आरक्षण की राजनीति का नया दौर प्रारंभ

By Independent Mail | Last Updated: Jan 10 2019 4:02PM
आरक्षण की राजनीति का नया दौर प्रारंभ

सामान्य वर्ग के आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश के लिए 10 फीसद आरक्षण देने वाला संविधान संशोधन विधेयक संसद के शीत सत्र में दोनों सदनों ने पास कर दिया। सरकार इस विधेयक को इस तरह लेकर आई कि उसकी किसी को भनक तक नहीं लगी। एक शाम को केंद्रीय मंत्रिपरिषद ने उसे मंजूरी दी, दूसरे दिन उसे लोकसभा में पेश कर दिया गया, उसी दिन उस पर चर्चा हो गई और वह पारित भी हो गया। इसके ठीक दूसरे दिन राज्यसभा ने भी इस विधेयक को पारित कर दिया। चूंकि यह संविधान संशोधन विधेयक है, इसलिए अभी इसे कई मंजिलें और तय करनी हैं। संसद के दोनों सदनों से जो संकेत आया, वह यह है कि विधेयक का राजनीतिक विरोध नहीं होगा। समाजवादी पार्टी, डीएमके और आरजेडी के अलावा किसी भी दल ने इसका विरोध करने की हिम्मत नहीं जुटाई। इसका सीधा अर्थ यह है कि देश की दो-तिहाई विधानसभाओं में भी इसके पारित होने में कोई संदेह नहीं है। इसका अगला चरण होगा सुप्रीम कोर्ट, जहां यह फंस सकता है। न भी फंसे, तब भी मोदी सरकार ने जिस तरह से शीतकालीन सत्र के अंतिम दिनों में आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का फैसला लिया, उससे उसकी राजनीतिक विवशता ही दिखाई दी। सरकार इस मुद्दे को लेकर गंभीर होती, तो अपने कार्यकाल के पहले दौर में इसे लेकर आती। माना जा रहा है कि हिंदी क्षेत्र के तीन राज्यों में भाजपा को मिली हार के बाद सरकार को यह फैसला लेना पड़ा। यह भी कहा जा रहा है कि सरकार ने यह कदम एससी-एसटी एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने से नाराज सवर्णों को अपने साथ जोड़े रखने के लिए उठाया है। वास्तव में मोदी सरकार ने आर्थिक पिछड़ेपन को आरक्षण का प्राथमिक क्राइटेरिया के रूप में स्वीकार करके आरक्षण की मूल अवधारणा को ही बदल दिया है, क्योंकि अब तक यह माना जा रहा था कि सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए लोगों को बराबरी पर लाने के लिए उन्हें आरक्षण दिया जाना चाहिए। विधेयक के मुताबिक, आरक्षण उन्हीं लोगों को मिलेगा जिनके परिवार की वार्षिक आय आठ लाख से अधिक नहीं होगी, कृषि भूमि पांच एकड़ से कम हो और आवासीय घर एक हजार वर्ग फुट से ज्यादा न हो। अगर इस पैमाने पर आरक्षण लागू किया जाए तो देश की बहुसंख्यक जनता इसकी परिधि में आ जाएगी। गौरतलब है कि इस आय समूह वाली जनसंख्या मध्यम वर्गीय है, जो लगातार आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग कर रही थी। पिछले कुछ दिनों से आरक्षण को लेकर कई तरह की मांगें उठ रही थीं। इनमें एक यह भी थी कि जिस परिवार की एक या दो पीढ़ियां इसका लाभ उठा चुकी हैं, उन्हें आरक्षण के दायरे से बाहर किया जाए। जाट, मराठा और पाटीदार जैसी जातियां भी आरक्षण की मांग कर रही हैं। लेकिन अहम सवाल यह है कि नौकरियां हैं कहां? हाल ही में सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी ने आंकड़ा जारी किया था कि पिछले साल एक करोड़ से ज्यादा लोगों ने अपनी नौकरियां गंवाई हैं। इस तथ्य के सामने आने के बाद सरकार की मजबूरी को समझा जा सकता है। उसे चुनाव जीतने के लिए कुछ तो करना ही था। लेकिन विधेयक को सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी मिलती है और नहीं मिलती है, तो भी देश एक नई राजनीति के दौर में प्रवेश कर गया है। आगे चलकर हमें आरक्षण की राजनीति के नए-नए तेवर देखने को मिल सकते हैं।

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved