धरती के स्वर्ग को बचाना होगा

By Independent Mail | Last Updated: Aug 30 2019 6:40AM
धरती के स्वर्ग को बचाना होगा

विभिन्न संस्कृतियों और मान्यताओं वाले मानव समूहों में वर्चस्व को लेकर चले संघर्षों से निजात पाने के लिए जब कुछ मानव समूह हिमालय की ओर आए होंगे तो उन्होंने हिमालय की कंदराओं को सबसे सुरक्षित ठिकाना पाया होगा। इस हिमालय ने न केवल मानव समूहों को आश्रय दिया बल्कि विदेशी आक्रमणकारियों के आगे ढाल बनकर उनकी रक्षा करने के साथ ही उनकी आजीविका के साधन भी उपलब्ध करा, इसलिए कालीदास ने अपने महाकाब्य कुमारसंभव में हिमालय को धरती का मानदण्ड और दुनिया की छत तथा आश्रय बताया था। लेकिन इस हिमालय पर जिस तरह दिन-प्रतिदिन प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं उनसे देखते हुए प्रकृति प्रदत्त यह आश्रय अब सुरक्षित नहीं रह गया है। हिमाचल प्रदेश में अगस्त महीने के तीसरे सप्ताह तक इस साल की मॉनसून आपदाओं में 63 लोगों की जानें चली गई थीं। प्रदेश के मुख्यमंत्री जयराम ठाकुर ने 20 अगस्त को राज्य विधानसभा में बताया कि इस मॉनसून सीजन में हुई आपदाओं में 25 मौतें तो कुछ ही दिनों के अन्दर हुई हैं। उस तिथि तक प्रदेश को लगभग 625 करोड़ की क्षतियां हो चुकी थीं जिनमें 323 करोड़ की क्षति लोक निर्माण विभाग को और 269 करोड़ की क्षति सिंचाई विभाग को हुई। प्रदेश की 1000 से अधिक सड़कें क्षतिग्रस्त हुई। यही हाल हिमाचल प्रदेश के जुड़वा राज्य उत्तराखण्ड का भी रहा। उत्तराखण्ड में प्रतिवर्ष औसतन 110 लोग इस तरह की आपदाओं में अपनी जानें गंवा रहे हैं। उत्तराखण्ड में चमोली जिले के फल्दिया आदि गांवों और टिहरी के घनसाली क्षेत्र में अतिवृष्टि सम्बन्धी आपदाओं में 32 लोगों के मारे जाने के बाद उत्तरकाशी के हिमाचल प्रदेश से लगे आराकोट क्षेत्र में जलप्रलय आ गई। वहां के 20 से अधिक लोगों के मारे जाने के साथ ही लगभग 51 गांवों की 8 हजार से अधिक आबादी शेष दुनियां से कट गई जिस कारण तीन दिन तक बचाव और राहत वाले दल बरबाद हो गए गांवों तक नहीं पहुंच पाए। जम्मू-कश्मीर में तवी नदी हर साल बौखला जाती है। असम में आई बाढ़ से इस साल  धेमाजी, बारपेटा, मोरीगांव, होजई, जोरहाट, चराइदेव और डिब्रूगढ़ जिलों के कई गांवों की 17,563 हेक्टेयर से अधिक फसल जलमग्न हो गई थी। 

हिमालय में इस तरह की त्रासदियों का लम्बा इतिहास है। यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया भी है। लेकिन इन प्राकृतिक विप्लवों की फ्रीक्वेंसी में जो तेजी महसूस की जा रही है वह निश्चित रूप से चिन्ता का विषय है। लेह जिले में 5 एवं 6 अगस्त 2010 की रात्रि बादल फटने से आई त्वरित बाढ़ और भूस्खलन में 255 लोग मारे गए थे। इन मृतकों में कुछ विदेशी पर्यटक भी थे। यह इलाका ठण्डा रेगिस्तान माना जाता है। बादल फटने के दौरान वहां एक ही समय में इतनी वर्षा हुई जितनी कि सालभर में होती थी। इसी प्रकार सितम्बर 2014 में आई बाढ़ ने धरती के इस स्वर्ग को नर्क बना दिया था। उस आपदा में लगभग 300 लोग मारे गए और 2.50 लाख घर क्षतिग्रस्त हुए थे। उस समय 5.50 लाख लोग बेघर हो गए थे, जिन्हें काफी समय तक आश्रयों पर रखा गया। उत्तराखण्ड में 2010 में भी हालात काफी बदतर हो गए थे और दो साल बाद तो केदारनाथ के ऊपर ही बाढ़ आ गई। 

राज्य आपदा प्रबन्धन केन्द्र की एक रिपोर्ट के अनुसार 2013 की मॉनसून आपदा में उत्तराखण्ड के 4200 गांवों की 5 लाख आबादी प्रभावित हुई है। इनमें से 59 गांव या तो तबाह हो गए या बुरी तरह से प्रभावित हो गए हैं। इस आपदा में शुरूआती दौर में 4,459 लोगों के घायल होने की रिपार्ट आई थी। जबकि मृतकों के बारे में अब तक कयास ही लगे। राज्य सरकार ने शुरू में तीथर्यात्रियों समेत केवल 5466 लोगों को स्थाई रूप से लापता बताया था, मगर राज्य पुलिस द्वारा मानवाधिकार आयोग को सौंपे गए आंकड़ों के अनुसार इस आपदा में पूरे 6182 लोग लापता हुए हैं।

इस आपदा में मारे जाने और लापता होने वाले लोगों की सही संख्या का पता नहीं चल सका है। गैर सरकारी अनुमानों में मृतकों की संख्या 15 हजार से अधिक मानी गई। हिमाचल प्रदेश में भी त्वरित बाढ़, भूस्खलन, बादल फटने एवं भूकम्प की दृष्टि से चम्बा, किन्नौर, कुल्लू जिले पूर्ण रूप से तथा कांगड़ा और शिमला जिलों के कुछ हिस्से अत्यधिक संवेदनशील माने गए हैं। इनके अलावा संवेदनशील जिलों में मण्डी, कांगड़ा, ऊना, शिमला और लाहौल स्पीति जिलों को शामिल किया गया है। जबकि हमीरपुर, बिलासपुर, सोलन और सिरमौर जिलों को कम संवेदनशील की श्रेणी में आपदा प्रबंधन विभाग ने रखा है। भूकम्प की दृष्टि से सर्वाधिक संवेदनशील जिले कांगड़ा, हमीरपुर और मण्डी माने गए हैं जबकि बाढ़ और भूस्खलन की दृष्टि से चम्बा, कुल्लू, किन्नौर, ऊना का पूर्ण रूप् से और कांगड़ा तथा शिमला जिलों के कुछ क्षेत्रों को अति संवेदनशील माना गया है। कुल्लू घाटी में 12 सितम्बर 1995 को भूस्खलन में 65 लोग जिन्दा दफन हो गए थे। मार्च 1978 में लाहौल स्पीति में एवलांच गिरने से 30 लोग अपनी जानें गंवा बैठे थे। मार्च 1979 में आए एक अन्य एवलांच में 237 लोग मारे गए थे। इसलिए दुनिया के छत और धरती के स्वर्ग के नाम से माना जाने वाला हिमालय संकट में है। इसे बचाना होगा नहीं तो मानवता का बच पाना संभव नहीं होगा। 

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