उत्तर प्रदेश में बनते बिगड़ते वोट बैंक

By Independent Mail | Last Updated: Feb 9 2019 8:42PM
उत्तर प्रदेश में बनते बिगड़ते वोट बैंक

अंबिकादत्त मिश्रा

भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में वोट बैंक का अलग ही महत्व है। सभी दल अपने-अपने वोट बैंक सहेजने में जुटे रहते है। वोट बैंक के इस चुनावी गणित में आज कांग्रेस अपने बिखरे वोट बैंक को फिर से एकजुट करने में लगी है। पार्टी के सामने अगले लोकसभा चुनाव के लिए यह जरूरी भी है, मगर यह चुनौती आसान नही है। वोट बैंक की मजबूती से सपा-बसपा बार-बार सत्ता की दहलीज तक पहुंचने में सफल रहे। देखा जाता है कि राजनीतिक दल अपने वोट बैंक को लेकर इतने संवेदनशील रहते हैं कि उन्हें कुछ और नहीं दिखता। मगर यह जनता है। सब कुछ समझने के बाद वह भी कभी-कभी साबुन की तरह हाथ से फिसल जाती है। राजनीतिक दलों के लिए यह स्थिति और भी चिंताजनक हो जाती है, जब दूसरे दल उसके खेमे में सेंधमारी करते हैं। लोकतंत्र के लिए यह घातक स्थिति है कि विकास, जनहित और सुशासन की जगह जाति, धर्म और वर्ग के नाम पर वोट देने की परंपरा चल पड़ी है। इस तरह पूरा समाज इन्हीं के बीच बंटकर रह जाता है। ऊपरी तौर पर सब देशहित, संविधान की रक्षा और भ्रष्टाचार हटाने की बात करते हैं, लेकिन अंदरखाने की वास्तविकता यह है कि उनका पूरा फोकस अपने वोट पर ही रहता है। इसे मजबूती से साथ रखने के लिए हर तरह के हथकंडे अपनाए जाते हैं। भाजपा का भी अपना वोट बैंक है, लेकिन वह दूसरे दलों के वोटों में सेंध लगाने में सफल रही है। इसी का एक परिणाम यह भी था कि 2014 के लोकसभा चुनाव में उसे पूर्ण बहुमत पाने में कोई नहीं रोक सका।

राजनीति के विशेषज्ञों का कहना है कि दलित, मुस्लिम और सवर्ण (इनमें विशेष रूप से ब्राह्मण) हमेशा कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक रहे हैं। एक लंबे अरसे तक ये कांग्रेस से जुड़े रहे, लेकिन समय-समय पर हुई राजनीतिक उठापटक से इनमें बिखराव आना शुरू हो गया और इसका नतीजा सामने है। कांग्रेस आज अपने बिखरे वोट बैंक को फिर से एकजुट करने के लिए कड़ा संघर्ष कर रही है। एक समय था, जब बिहार से जगजीवन राम जैसे प्रभावशाली दलित नेता उसके पास थे। उत्तर प्रदेश में गोविंद वल्लभ पंत और कमलापति त्रिपाठी जैसे सशक्त ब्राह्मण नेता उसके पास थे। इसी तरह कई मुस्लिम चेहरे भी कांग्रेस के लिए हमेशा लाभदायक रहे। यह हाल अन्य राज्यों में भी था, लेकिन 80 के दशक में इस वोट बैंक में जो बिखराव शुरू हुआ, वह थमा नहीं। अब प्रियंका गांधी को कांग्रेस का महासचिव बनाकर उत्तर प्रदेश में सक्रिय किया जा रहा है। इसके पीछे भी सवर्ण और मुस्लिम मतदाताओं को साधने का प्रयास है। प्रियंका किस हद तक सफल रहती हैं, इसका पता तो बाद में चलेगा, लेकिन तय है कि कांग्रेस के लिए यह आग का दरिया है। यदि राजनीति के इतिहास में बहुत पीछे जाया जाए तो कांग्रेसी वोट बैंक के बिखराव की कहानी कुछ इस तरह है कि उत्तर प्रदेश में साठ के दशक के अंत में चौधरी चरण सिंह कांग्रेस से विद्रोह करके अलग हुए। इसके बाद पहले उन्होंने भारतीय क्रांति दल और फिर भारतीय लोकदल के नाम से पार्टी बनाई। चौधरी चरण सिंह की इन पार्टियों का मजबूत आधार बना अजगर यानी अहीर, जाट, गुर्जर और राजपूत। यह उनका सबसे मजबूत वोट बैंक था। राजनीतिक क्षेत्रों में इसीलिए इसे 'अजगर' के नाम से जाना जाने लगा। इसका भी कांग्रेस पर असर पड़ा, मगर वह बहुत अधिक नहीं था। धीरे-धीरे लोकदल का क्षेत्र सिमटने लगा और वोट बैंक भी बिखर गया। आज यह हरियाणा या पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्से तक ही सीमित होकर रह गया है। इसके बाद 80 के दशक के अंत में कांशीराम सक्रिय हुए। उन्होंने पूरे दमखम के साथ दलितों के मुद्दों को उठाना शुरू किया। इसके पीछे उनकी मंशा दलित वोट बैंक को पूरी तरह बसपा के साथ जोड़ना था। कांशीराम इसमें सफल रहे। दलित कांग्रेस से छिटक कर लगभग पूरी तरह बसपा से जुड़ गया। बसपा एक बड़ी ताकत के रुप में उभरी, लेकिन नंबरों की संख्या में वह पीछे रह गई। बसपा के दिग्गजों को समझ में आने लगा कि केवल दलितों के बल पर सत्ता पर काबिज नहीं हुआ जा सकता, तो अन्य वर्गों के लिए भी अपने दरवाजे खोल दिए। पिछले वर्ग के नेता भी बसपा में महत्वपूर्ण जगह पाने लगे। सन् 1993 में बसपा और सपा ने मिलकर सरकार भी बनाई, मगर वह डेढ़ वर्ष से अधिक टिक नहीं पाई। बसपा नेताओं की समझ में यह भी आ गया कि सत्ता की चाबी के लिए इतना काफी नहीं है। यदि पार्टी को मजबूत बनाना है, तो दूसरी जातियों को भी जोड़ना पड़ेगा। इसके लिए सोशल इंजीनियरिंग जैसे प्रयोग किए गए और यह भी सफल रहा। पार्टी सवर्णों और मुस्लिम मतदाताओं को अपने पक्ष में करने में सफल रही। इसकी चोट भी कांग्रेस के पारंपरिक वोट बैंक पर पड़ी। पहले दलित फिर सवर्ण और मुस्लिम मतदाता उसके हाथ से खिसक गए।

