीफा अली के समय यहां विरोध की आवाजें उठी थीं, जिनको दबा दिया गया. पूर्व मध्यकाल में हुमायूं के मित्र मीर चाकर खान रिंद, अफगान और बलोच इलाकों के पहले सरदार बने. बाद में मुगल साम्राज्य की पकड़ यहां मजबूत हुई. इसके बाद नादरशाह ने पूर्वी बलूचिस्तान के शासकों को अपनी ओर मिलाया था. अफगान साम्राज्य के संस्थापक अहमद शाह दुर्रानी भी इस इलाके के शासकों को अपनी ओर करने में सफल रहे थे. दुर्रानी के शासनकाल के दौरान अफगानों और मराठा ताकतों के बीच पानीपत की तीसरी लड़ाई हुई थी, जिसमें अनेक बलोच योद्घा अफगानों की ओर से लड़े थे. अंग्रेजी शासनकाल के दौरान 1870 से 1893 का समय अनेक संधियों का रहा जिस दौरान बलूचिस्तान के अनेक इलाके अंग्रेजी राज के अधीन किए गए.

आधुनिक काल के संघर्ष

आजादी और विकास की मांग पर पिछले सत्तर साल में बलूचिस्तान में अनेक सशस्त्र संघर्ष हुए हैं. बलूच राष्ट्रवादियों का कहना है कि मेजर जनरल अकबर खान के निर्देश पर 27 मार्च 1948 को उनकी मातृभूमि पर अवैध ढंग से कब्जा कर लिया गया जिसने 'ऑपरेशन गुलमर्ग' में भारत से कश्मीर क्षेत्र का एक तिहाई हिस्सा हथियाया था. 1948 में पाक कब्जे के बाद से ही आजादी के लिए बलूचिस्तान में लगातार विद्रोह होते रहे हैं. पाकिस्तान ने 1948, 1958-59, 1962-63 और 1973-77 में यहां सैन्य अभियान चलाए. पाकिस्तानी सरकारों ने बलूचिस्तान की भौगोलिक और प्रशासनिक सीमाओं में लगातार फेरबदल किया जिस कारण बलूचिस्तान की जनता में असंतोष बढ़ता ही गया. यही कारण है कि आज बलोच कौम पाकिस्तान के साथ-साथ ईरान से भी संघर्षरत है. दरअसल, बलूचिस्तान की जनता वहां के प्राकृतिक संसाधनों से होने वाली आय का इस्तेमाल स्थानीय विकास के लिए करना चाहती है. यहां प्राकृतिक गैस के भंडार हैं जिसे दूसरे मुल्कों को बेच कर पाकिस्तान खासी आमदनी होती है.

लड़ाई जारी है

बलोच राष्ट्रवादी पाकिस्तान निर्माण के तुरंत बाद से ही आजादी के लिये गुरिल्ला संघर्ष करते रहे हैं. समय के साथ पड़ोसी अफगानिस्तान में बिगड़ते राजनीतिक हालात के कारण इस संघर्ष को और हवा मिलती रही. बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) की मांग है कि बलूचिस्तान को राजनीतिक स्वायत्ता नहीं बलिक आजादी और अलग मुल्क मिले. जाहिर है यह पाकिस्तान को मंजूर नहीं है इसलिए उसने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी को आतंकी संगठन घोषित कर रखा है. वर्ष 2000 के बाद से बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी अपनी मांगें मनवाने के लिए पाकिस्तानी सेना, पुलिस और आमजन पर कई हमले कर चुकी है. बीएलए के अलावा लश्कर-ए-बलूचिस्तान और कुछ अन्य उग्रवादी संगठन भी बलूचिस्तान की आजादी लड़ रहे हैं. पाकिस्तानी सेना ने भी बलूचिस्तान में अनेक अभियान छेड़ रखे हैं जिसमें हजारों लोग मारे जा चुके हैं.

