टीबी का निपटारा जरूरी

By Independent Mail | Last Updated: Mar 22 2018 1:28PM
टीबी का निपटारा जरूरी

इंडिपेंडेंट मेल, भोपाल। भारत सरकार ने पोलियो की तर्ज पर ट्यूबरक्लोसिस (टीबी) को भी जड़ से मिटाने के लिए कमर कस ली है। टीबी के मरीजों के बारे में जानकारी नहीं देने वाले डॉक्टरों, अस्पताल प्रशासन और दवा दुकानदारों के खिलाफ भी अब कार्रवाई होगी और दोषी पाए जाने पर उन्हें जेल भेजा जाएगा। उन्हें आईपीसी की धारा 269 और 270 के तहत छह महीने से लेकर दो साल तक की सजा और/या जुमार्ना चुकाना पड़ सकता है। सरकार द्वारा टीबी को वर्ष 2012 में सूचनात्मक रोग घोषित किया गया था, लेकिन इसमें किसी तरह की कार्रवाई या सजा का प्रवाधान नहीं था। पिछले साल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि 2025 तक भारत टीबी मुक्त हो जाएगा। हमारा लक्ष्य डब्ल्यूएचओ द्वारा तय 2030 की समय सीमा से पांच साल पहले टीबी को खात्म करना है। पिछले सप्ताह दिल्ली में 'एंड टीबी समिट' कार्यक्रम में उन्होंने टीबी के खिलाफ लड़ाई की बात फिर दोहराई थी। दुनिया भर में बीमारियों से होने वाली मौत की 10 प्रमुख वजहों में टीबी भी शामिल है। एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया में टीबी के कुल मरीजों में से एक चौथाई से अधिक मरीज भारत में हैं। भारत में अनुमानित तौर पर हर साल टीबी से मरने वाले मरीजों की सं या 4 लाख 80 हजार है। इसके अलावा साल में तकरीबन 10 लाख से अधिक मरीजों की जानकारी सरकार के पास नहीं होती है। 

सरकार ने आठ साल के भीतर यानी सन 2025 तक भारत से टीबी का खात्मा कर देने का जो संकल्प किया है, वह अगर जमीन पर उतर सका तो भविष्य की पीढ़ियों के लिए वरदान साबित हो सकता है। यों इस मसले पर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है, लेकिन हर साल लाखों लोगों को मौत के मुंह में जाने से बचाने के लिए जरूरी है कि तपेदिक के खात्मे की दिशा में सरकार अब संजीदगी से काम करे। देश से तपेदिक का नामोनिशान मिटाने के लिए प्रधानमंत्री ने रणनीतिक योजनाओं के अमल पर जोर दिया है, साथ ही राज्य सरकारों को भी हिदायत दी है कि इस अभियान को कामयाब बनाने में कोई कोताही नहीं बरती जाए। यह वाकई गंभीर बात है कि आजादी के सत्तर साल बाद भी भारत में तपेदिक जैसी बीमारी से हर साल लाखों लोग मर रहे हैं। प्रधानमंत्री ने खुद माना है कि तपेदिक पर रोक लगाने के लिए अब तक जो कुछ हुआ, उसमें कामयाबी हासिल नहीं हुई। यह नाकामी हमारी व्यवस्था में खामियों का नतीजा है, जिसकी वजह से आज भी आमजन तक स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि तपेदिक के खात्मे का अभियान कैसे कामयाब हो पाएगा?

दुनिया में टीबी के सबसे ज्यादा मरीज भारत में हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की एक रिपोर्ट के मुताबिक, दुनिया के एक चौथाई से ज्यादा टीबी मरीज भारत में हैं। यह आंकड़ा इसलिए भी चौंकाने वाला है कि चीन की आबादी भारत से ज्यादा है, फिर भी वहां तपेदिक के मरीजों की सं या हमसे एक तिहाई कम है। 2015 में भारत में तपेदिक से तकरीबन पांच लाख लोगों की मौत हुई थी। पिछले साल इस बीमारी के 28 लाख नए मामले सामने आए। डब्ल्यूएचओ के सर्वे और आंकड़े के मुताबिक भारत में तपेदिक अनुमान से कहीं ज्यादा बड़ी महामारी है। ग्लोबल टीबी रिपोर्ट-2016 पर नजर डालें तो दुनिया में तपेदिक के जो एक करोड़ से ज्यादा मामले सामने आए, उनमें 64 फीसद मामले भारत, पाकिस्तान, नाइजीरिया, फिलीपींस, इंडोनेशिया, चीन और दक्षिण अफ्रीका के थे और इनमें भारत शीर्ष पर था। मामला कुलमिला कर गंभीर और हैरान करने वाला इसलिए है कि हर साल इतनी बड़ी तादाद में लोगों के तपेदिक से मरने और लाखों नए मरीज सामने आने के बावजूद हम इस महामारी से निपट पाने में पूरी तरह अक्षम साबित हुए हैं।

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