इंजीनियरिंग की शिक्षा में सुधार बेहद जरूरी

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 11:39PM
इंजीनियरिंग की शिक्षा में सुधार बेहद जरूरी

रोजगारों की स्थिति पर नजर रखने वाली संस्था एस्पायरिंग माइंड्स ने हाल ही में जारी अपनी रिपोर्ट में देश की इंजीनियरिंग शिक्षा की पोल खोल दी है। संस्था ने अपनी रिपोर्ट में दावा किया है कि हमारे देश के 82 फीसद इंजीनियर इस लायक नहीं हैं कि उन्हें नौकरी मिल सके। एक तरफ तो अर्थव्यवस्था कौशल केंद्रित होती जा रही है, तो दूसरी तरफ तकनीकी प्रशिक्षण संस्थान युवाओं में कौशल का विकास नहीं कर पा रहे हैं। संस्था ने यह निष्कर्ष 750 इंजीनियरिंग कॉलेजों के एक लाख 70 हजार छात्रों के बीच शोध करने के बाद निकाला है। उसने दावा किया कि केवल तीन प्रतिशत इंजीनियरों के पास ही आर्टिफिशल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और मोबाइल डिवेलपमेंट जैसे अधिक मांग वाले क्षेत्रों में नए-पुराने तकनीकी कौशल की जानकारी है। 15 प्रतिशत इंजीनियर ऐसे हैं, जिन्हें विशेष प्रशिक्षण देकर इन नई तकनीकियों की जानकारी दी जा सकती है। 82 फीसद इंजीनियरों का कुछ नहीं हो सकता। इन लोगों को या तो कम वेतन की नौकरी करनी पड़ेगी या फिर बेरोजगार रहना पड़ेगा।

रिपोर्ट में भारतीय इंजीनियरों की बेरोजगारी की कुछ वजहों की ओर भी संकेत किया गया है। जैसे, भारत में एक से ज्यादा इंटर्नशिप करने वाले छात्र मात्र सात प्रतिशत हैं, जबकि 40 प्रतिशत इंजीनियरिंग छात्र सिर्फ एक इंटर्नशिप करते हैं। केवल 36 प्रतिशत ही अपने कोर्स से अलग कोई प्रॉजेक्ट करते हैं। इसका नतीजा यह हाता है कि वे विभिन्न प्रकार की समस्याएं हल करने की योग्यता हासिल नहीं कर पाते। कॉलेजों में व्यावहारिक ज्ञान कम और सैद्धांतिक ज्ञान ज्यादा दिया जाता है। 60 प्रतिशत शिक्षक औद्योगिक क्षेत्र के लिए जरूरी चीजों पर कोई बात नहीं करते और इंडस्ट्री पर बात केवल 47 प्रतिशत इंजीनियर करते हैं। बाकी बस किताबी ज्ञान हासिल कर परीक्षा दे देते हैं। यह तस्वीर वाकई निराशाजनक है। हाल में कई और रिपोर्टें आई हैं, जिन्होंने इंजीनियरिंग शिक्षा की कमियों की ओर इशारा किया है।

पिछले एक-डेढ़ दशकों में देश में इंजीनियरिंग कॉलेजों की बाढ़ सी आ गई, जिनमें ज्यादातर को मोटी फीस से मतलब रहा। उन्होंने अपनी फैकल्टी को बेहतर बनाने की कोशिश ही नहीं की, सिर्फ डिग्री थमाकर निश्चिंत होते रहे। लेकिन इन डिग्रीधारकों को बाजार ने अपने लायक नहीं समझा। इस तरह बेरोजगार इंजीनियरों की भीड़ बढ़ती गई। साल 2016 में बीई-बीटेक के लगभग आठ लाख डिग्रीधारकों में से महज 40 फीसद को कैंपस सिलेक्शन के जरिए नौकरी मिल सकी थी। इस क्रम में छात्रों का इंजीनियरिंग से मोहभंग होता जा रहा है। बीई-बीटेक की लगभग 15.5 लाख सीटों में 51 फीसद 2016-17 में खाली रह गई। एस्पायरिंग माइंड्स का सुझाव है कि पहले साल से ही इंजीनियरिंग कॉलेजों को छात्रों की रोजगार परकता का आंकलन शुरू कर देना चाहिए। उच्च शिक्षा संस्थानों में छात्रों को कुशल बनाने के लिए कार्यक्रम आधारित प्रशिक्षण योजना बननी चाहिए। इंटर्नशिप कार्यक्रमों को बढ़ावा मिलना चाहिए। प्राइवेट कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज को रोजगार संबंधी शोध कार्यक्रम शुरू करने चाहिए। अगर हम दुनिया के साथ कदम से कदम मिलाकर चलना चाहते हैं तो हमें अपनी इंजीनियरिंग शिक्षा की कमियां दूर कर उसे अपडेट बनाना होगा, ताकि भारतीय इंजीनियर किसी भी मामले में पीछे न रहें। 

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