इन्हीं घटनाक्रमों के बीच एक नई पार्टी का उदय हुआ। 1990 में मुलायम सिंह यादव ने चंद्रशेखर की पार्टी समाजवादी जनता पार्टी से अलग होकर एक नया दल समाजवादी पार्टी का गठन किया। मुलायम सिंह ने पिछड़े वर्ग खासकर यादवों को अपना आधार बनाया। धीरे-धीरे पिछड़ों का एक बड़ा हिस्सा उनसे जुड़ गया, लेकिन बहुुतायत यादवों का ही रहा। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में ही बाबरी मस्जिद बनाम रामजन्म भूमि का मुद्दा तूल पकड़ गया, जिसमें उन्होंने धर्मनिरपेक्षता के नाम पर काफी सख्ती बरती और इसका राजनीतिक लाभ उन्हें यह मिला कि अल्पसंख्यक वर्ग का एक बड़ा वर्ग सपा से जुड़ गया। भाजपा जहां बहुसंख्यक हिंदुओं को एकजुट करने में लगी थी, वहीं मुलायम सिंह अल्पसंख्यक मुस्लिम वर्ग के साथ जाकर खड़े हो गए। धर्म से जुड़ा मुद्दा होने के कारण दोनों ही फायदे में रहे। मुस्लिम संप्रदाय का पूरा विश्वास मुलायम सिंह के साथ जुड़ गया। यहां तक कि लोग उन्हें मौलाना मुलायम कहने लगे। इस तरह समाजवादी पार्टी पिछड़ों (मुख्यतः यादव) के साथ मुस्लिम मतदाताओं को अपना मजबूत वोट बैंक बनाने में सफल रही। यहां पर नुकसान कांग्रेस का ही हुआ। उसका मुस्लिम मतदाताओं का पारंपरिक वोट बैंक खिसक कर बसपा के साथ-साथ समाजवादी पार्टी के पास चला गया। कांग्रेस को हुए इस नुकसान की भरपाई आज तक नही हो पाई है। इसी बीच भाजपा ने भी दूसरे वर्गों, जातियों और धर्मों के मतदाताओं को अपने साथ लाने का प्रयास शुरू कर दिया। कभी जनसंघ (अब भाजपा) को बनियों की पार्टी कहा जाता था। इसके बावजूद दलितों, पिछड़ों और सवर्णों का एक वर्ग हमेशा उससे जुड़ा रहा। राम मंदिर मुद्दे पर कांग्रेस की गोलमोल नीति सवर्ण मतदाताओं को रास नहीं आ रही है। यद्यपि पार्टी लगातार यह दिखाने का प्रयास कर रही है कि वह हिंदुओं के साथ है, लेकिन उसकी मजबूरी है कि वह मुस्लिमों को भी नाराज नहीं करना चाहती। इस तरह दो राहे पर खड़ी कांग्रेस भ्रमजाल में फंसी है। कांग्रेस के सामने आज सबसे बड़ी चुनौती अपने वोट बैंक को समेटने की है।

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved