अंकों की आपाधापी में शिक्षा का बंटाधार

By Independent Mail | Last Updated: May 8 2019 9:44PM
अंकों की आपाधापी में शिक्षा का बंटाधार

सबसे पहले तो केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड सीबीएसई को बधाई, जो उन्होंने 12वीं की परीक्षा का समय पर सफलतापूर्वक परिणाम घोषित कर दिया। यह सचमुच सराहनीय है। पर साथ ही इस परिणाम ने कई संदेहों को भी जन्म दिया है। मसलन सीबीएसई के मूल्यांकन की प्रक्रिया पर भी सवाल खड़े होने लगे हैं। यह संशय, कला संकाय में अप्रत्याशित तरीके से दो परीक्षार्थियों को 500 में 499 अंक प्राप्त होने के बाद पैदा हुआ है। सीबीएसई द्वारा आयोजित इस परीक्षा में कुल 18 ऐसे विद्यार्थी उत्तीर्ण हुए हैं, जिन्हें 500 अंकों में से 497 अंक प्राप्त हुए हैं। आश्चर्य इस बात का है कि इसमें से मात्र 6 छात्र विज्ञान संकाय से संबद्ध हैं। आशंका, अप्रत्याशा और अविश्वसनीयता के बीच केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड द्वारा जारी परिणाम पर बृहद चर्चा  की पूरी गुंजाइश है। हमारे यहां शिक्षा की प्रक्रिया, पैटर्न और पाठ्यक्रम पर सदा से सवाल उठते रहे हैं। कभी सिलेबस को लेकर तो कभी रिजल्ट को लेकर, सीबीएसई विवादों में रहा है, लेकिन इस बार कला संकाय के रिजल्ट चौकाने वाले हैं। हालांकि इस मामले में सीबीएसई का तर्क हो सकता है कि वस्तुनिष्ट प्रश्नों के उत्तर के बाद इसी प्रकार के रिजल्ट की आशा की जानी चाहिए, लेकिन यहां सवाल यह भी पैदा होता है कि वस्तुनिष्ठ  सवालों से छात्रों के कला विषय पर उसके ज्ञान को आंका जा सकता है? मुझे तो लगता है यह असंभव है। सामान्य तौर पर वस्तुनिष्ठ  प्रश्नों की गुंजाइश  विज्ञान और वाणिज्य विषयों में होता है, लेकिन कला संकाय के सवाल व्याख्यात्मक ही हो सकते हैं। यदि भाषा को समझना है तो भाषा के व्याकरण को समझ ही काफी नहीं हैं। उसके साहित्य और उस साहित्य में भावनाओं का भी समायोजन और छात्रों की व्यक्तिगत समझ एवं उसकी व्याख्या को भी देखा जाता है। दरअसल, कला की तुलना में विज्ञान में सर्वाधिक अंक मिलते रहे हैं। यह टॉपर की योग्यता या उत्कृष्ट परफॉर्मेंस का विरोध  करना नहीं है, बल्कि कॉलेज में प्रवेश के लिए अति उच्च मार्क्स की उस जरूरत को रेखांकित करना है, जिसमें ऐसे मूल्यांकन की अहम भूमिका हो जाती है। ऐसे परीक्षार्थियों के संख्या में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है जिनके मार्क 90 प्रतिशत से ऊपर हैं। सीबीएसई इस तरह के मार्किंग में पहले इतनी उदार नहीं होती थी, लेकिन अब वह दिख रही है। इससे लाभ तो होगा, लेकिन इसकी हानि भी सबके सामने है। हानि उन प्रादेशिक बोर्ड से पास होने वाले छात्रों को होगी जो इतने अधिक अंक प्राप्त नहीं कर पाएंगे। इससे सीबीएसई के छात्र प्रभावशाली कॉलेजों में नामांकन लेने में सफल हो जाएंगे, जबकि राज्य बोर्डों के छात्रों को परेशानियों का सामना करना होगा। जिस प्रकार के प्रश्न इस परीक्षा में सेट किए जाते हैं उससे योग्यता और शिक्षा के उच्च स्तर और गुणवत्ता का मापदंड नहीं तय किया जा सकता है। सीबीएसई में लेख नुमा उत्तरों का दौर लगभग समाप्त हो चुका है। यह विज्ञान में तो छात्रों के ज्ञान को प्रक्षेपित तो कर देता है, लेकिन कला में संभव नहीं है। दूसरी बात यह है कि अब के दौर में मूल्याकण की प्रक्रिया भी भिन्न हो गई है। मूल्यक को व्याख्यात्मक उत्तर की जरूरत नहीं है। कहा जा रहा है कि अब उनके पास समय का आभाव है। इसलिए प्रश्न ऐसे पूछे जाएं, जिसका उत्तर सीमित शब्दों में मिल जाए, लेकिन इससे विद्यार्थियों के ज्ञान को आंकना संभव नहीं है। इसलिए जिस दौर में शिक्षा व्यवस्था जा रही है उस दौर का हमें बारीकी से अध्ययन करना होगा। दरअसल, देश की जरूरत और व्यक्ति की क्षमता के आधार पर शिक्षा देने की जरूरत होती है। हमारे देश में पहले भी इस प्रकार की व्यवस्था नहीं थी। बड़े दिनों तक हमने अपने बच्चों को अपनी संस्कृति से काटकर रखा, इससे बड़ी हानि हुई है।  

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