महागठबंधन के प्रयास प्रारंभ

By Independent Mail | Last Updated: Nov 2 2018 11:02PM
महागठबंधन के प्रयास प्रारंभ

तेलुगुदेशम के प्रमुख एवं आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू, एनसीपी के सुप्रीमो शरद पवार और जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री तथा नेशनल कॉन्फ्रेंस के चीफ डॉ. फारूक अब्दुल्ला भाजपा के खिलाफ विपक्ष का महागठबंधन बनाने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। चंद्रबाबू की राहुल गांधी से मुलाकात के बाद लगभग यह भी तय हो गया है कि वह अब कांग्रेस के साथ हो गए है। जब पुराने राजनीतिक दुश्मन दोस्त बनते हैं, तो यह जुमला उछाल दिया जाता है कि राजनीति में न तो स्थायी मित्रता होती है और न ही शत्रुता, लेकिन जब एक-दूसरे के कट्टर विरोधी दल एक साथ आते हैं, तो हैरानी तो खैर होती ही है। दरअसल, इसे राजनीतिक अवसरवाद कहा जाता है। सच यह भी है कि अवसरवाद ही भारत की संसदीय राजनीति का सच है। चंद्रबाबू नायडू को यह याद है ही कि उन्होंने अतीत में किस तरह कांग्रेस और उसके शीर्ष नेताओं के खिलाफ तीखे वक्तव्य दिए थे, इसीलिए उन्होंने कहा कि अब बीती बातें भुलाकर एक साथ काम करने का वक्त आ गया है। नेता इस तरह की कटुताओं को भुला भी देते हैं। यही कारण है कि चंद्रबाबू नायडू से मुलाकात के बाद राहुल गांधी ने लोकतंत्र को बचाने के लिए भाजपा को रोकने की जरूरत बताई। करीब चार साल तक मोदी सरकार के साथ रहे चंद्रबाबू नायडू ने भी कहा है कि अब भाजपा को सत्ता से हटाना जरूरी है। इसी के साथ उन्होंने यह भी कहा कि वह भाजपा विरोधी दलों को एकजुट करने की कोशिश करेंगे और इसके लिए वह अन्य दलों के नेताओं से मिलेंगे। अगर भाजपा विरोधी दल एकजुट होना चाह रहे हैं, तो इसमें कुछ गलत नहीं है। यह उनका लोकतांत्रिक अधिकार है कि वे एकजुट हों, लेकिन क्या यह अजीब नहीं है कि जो प्रयास कांग्रेस को करने चाहिए थे, वे क्षेत्रीय दलों के नेता कर रहे हैं? यह अपनी धुन में मस्त कांग्रेस की ही गलती है कि अभी हाल ही में बसपा प्रमुख मायावती ने जिस तरह पहले छत्तीसगढ़ और फिर मध्य प्रदेश में अकेले दम पर चुनाव लड़ने की घोषणा कर दी। ऐसे में यह कहना कठिन है कि चंद्रबाबू नायडू की कोशिश कितना रंग लाएगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि दिल्ली यात्रा के दौरान वह शरद पवार और फारूक अब्दुल्ला से मिले, तीनों नेताओं ने एक साथ मीडिया से बात की, फिर वह राहुल गांधी से मिलने गए। इसका आशय यह है कि गठबंधन की खिचड़ी तो पक रही है। इसमें कोई हर्ज नहीं कि विपक्षी दल कांग्रेस को साथ लेकर या फिर उसके बगैर ही भाजपा को रोकने के लिए एक साथ आएं, लेकिन यह भी तो बताएं कि वे सत्ता में आकर क्या करेंगे? वह वैकल्पिक कार्यक्रम कहां हैं जिसके आधार पर जनता यह जान सके कि विपक्षी दल भाजपा को रोककर सत्ता हासिल करने के बाद क्या करने वाले हैं? बताया तो यह भी जाना चाहिए कि नरेंद्र मोदी के खिलाफ विपक्ष का प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार कौन है? इस विषय में अभी तक यही सुनने को मिलता है कि चुनाव के बाद तय किया जाएगा कि प्रधानमंत्री कौन बनेगा? इससे जनता के मन में यही संदेह पैदा होता है कि विपक्ष का हर नेता स्वयं प्रधानमंत्री बनना चाहता है। इस संदेह को दूर किए बिना किसी भी महागठबंधन का कोई मतलब नहीं है। राजनीति के ज्यादातर जानकर इस पर एकमत हैं कि महागठबंधन प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बताए बिना अगर चुनाव में जाएगा, तो कुछ नहीं कर पाएगा।

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