भारत को दोषी ठहराता है पाक

पाकिस्तानी सरकारें लगातार दावा करती हैं कि भारत बलूचिस्तानी उग्रवादियों की मदद कर रहा है और भारतीय खुफिया एजेंसी 'रॉ ने अफगानिस्तान में बलूची उग्रवादियों के ट्रेनिंग कैंप लगा रखे हैं. हालांकि पाकिस्तान इस तरह का कोई सबूत नहीं पेश कर सका है. ह्यूमन राइट्स वॉच के अनुसार पाकिस्तानी सरकार ने कभी बलूचिस्तान में हिंसा रोकने के लिए सख्त कदम नहीं उठाए. बलूचिस्तान में अल्पसंख्यक ही नहीं बल्कि शियाओं और अन्य पर भी जुल्म ढाए जाते हैं. पाकिस्तान के कई आतंकी समूह यहां हिंसा में शामिल रहे हैं. वहीं पाकिस्तानी मीडिया भी बलूचिस्तान से जुड़ी खबरों को हाशिये पर रखता है.

ब्रिटेन-अमेरिका से चला रहे आंदोलन

2006 में बलूचिस्तान की आजादी के पैरोकार नवाब अकबर शाहबाज खान बुग्ती की हत्या कर दी गई थी. अकबर बुग्ती 70 के दशक में पाकिस्तान सरकार में मंत्री भी रहे थे, लेकिन बाद में बलूचिस्तान के संघर्ष से जुड़ गए थे. बलूचिस्तान नेशनल मूवमेंट की बागडोर बुग्ती के बेटे ने संभाल रखी है. बलूच संघर्ष के तमाम बड़े नेता अमेरिका और ब्रिटेन से आंदोलन चला रहे हैं.

लन्दन और स्विट्जरलैंड में भी उठी ‘फ्री बलूचिस्तान’ की मांग

बलूचिस्तान की आजादी की मांग लन्दन और स्विट्जरलैंड में भी सार्वजनिक रूप से उठी है.वहां जेनेवा में ‘फ्री बलूचिस्तान’ के पोस्टर लगाये गए थे.ऐसे पोस्टर लगाये जाने के खिलाफ पाकिस्तान ने संयुक्त राष्ट्र से शिकायत भी की है.ये पोस्टर ग्रांड सैकोनेक्स के रूए डे फर्न के आसपास के क्षेत्र में दिखाई दिए.पोस्टर में बलूचिस्तान हाउस (बीएच) का प्रायोजक के रूप में उल्लेख किया गया.पाकिस्तान ने कहा है कि ‘फ्री बलूचिस्तान’ की अवधारणा पाकिस्तान की संप्रभुता और राष्ट्रीय अखंडता पर स्पष्ट हमला है.पाकिस्तान ने ‘बीएच’ को बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (बीएलए) का एक सहयोगी बताया है.उधर आजाद बलूचिस्तान के लिए अभियान चला रहे लोगों ने लंदन की बसों पर विज्ञापन अभियान का एक नया दौर शुरू किया है.वर्ल्ड बलूच ऑर्गेनाइजेशन ने कहा है कि ताजा अभियान में लंदन की 100 से अधिक बसों पर ‘फ्री बलूचिस्तान’, बलूच लोगों को बचाओ  जैसे नारे वाले विज्ञापन देखने को मिलेंगे.

बलूचिस्तान में है शक्तिपीठ

देवी के 51 शक्तिपीठों में से एक शक्तिपीठ हिंगलाज माता का है. यह बलूचिस्तान की दुर्गम पहाड़ियों के बीच मंज नामक जगह पर हिंगोल नदी के पास स्थित है. मान्यताओं के अनुसार भगवान शिव माता सती का मृत शरीर अपने कंधे पर लेकर तांडव करने लगे थे. तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के मृत शरीर के 51 भाग कर दिया थे. इसके अनुसार हिंगलाज वही जगह जहां माता का सिर गिरा था. इस मंदिर में माता सती कोटटरी रुप में और भगवान शिव भीमलोचन भैरव रुप में प्रतिष्ठित हैं. माता हिंगलाज के मंदिर परिसर में गणेश, कालिका माता की प्रतिमा के अलावा ब्रह्मकुंड और तीरकुंड आदि प्रसिद्ध हैं.

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