राजनीतिक विमर्श का स्तर सुधारें

By Independent Mail | Last Updated: Feb 8 2019 9:15PM
राजनीतिक विमर्श का स्तर सुधारें

सार्वजनिक जीवन में सक्रिय कुछ लोग किस तरह राजनीतिक आक्रामकता और अभद्रता में अंतर करना भूल जाते हैैं, यह तब फिर प्रकट हुआ जब कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर निशाना साधने के चक्कर में भाषा की मर्यादा का उल्लंघन कर गए। चूंकि आम चुनाव करीब आते जा रहे हैैं, इसलिए राजनीतिक दलों के बीच तीखे आरोप-प्रत्यारोपों का सिलसिला कायम होना समझ में आता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि एक-दूसरे के प्रति असम्मान व्यक्त किया जाए और अमर्यादित भाषा का इस्तेमाल किया जाए। यह स्पष्ट है कि राहुल गांधी को प्रधानमंत्री से तमाम शिकायतें हैैं और वह उन्हें सत्ता से हटाना चाहते हैैं, लेकिन उन्हें यह भी समझना होगा कि उनकी भाषा को संतुलित रहना चाहिए। आखिर वह प्रधानमंत्री के लिए डरपोक, डरता है, भाग जाएगा... जैसी भाषा का इस्तेमाल करके देश के लोगों को क्या संदेश देना चाहते थे? उन्होंने केवल ऐसी शब्दावली का ही प्रयोग नहीं किया, बल्कि यह भी दिखाया कि प्रधानमंत्री किसी की चुनौती मिलने पर किस तरह मैदान छोड़कर चलते बनते हैैं। इस पर मंच पर बैठे नेताओं ने तालियां बजाकर उनका उत्साह बढ़ाया। कई मौकों पर प्रधानमंत्री भी ऐसा ही अभिनय करते हैं, जिससे यही पता चलता है कि राजनीतिक विमर्श का स्तर किस तरह गिरता चला जा रहा है। नि:संदेह राजनीतिक विमर्श में गंभीर गिरावट के लिए केवल राहुल गांधी को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन उनकी ज्यादा जिम्मेदारी इसलिए है कि वह कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टी के सबसे बड़े नेता हैं। वह राजनीतिक माहौल में उस तरह की कटुता घोलने का काम नहीं कर सकते, जिस तरह से विभिन्न पार्टियों के छुटभैया नेता करते हैं। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को बहस के लिए जिस तरह की चुनौती दी, वैसी ही चुनौती अन्य नेता भी दूसरे नेताओं को समय-समय पर देते रहते हैैं, लेकिन उनकी दिलचस्पी इसमें कभी नहीं होती कि बहस हो। कोई नहीं जानता कि अपने देश में प्रमुख राजनीतिज्ञ सार्वजनिक तौर पर वैसी बहस करने के लिए तैयार क्यों नहीं होते, जैसी कुछ अन्य देशों और खासकर अमेरिका में होती है? अपने यहां बहस के नाम पर आरोप-प्रत्यारोप ही उछलते हैं। इस दौरान छल-छद्म का सहारा तो लिया ही जाता है, आधे-अधूरे तथ्यों और कई बार तो झूठ के सहारे जनता को गुमराह करने और बरगलाने की कोशिश की जाती है। अगर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान के भाषण को देखें, तो उन्होंने सबकुछ कहा, लेकिन राफेल सौदे से जुड़े महत्वपूर्ण सवालों का जवाब उन्होंने नहीं दिया। देश को पता चलना चाहिए कि राफेल विमानों की संख्या 126 से घटाकर 36 क्यों की गई? और भी बहुत सारे अनुत्तरित सवालों का जवाब मोदी ने नहीं दिया। जब बड़े नेता सवालों का सामना करने से बचते हैं या अपने भाषण में असंसदीय शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो छोटे नेता एवं कार्यकर्ता और अधिक बेलगाम हो जाते हैैं। वे सोशल मीडिया पर ओछी टिप्पणियां करने में एक-दूसरे से होड़ करते दिखते हैैं। दुर्भाग्य से कुछ ऐसी ही होड़ अब टीवी चैनलों पर भी दिखने लगी है। कुल मिलाकर राजनीतिक विमर्श के स्तर में गिरावट का सिलसिला जारी है। मुश्किल यह है कि लोकतंत्र की दुहाई देने और राजनीतिक शुचिता की बातें करने वाले नेता इसके लिए कुछ भी नहीं कर रहे हैं कि राजनीतिक विमर्श मर्यादित तरीके से हो। अगर इस विमर्श के स्तर को ठीक करने की परवाह नहीं की जाएगी, तो भारतीय राजनीति और अधिक बदनाम होगी।

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