आसान नहीं लोकपाल के गठन का रास्ता

By Independent Mail | Last Updated: Feb 6 2019 7:30PM
आसान नहीं लोकपाल के गठन का रास्ता

सामाजिक कार्यकर्ता अन्ना हजारे ने लोकपाल को लेकर 30 जनवरी को अनशन प्रारंभ किया और पांच फरवरी को समाप्त कर दिया। उनके अनशन का न तो सरकार ने नोटिस लिया और न ही मीडिया ने। इससे यही प्रमाणित होता है कि लोकपाल का रास्ता बहुत कठिन है। हालांकि, मामला सुप्रीम कोर्ट में है और फरवरी माह के अंत तक लोकपाल सर्च कमेटी को कोर्ट को कुछ नाम सुझाने हैं। ऐसे नाम जिनमें से एक उपयुक्त व्यक्ति को लोकपाल बनाया जा सके। लेकिन नहीं कहा जा सकता कि लोकपाल का गठन हो ही जाएगा। बता दें कि 27 सितंबर, 2018 को लोकपाल सर्च कमेटी का गठन हुआ था। उसकी पहली बैठक 16 जनवरी, 2019 को हुई। अगर 17 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट को जवाब न देना होता, तो शायद सर्च कमेटी की यह बैठक भी नहीं हुई होती। यह इस कमेटी की दूसरी बैठक थी। इस कमेटी की अध्यक्षता सुप्रीम कोर्ट की ही रिटायर जज रंजना देसाई को सौंपी गई है। कमेटी के अन्य सदस्य हैं: इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व जज सखाराम सिंह यादव, पूर्व सॉलिसिटर जनरल रंजीत कुमार, भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य, रिटायर आईएएस ललित के. पंवार, गुजरात के पूर्व पुलिस प्रमुख शब्बीर हुसैन एस. खंडवावाला, प्रसार भारती के अध्यक्ष ए. सूर्य प्रकाश और भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन के पूर्व प्रमुख एएस किरण कुमार। लेकिन यह समिति सक्रिय नहीं है। वरना और क्या कारण है कि 27 सितंबर, 2018 को गठित होने के बाद यह समिति केवल दो बैठकें कर सकी? अन्ना ने अपने अनशन में भी समिति के ढीले रवैये पर कोई सवाल नहीं उठाया। बता दें कि अन्ना का लोकपाल के लिए आठ साल में यह चौथा अनशन था। 2011 में दिल्ली के रामलीला मैदान में उनके अनशन का व्यापक असर हुआ था। कई हाई-प्रोफाइल लोगों, नेताओं और नेतागीरी के लिए जमीन तलाश रहे युवाओं ने उनके उस अनशन को हंगामेदार बना दिया था। इसका परिणाम भी सामने आया कि लोकपाल बिल संसद में पेश हुआ और पारित हुआ। दिसम्बर, 2013 में बिल पास हुआ और जनवरी, 2014 में राष्ट्रपति की मुहर लगने के बाद लोकपाल व लोकायुक्त एक्ट बना। लेकिन जनवरी 2014 से जनवरी 2019 तक के घटनाक्रम पर गौर करने से पता चल जाता है कि कांग्रेस और भाजपा समेत कोई पार्टी लोकपाल के पक्ष में नहीं है। मई 2014 से लेकर अभी तक के विवरण से स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिन मामलों में बिल्कुल रुचि नहीं ली, उनमें पहले नम्बर पर लोकपाल है। अन्ना हजारे को पता होगा ही लोकपाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट में क्या हो रहा है और सरकार के दिमाग में क्या चल रहा है। इसलिए अनशन शुरू करने से पहले उन्होंने सरकार की दुखती रग पर उंगली भी रख दी थी। 17 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने लोकपाल सर्च कमेटी को नाम न सुझा पाने के लिए फटकारा और 21 जनवरी को अन्ना ने कहा कि अगर लोकपाल होता, तो राफेल घोटाला नहीं हो पाता। उन्होंने यह भी कहा कि राफेल पर वह मीडिया से चर्चा करेंगे। इसके बाद सरकार उनका नोटिस क्यों लेती? हालांकि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस प्रधानमंत्री की इजाजत लेकरअन्ना का अनशन समाप्त कराने गए होंगे। अन्ना को यह भी पता होगा कि फडणवीस लोकपाल के गठन का जो वादा कर रहे हैं, वह पूरा नहीं होगा। फिर भी उन्होंने अनशन समाप्त कर दिया। उनकी समझ में आ गया होगा कि लोकपाल के गठन का रास्ता आसान नहीं है।

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