गीता जयंती है ख़ास

By Independent Mail | Last Updated: Nov 30 2017 1:11PM
गीता जयंती है ख़ास

इंडिपेंडेंट मेल. भगवान श्री कृष्ण ने जिस दिन अर्जुन को गीता का उपदेश दिया था, उसे गीता जयंती के रूप में मनाया जाता है यानी श्रीमद्भगवदगीता का जन्मदिन है गीता जयंतीI यह दिवस मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी को पड़ता है. 2017 में यह 30 नवम्बर को पड़ रहा है. मान्यता है कि इस दिन विधिपूर्वक पूजन व उपवास करने पर हर तरह के मोह से मोक्ष मिलता है और यही वजह है कि इस दिवस का नाम मोक्षदा भी रखा गया है. गीता जयंती का मूल उद्देश्य यही है कि गीता के संदेश का हम अपनी ज़िंदगी में पालन करेंI गीता का ज्ञान हमें धैर्य, दुख, लोभ व अज्ञानता से बाहर निकालने की प्रेरणा देता हैI वास्तव में गीता मात्र एक ग्रंथ नहीं है, बल्कि यह अपने आप में एक संपूर्ण जीवन हैI इसमें पुरुषार्थ व कर्तव्य के पालन की सीख है.

गीता के अनुसार किसी कार्य में समग्र रूप से डूब जाना ही योग है. मन, क्रम, विचार, भाव के साथ कार्य करते हुए भी उस कार्य के परिणाम से सदा मुक्त रहना क्योंकि आसक्ति ही कर्म का बंधन बनती है. ऐसे ही तमाम अनमोल सूत्रों के कारण वर्तमान की घोर स्पर्धापूर्ण परिस्थितियों में गीता तनाव प्रबंधन का कारगर उपाय साबित हुई है. इसीलिए आज देश-दुनिया के तमाम उच्च शिक्षण-प्रबंधन संस्थान और स्कूल इसे अपने पाठ्यक्रमों का हिस्सा बना रहे हैं. अमेरिका, जर्मनी व नीदरलैंड जैसे कई देशों ने इसे अपने देश के शैक्षिक पाठ्यक्रम में शामिल कर रखा है. अमेरिका के न्यूजर्सी स्थित सैटान हॉल विश्वविद्यालय में तो हर छात्र को गीता का अंग्रेजी अनुवाद पढऩा अनिवार्य है. वस्तुत: गीता सिर्फ पुस्तकीय ज्ञान नहीं बल्कि समग्र जीवन दर्शन है जो समूची विश्व वसुधा को सर्वे भवन्तु सुखिन: का पाठ पढ़ाता है. हरियाणा के कुरुषेत्र में हर वर्ष गीता जयन्ती के उपलक्ष्य में अंतर्राष्ट्रीय गीता जयंती महोत्सव मनाया जाता है. इस वर्ष यह 28 से 30 नवम्बर तक मनाया जा रहा है.

·         चारों वेदों का संक्षिप्त वर्णन व सारांश “गीता ज्ञान” रूप में 18 अध्यायों में 700 श्लोकों में सुनाया गया है. गीता को वेदों और  उपनिषदों का सार माना जाता, जो लोग वेदों को पूरा नही पढ़ सकते, सिर्फ गीता के  पढ़ने से भी आप को ज्ञान प्राप्ति हो सकती है.

·         वेदव्यास ऋषि ने इस अमृतज्ञान को संस्कृत भाषा में देवनागरी लिपि में लिखा.

·         गीता मूलतः शास्त्रीय संस्कृत में लिखी गयी है परन्तु इसे अब तक 175 भाषाओं में अनुवादित किया जा चुका है.

·         गीता में चार योगों के बारे विस्तार से बताया हुआ है - कर्म योग, भक्ति योग, राजा योग और जन योग.

