दिग्विजय सिंह को साध्वी की चुनौती

By Independent Mail | Last Updated: Apr 20 2019 8:07PM
दिग्विजय सिंह को साध्वी की चुनौती

भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर साध्वी प्रज्ञा ठाकुर भोपाल से चुनाव लड़ रही हैं। इसे सांकेतिक लड़ाई के रूप में देखा जा रहा है। साध्वी कांग्रेस के कद्दावर नेता पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के खिलाफ मैदान में उतरी हैं। इससे यह साबित हो गया है कि भाजपा यह संकेत देना चाहती है कि साध्वी के ऊपर लगाए गए सारे आरोप निराधार हैं। सच पूछिए तो साध्वी पर लगाए गए कोई भी आरोप अभी तक सिद्ध नहीं हो पाए हैं। ऐसे में यह आरोप लगाना कि साध्वी चुनाव नहीं लड़ सकती हैं, निराधार है। चंूकि आरोप सिद्ध नहीं हो पाया है इसलिए विरोधी राजनीतिक खेमेबाजों का साध्वी के खिलाफ मोर्चा खोलना किसी कीमत पर सही नहीं है। देश में ऐसे कई आरोपी हैं, जो चुनाव लड़ रहे हैं, तो फिर प्रज्ञा के खिलाफ ही मोर्चाबंदी क्यों? दूसरी बात यह है कि इस देश में चाहे मानवाधिकार मूल्यों की बात जितनी कर ली जाए, लेकिन यह भी राजनीतिक खेमेबंदियों के आधार पर ही तय होता है। साध्वी के ऊपर लगे आरोप विशुद्ध  रूप से राजनीतिक दबाव का परिणाम हैं। जब तक केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व  वाली यूपीए  की सरकार रही, तब तक प्रज्ञा और अन्य हिन्दूवादी संगठनों के खिलाफ कार्रवाई होती रही।  कई नेता पकड़े गए, लेकिन वर्षों तक केस चलने के बाद भी किसी के ऊपर आरोप सिद्ध नहीं हो पाया। अब केंद्र में भाजपा के नेतृत्व वाली एनडीए गठबंधन की सराकर है। प्रज्ञा और उनके तमाम साथियों को एक-एक कर आरोपमुक्त किया जा रहा है। हालांकि यहां सवाल यह उठता है कि आखिर समझौता, मोडासा, मालेगांव, मक्का मस्जिद विस्फोट का अभियुक्त कौन है? क्योंकि मुस्लिम आरोपी कांग्रेस के राज में आरोपमुक्त हो चुके और भाजपा के राज में हिन्दू आरोपियों को भी एक-एक कर छोड़ा जा रहा है? इस मामले में देश के मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता भी विभिन्न राजनीतिक खेमों में विभाजित दिखते रहे हैं। यदि वे राजनीतिक और वैचारिक खेमों में विभाजित नहीं होते तो प्रज्ञा ठाकुर और उनके साथियों को जब महाराष्ट्र पुलिस बिना किसी सबूत के आधार पर अमानवीय प्रताड़ना दे रही थी उस समय वे मौन नहीं रहते। इस देश में गुजरात के एक व्यापारी को बचाने के लिए जज साहिबा अपने निवास पर कोर्ट लगा देती हैं, लेकिन साध्वी के खिलाफ आरोप-पत्र दाखिल करने में राष्ट्रीय अन्वेषण एजेंसी-एनआईए को कई वर्ष लग जाते हैं। हमारे देश में कुछ ऐसे  भी मानवाधिकारवादी कार्यकर्ता हैं, जो फांसी की सजा सुनाए जा चुके आतंकवादी को बचाने के लिए आधी रात को जज साहब के घर पर पहुंच जाते हैं, लेकिन साध्वी को बचाने के लिए उनकी आवाज बंद हो जाती है।  अभी-अभी हाल ही में पांच कथित माओवाद समर्थक बुद्धिजीवियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। हालांकि यह कहना कि वे समर्थक हैं और उन्होंने देश को अस्थिर करने की साजिश रची होगी, यह सही नहीं भी हो सकता है लेकिन जो लोग इस मामले को राष्ट्रीय मुद्दा बता रहे थे और साबित करने की कोशिश कर रहे थे कि भारत में मानवाधिकार नाम की कोई चीज नहीं है वही लोग साध्वी के प्रताड़ना  पर मौन साधे हुए थे। पार्टी और सरकार की भूमिका पर तो प्रश्न खड़े होते रहे हैं और आने वाले समय में खड़े होते रहेंगे, लेकिन जो समाज और जनकल्याण के लिए काम कर रहे हैं उन्हें तो कम से कम तटस्थ होना चाहिए। कुल मिलाकर साध्वी का चुनाव लड़ना कानूनन अपराध नहीं है। साध्वी जिस कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरी हैं उनकी छवि एक सॉफ्ट हिन्दू की है। दिग्विजय आरएसएस वाले हिन्दुत्व का सदा से विरोध करते रहे हैं लेकिन उनके मन में भी हिन्दुत्व के प्रति बेहद प्रेम है। हार और जीत किसकी होगी यह तो समय बताएगा, फिलहाल भोपाल साफ्ट हिन्दुत्व और हार्ड हिन्दुत्व के मुकाबले की जमीन है।  

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