पार्टियां घोषणा-पत्र पर गंभीरता से करें अमल

By Independent Mail | Last Updated: Apr 9 2019 11:59PM
पार्टियां घोषणा-पत्र पर गंभीरता से करें अमल
चुनाव, संसदीय लोकतंत्र का महापर्व है। हमारा देश एक बार फिर से संसदीय लोकतंत्र के इस महापर्व में भाग लेने के लिए तैयार  हो रहा है। हर दल ने अपने-अपने अश्वमेध के घोड़े छोड़े हैं। पार्टी नेताओं के भाषणों का दौर जारी है। तैयारियां जोरों पर हैं। चुनावी सभा, सोशल मीडिया पर प्रचार, एक-दूसरों के खिलाफ आरोप-प्रत्यारोप, नीतियों की व्याख्या समाचार माध्यमों में गर्मागर्म चर्चा, ये तमाम चीजें लगातार जारी हैं। इस चुनावी समर में नि:संदेह घोषणा-पत्र का अपना अलग  महत्व है। ऐसे में पार्टियों के द्वारा जारी घोषणा-पत्र पर बहस बेहद जरूरी है। हालांकि पार्टियों के गैरजिम्मेदाराना रवैयों के कारण इन दिनों पार्टियों के द्वारा जारी घोषणा-पत्रों की अहमियत बेहद कम हो गई है। कुछ पार्टियों ने तो अपने यहां घोषणा-पत्र का प्रयोजन ही समाप्त कर दिया था। ऐसे में अब सवाल यह खड़ा होने लगा है कि क्या पार्टियों  को घोषणा-पत्र की औपचारिकता खत्म कर देनी चाहिए?  विगत दिनों चुनाव आयोग ने इस मामले में जबरदस्त संज्ञान लिया और साफ शब्दों में कहा कि राजनीतिक पार्टियों को किसी भी कीमत पर नियत अवधि के अंदर घोषणा-पत्र जारी करना ही होगा। खैर, चुनाव आयोग एक संवैधानिक व स्वायत्त इकाई है। यह आयोग चुनावी प्रक्रिया के लिए उत्तरदायी होता है। हालांकि विगत कुछ सालों में इसकी गरिमा को भी बट्टा लगा है, लेकिन चुनाव आयुक्त टीएन शेषन के जमाने में इस आयोग ने अपनी अहमियत का जबरदस्त तरीके से एहसास कराया था। आज भी आयोग के डंडे से राजनीतिक दलों और व्यक्तियों को परेशानी होती है। मसलन चुनाव आयोग की घोषणा के बाद पार्टियों को अब घोषणा-पत्र जारी करने की मजबूरी तो हो गई है, लेकिन जिस गंभीरता के साथ यह होना चाहिए था उसकी बेहद कमी दिखती है। बीते दिन सत्तारूढ़ राष्ट्रीय लोकतांत्रिक गठबंधन की घटक, भारतीय जनता पार्टी ने अपना घोषणा-पत्र जारी किया। लेकिन इसकी गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि दो दिनों के बाद लोकसभा का चुनाव होना है और ऐन मौके वह पार्टी अपना घोषणा-पत्र जारी कर रही है। इसे चुनावी संवेदनहीनता कहा जाए तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का भी हाल कोई बहुत बढि़या नहीं है। उसने घोषणा-पत्र  में जिन मुद्दों को जिस प्रकार पेश किया है, उससे उसकी गंभीरता पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।  मसलन हमारी सरकार बनी तो गरीबों को सालाना 72 हजार रुपए देंगे। कांग्रेस के घोषणा-पत्र में राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास आदि के मुद्दे गौण हैं। इससे यह साबित होता है कि कांग्रेस भी अपने घोषणा-पत्र के  प्रति गंभीर नहीं है। कमोबेश  देश की अन्य राजनीतिक पार्टियों का भी यही हाल है। सबसे अंत में, जिस घोषणा-पत्र को केंद्र में रखकर राजनीतिक पार्टियां पूरा चुनाव लड़ती हैं, उसका जिक्र पूरे चुनाव में कभी गंभीरता से नहीं करती हैं। चुनाव के बाद तो पार्टियां अपने घोषणा-पत्र की प्रति रद्दियों के भाव कबाडि़यों को बेच देती हैं। यह सचमुच देश के लोकतंत्र को मुंह चिढ़ाने जैसा प्रतीत होता है। इसलिए लोकतंत्र को यदि चिरायु रखना है तो राजनीतिक दलों को घोषणा-पत्र जारी करने के साथ- साथ उस पर अमल भी करना चाहिए। राजनीतिक पार्टियों से इस बात की अपेक्षा की जानी चाहिए कि वह कायदे से घोषणा-पत्र का सम्मान करें, तभी लोकतंत्र की मर्यादा बरकरार रह पाएगी। 
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