·         गीता न सिर्फ जीवन का सही अर्थ समझाती है बल्कि परमात्मा के अनंत रूप से रूबरू कराती है. इस संसारिक दुनिया मे दुख, क्रोध, अंहकार ईर्ष्या आदि से पिड़ित आत्माओं को, गीता सत्य और आध्यात्म का मार्ग दिखाकर मोक्ष की प्राप्ति करवाती है.

विशेष महत्व का दिन

ब्रह्मपुराण के अनुसार मार्गशीर्ष शुक्ल एकादशी का इसलिए बहुत बड़ा महत्व है क्योंकि द्वापर युग में भगवान श्रीकृष्ण ने इसी दिन अर्जुन को भगवद् गीता का उपदेश दिया था. इस दिन के पूजन के बारे में गया है कि शुद्धा, विद्धा और नियम आदि का निर्णय यथापूर्व करने के अनन्तर मार्गशीर्ष शुक्ल दशमी को मध्याह्न में जौ और मूँग की रोटी और दाल का एक बार भोजन करके द्वादशी की सुबह स्नानादि करके उपवास रखना चाहिए. इस दिवस भगवान का पूजन करें और रात्रि में जागरण करके द्वादशी को एक बार भोजन करके पारण करें. रात्रि में जागरण करके भगवान विष्णु की स्तुति करनी चाहिएI इस दिन तुलसी और श्रीमदभगवतगीता की पूजा अवश्य करनी चाहिए.

यह एकादशी मोह का क्षय करनेवाली है। गीता जयंती के दिन श्री विष्णु जी का पूजन करने से उपवासक को आत्मिक शांति व ज्ञान की प्राप्ति होती है व इस कारण इसका नाम मोक्षदा रखा गया है. इसीलिए भगवान श्रीकृष्ण मार्गशीर्ष में आने वाली इस मोक्षदा एकादशी के कारण ही कहते हैं – ‘मैं महीनों में मार्गशीर्ष का महीना हूँ.‘

पद्म पुराण के अनुसार माना गया है कि इस एकादशी के व्रत के प्रभाव से जाने-अनजाने में किए गए सभी पाप नष्ट हो जाते हैं, पुनर्जन्म से मुक्ति मिलती है और पितरों को सद्गति मिलती है. माना जाता है कि इस व्रत की केवल कथा सुनने से ही हजारों यज्ञ का फल मिलता है.

भारतीय संस्कृति की आत्मा

भगवद्‍ गीता को पढने, सुनने और इस पर मनन-चिंतन से जीवन में श्रेष्ठता के भाव आते हैं. गीता सिर्फ पढने के लिए नहीं है बल्कि पढ़कर इसके संदेशों को आत्मसात करने के लिए है. गीता का चिंतन अज्ञानता के आचरण को हटाकर आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त करता है. श्रीमद्भगवदगीता को वैश्विक ग्रंथ की मान्यता हासिल है. यह महान कृति भारतीय संस्कृति की आत्मा है. अगर इस अमर ग्रंथ को भारतीय संस्कृति से अलग कर दिया जाए तो भारतीय संस्कृति का अस्तित्व ही खत्म हो जाएगा. भगवद्गीता मूलत: संस्कृत महाकाव्य है जो महाभारत की एक घटना के रूप में प्राप्त हुआ था. लगभग पांच हजार वर्ष पूर्व भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को भगवद्गीता सुनाई थी. इसके 18 अध्यायों के सात सौ श्लोकों में संजोया गया पलायन से पुरुषार्थ का यह अनुपम प्रेरणागीत चिरप्रासंगिक है. ये उपदेश हमारे ज्ञान चक्षुओं को खोलते हैं. तत्थ्यात्मक रूप से जीव को आत्मा की अनश्वरता का बोध कराकर जीवन को समग्रता के साथ जीने की कला सिखाने वाली है यह कृति.

