तोड़नी पड़ेगी शराब माफिया की कमर

By Independent Mail | Last Updated: Feb 10 2019 10:07PM
तोड़नी पड़ेगी शराब माफिया की कमर

उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के सीमावर्ती इलाके में जहरीली शराब ने जैसा कहर ढाया, उससे यही प्रमाणित हुआ कि इन दोनों राज्यों में शराब माफिया एक बड़ा संकट बनकर उभरा है। दोनों ही राज्य सरकारों का शराब के अवैध कारोबार से आंखें मूदे रहना तो चिंताजनक है ही, इससे भी ज्यादा हैरत की बात यह है कि शुरुआत में दोनों ही राज्यों का रवैया घटना पर पर्दा डालने की कोशिश करने का रहा। जहरीली शराब पीकर तबीयत बिगड़ने का सिलसिला सहारनपुर के निकट उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सीमा के अनेक गांवों में पिछले सप्ताह गुरुवार की शाम प्रारंभ हो गया था। लेकिन पहले तो दोनों ही राज्यों के स्थानीय प्रशासन ने यही बताया कि चार गांवों के करीब एक दर्जन लोग अस्पतालों में भर्ती हैं और मृतक की संख्या एक बताई। फिर जब शुक्रवार को मृतकों की संख्या बढ़ना प्रारंभ हुई, तब सच देश के सामने आया। मौतों का सिलसिला रविवार को भी जारी रहा और करीब सवा सैकड़ा लोग अब तक दम तोड़ चुके हैं। लेकिन दोनों ही राज्य सरकारें अब भी यह बताने की स्थिति में नहीं हैं कि लोग किसकी लापरवाही से काल के गाल में समाए? इससे तनिक भी संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि इस कहर के बाद कहा जा रहा है कि अवैध शराब के खिलाफ व्यापक अभियान छेड़ा जाएगा और दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा। अगर यह माना जा रहा है कि जहरीली शराब के कहर के बाद दिखाई जाने वाली सक्रियता से अवैध शराब का कारोबार थम जाएगा, तो यह संभव नहीं है। इसकी गवाही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के उन ग्रामीण इलाकों के लोग दे रहे हैं, जहां जहरीली शराब से मरने वालों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। ग्रामीणों का स्पष्ट आरोप है कि शराब माफिया को सत्ता का संरक्षण प्राप्त है और दोनों राज्यों में सत्ता परिवर्तन होने के बाद भी माफिया की सेहत पर कोई फर्क नहीं पड़ता। भले ही उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारें ग्रामीणों के इस आरोप को खारिज कर रही हैं, लेकिन सच यही है कि इस इलाके में शराब माफिया बेहद ताकतवर है और वहां मौतें भी आए दिन की बात हैं। अबकी बार मामला चर्चा में इसलिए आ गया, क्योंकि मरने वालों का आंकड़ा बड़ गया। सितंबर-2010 में भी यह इलाका तब चर्चा में आया था, जब जहरीली शराब पीकर 50 लोगों की मौत हो गई थी। कुल मिलाकर इस इलाके में जो हो रहा है, वह शासन-प्रशासन की मिलीभगत के बिना संभव ही नहीं था। करीब आठ महीने पहले कानपुर मेंं भी जहरीली शराब से एक दर्जन मौतें हुई थीं। उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में जहरीली शराब से आठ मौतें अभी पिछले ही सप्ताह हुई थीं। इसका मतलब यह है कि दोनों ही राज्यों में अवैध शराब का धंधा मनमाने तरीके से चल रहा है। इस धंधे पर रोक न लगने की बड़ी वजह यही है कि सबकुछ सरकारी संरक्षण में ही हो रहा है। इस सवाल का जवाब उत्तर प्रदेश सरकार से भी चाहिए और उत्तराखंड की सरकार से भी कि सवा सैकड़ा लोगों की मौत के बाद वे शराब माफिया पर शिकंजा कसेंगी या नहीं? यह सही है कि दोनों ही सरकारों ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं। कुछ अधिकारियों-कर्मचारियों को निलंबित किया गया है, तो कुछ लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं। लेकिन यह टोटका है, जिससे कुछ नहीं हो सकता। जरूरत शराब माफिया की कमर तोड़ने की है।

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