सत्य नहीं लगती सत्यपाल मलिक की बात

By Independent Mail | Last Updated: Nov 30 2018 10:02PM
सत्य नहीं लगती सत्यपाल मलिक की बात

यह अजीब ही है कि जम्मू-कश्मीर के राज्यपाल सत्यपाल मलिक लगातार ऐसे बयान दे रहे हैं, जिनसे पता चलता है कि विधानसभा भंग करने को लेकर केंद्र सरकार उनसे खुश नहीं है। उनका अंतिम बयान यह है कि उनको हटाया नहीं जाएगा, लेकिन तबादला किया जा सकता है। मान लीजिए उनका तबादला नहीं किया गया तो? क्या वह वहां बने रहना चाहते हैं और वह इसीलिए बयान दे रहे हैं, ताकि केंद्र उनके बारे में तत्काल कोई निर्णय न करे या इसके पीछे कुछ और ही रणनीति है? पहले मलिक कई बार बोल चुके हैं कि विधानसभा भंग करने से पहले उन्होंने केंद्र सरकार से सलाह-मशविरा नहीं किया था। वह यह भी कहते हैं कि अगर वह केंद्र की मानते, तो उन्हें सज्जाद लोन को मुख्यमंत्री पद की शपथ दिलानी पड़ती जो भाजपा के समर्थन से सरकार बनाने का दावा कर रहे थे। यह सच है कि लोन सरकार बनाने का दावा करने के लिए ही लंदन से आनन-फानन में दिल्ली लौटे थे और राज्यपाल को फोन किया था। उनका कहना है कि उन्होंने अपना दावा और बहुमत का प्रमाण फैक्स के जरिये भेजा था और यह सब भेजने के लिए उनसे कहा गया था। हालांकि, वह इस बात का खुलासा करने के लिए तैयार नहीं हैं कि उनसे कहा किसने था, राज्यपाल ने या केंद्र सरकार के किसी नुमाइंदे ने? सज्जाद लोन भाजपा के 25 विधायकों के अलावा 18 अन्य विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे थे। भाजपा का उनको समर्थन था, लेकिन भाजपा के केंद्र या राज्य के किसी नेता ने यह बयान नहीं दिया था कि वह प्रदेश में सरकार बनाने का प्रयास कर रही है। विधानसभा भंग करने के बाद भी टीवी बहसों में भी भाजपा के प्रवक्ताओं ने राज्यपाल के विधानसभा भंग करने के कदम को सही ठहराया था। ऐसे में यह सवाल उठेगा ही कि सत्यपाल मलिक भाजपा पर सवाल उठाने वाले बयान क्यों दे रहे हैं? क्या यह केवल अपनी छवि को निष्पक्ष साबित करने की रणनीति के तहत बयानबाजी कर रहे हैं? ज्यादा संभावना इसी बात की है। हालांकि, इसका दूसरा कारण यह भी हो सकता है कि केंद्र सरकार ने उनसे सज्जाद लोन की सरकार बनवाने के लिए कहा हो। दरअसल, राजनीति में जो होता है, वह अकसर दिखता नहीं है और जो दिखता है, वह प्राय: होता नहीं है। महबूबा मुफ्ती की सरकार से भाजपा की समर्थन वापसी के बाद लगभग पांच महीने तक जम्मू-कश्मीर की विधानसभा बरकरार रखी गई। इसका केवल एक ही कारण था कि भाजपा वहां सरकार बनवाना चाहती थी। सज्जाद लोन को आगे कर भाजपा ने अपनी योजना आगे बढ़ाई, जिसकी भनक नेशनल कॉन्फ्रेंस, पीडीपी और कांग्रेस काे लग गई होगी, इसलिए ये दल भी लामबंद हो गए होंगे और उन्होंने भाजपा की रणनीति विफल कर दी और अब सत्यपाल मलिक सवालों से बचने के लिए कह रहे हों कि उन्होंने भाजपा की बात नहीं मानी। बहरहाल, उन्हें बयानबाजी से बचना चाहिए। अभी तक केंद्र सरकार की तरफ से ऐसा कोई संकेत नहीं आया है कि वह उनसे नाराज है। यह विश्वास भी किसी को नहीं हो सकता कि विधानसभा भंग करने का फैसला उन्होंने केंद्र की मर्जी के बिना लिया होगा। ऐसे में बेहतर यही होगा कि अपनी छवि चमकाने के चक्कर में पड़ने की जगह राज्यपाल जम्मू-कश्मीर के प्रशासन और विकास के कार्यों पर ध्यान केंद्रित करें।

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