गीता के कथन

महाभारत का युद्ध मूलत: धर्म और अधर्म के बीच का संघर्ष था. इस युद्ध में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को आत्मा की अनश्वरता का बोध करवाकर धर्मपथ पर प्रेरित किया. कर्म की अनूठी व्याख्या कर परिणाम के बारे में चिंतित न होने की शिक्षा दी.

·         श्रीकृष्ण गीता में कहते हैं - जब भी, जहां भी धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है तब मैं अवतार लेता हूं.

·         जो मनुष्य श्रद्धायुक्त और दोषदृष्टि से रहित होकर श्री गीता शास्त्र का श्रवण भी करेगा, वह भी पापों से मुक्त होकर उत्तम कर्म करने वालों के श्रेष्ठ लोकों को प्राप्त होगा.

·         भगवान श्री कृष्ण ने अर्जुन को अपने विश्वरूप के दर्शन कराए और कहा कि समस्त ब्रह्मांड तथा सृष्टियां मुझमें ही स्थित है. मैं वासुदेव ही सबकी उत्पत्ति का कारण हूं. मैं तो केवल भक्तों के प्रेमवश धर्म की स्थापना, साधु पुरुषों के उद्धार तथा दुष्कर्म करने वालों के विनाश के लिए युग-युग में प्रकट होता हूं.

·         श्रीकृष्ण परिणाम की चिंता न करते हुए सतत कर्मशील रहने की प्रेरणा देते हैं. यह बहुत गहरा और गंभीर सूत्र है. इसे समझने वाले कभी निराश नहीं होते.

·         जब शरीर के सभी द्वार ज्ञान के आलोक से प्रकाशित होते हैं तभी सतोगुण की अभिव्यक्ति का अनुभव किया जा सकता है.

·         श्रीकृष्ण कहते हैं कि जो दिव्य ज्ञान को समर्पित हैं और जिसने अपनी इंद्रियों को वश में कर लिया है, वही इस दिव्य ज्ञान को पाने का अधिकारी है और इसे प्राप्त करते ही वह आध्यात्मिक शांति को प्राप्त होता है. जिज्ञासु जब गीता की शरण में जाते हैं तो भगवान श्रीकृष्ण की कृपा से अर्जुन की तरह उनके ज्ञान चक्षु भी खुल जाते हैं यानी दुखों से निजात दिलाने के लिए गीता में निष्काम कर्मयोग की शिक्षा दी गई है.

·         श्री कृष्णा कहते हैं कि जो मेरी शरण होकर जरा और मरण से छूटने के लिए यत्न करते हैं वे पुरुष उस ब्रह्म को, सम्पूर्ण अध्यात्म को तथा सम्पूर्ण कर्म को जानते हैं. भगवान कहते हैं कि मेरे इस श्री गीता ज्ञान को मुझमें परम प्रेम करके जो मेरे भक्तों में कहेगा, उससे बढ़कर मेरा प्रिय कार्य करने वाला मनुष्यों में कोई नहीं और भविष्य में होगा भी नहीं.

·         भगवान् श्री कृष्ण कहते है कि इस संसार मे हर मनुष्य के जन्म का कोई न कोई उद्देशय होता है। मृत्यु पर शोक करना व्यर्थ है, यह तो एक अटल सत्य है जिसे टाला नहीं जा सकता। जो जन्म लेगा उसकी मृत्यु भी निश्चित है. जिस प्रकार हम पुराने वस्त्रों को त्याग कर नए वस्त्रों को धारण करते हैं, उसी प्रकार आत्मा पुराने शरीर के नष्ट होने पर नए शरीर को धारण करती है.

आज बहुत है प्रासंगिकता

आज के समाज में व्याप्त है कलह, क्लेश, क्रोध, तनाव और अवसाद का। ऐसे में गीता के मनन व अनुसरण से मनुष्य की झूठी धारणाएं, भ्रम और शंकाएं समाप्त हो सकती हैं. गीता का ज्ञान एक रहस्य है. उसे यूं ही समझ पाना हर किसी के वश की बात नहीं है. जो कर्मशील व कर्मवीर हैं और कर्मण्यता का भाव रखते हैं उन्हें भगवद्गीता का अध्ययन अवश्य ही करना चाहिए.

·         आज जिस तरह समूची दुनिया में निराशा, विषाद, भय व आतंक का माहौल बना हुआ है, इससे मुक्ति का एकमात्र रास्ता श्रीमद्भागवत गीता ही है. इस ग्रंथ में निहित ज्ञान में न केवल विश्व को एक मंच पर लाने की अनूठी ताकत है वरन विश्वशांति स्थापित करने की अद्भुत सामथ्र्य भी है. गीता प्रत्येक व्यक्ति को उसके परिवार, समाज व राष्ट्र के प्रति धर्म व कर्तव्यों का बोध कराती है. - डॉ प्रणव पंड्या (गायत्री परिवार के संचालक)

·         गीता न केवल गंभीर अंतर्दृष्टि देती है बल्कि धर्म के आंतरिक और लौकिक स्वरूप को पूर्ण संतुलित रूप में परिभाषित करती है. गीता का चिंतन अज्ञानता के आचरण को हटाकर आत्मज्ञान की ओर प्रवृत्त करता है. - जे.डब्ल्यू.होमर (सुप्रसिद्ध जर्मन दार्शनिक)

·         गीता न केवल भारतीयों के लिए बल्कि सभी धर्म, सम्प्रदायों के अनुयायियों के लिए अनुकरणीय है. - एल्डस हक्सले (अमेरिकी दार्शनिक)

·         गीता एक अनुपम जीवन ग्रंथ है. इसका अध्ययन करने वालों को विषाद बहुत कम सताता है. वे कहते थे कि जब कभी भी मैं निराश होता हूं तो गीता की शरण लेता .- महात्मा गांधी

·         गीता वह तैलजन्य दीपक है, जो अनंतकाल तक हमारे ज्ञान मंदिर को प्रकाशित करता रहेगा. - संत ज्ञानेश्वर

·         मुझे अपने जीवन के प्रारंभिक दिनों में ही भगवद् गीता में लिप्त हो जाना चाहिए था ऐसा न करने का मुझे बहुत खेद है. - अल्बर्ट आइंस्टीन

अनूठा है गीता प्रेस

गीता के प्रचार-प्रसार में उत्तर प्रदेश के गोरखपुर स्थित ‘गीता प्रेस’ का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है. गीताप्रेस दुनिया भर में सबसे ज्यादा हिन्दू धार्मिक पुस्तकें प्रकाशित करने वाली संस्था है. गीताप्रेस की स्थापना वर्ष 1923 में हुई थी. इसके संस्थापक जयदयाल गोयन्दका थे. गीता प्रेस द्वारा अब तक ‘गीता’ और “राम चरित मानस’ की 45.45 करोड़ से भी अधिक प्रतियों का प्रकाशन किया जा चुका है. एक अनुमान है कि गीता प्रेस की 50,000 से ज्यादा किताबें रोजाना बिकती .दुनिया में किसी भी पब्लिशिंग हाउस की इतनी किताबें नहीं बिकती हैं. गीता के प्रचार-प्रसार में अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘इस्कॉन’ ने भी बहुत काम किया है.

गीता पर हैं दर्जनों एप

गीता के श्लोकों, सार, और कथानक पर गूगल प्ले स्टोर में दर्जनों एप मौजूद हैंI ये हिंदी, संस्कृत, मराठी, गुजराती, कन्नड़ और तमाम भारतीय भाषाओँ में तो है ही, इसके अलावा नेपाली, अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, स्पैनिश और चीनी अनुवाद भी हैंI यह बताता है कि गीता किस प्रकार दुनिया भर में लोगों के जीवन से जुडी हुयी हैI

 

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