अर्थव्यवस्था की स्थिति उतनी भी बुरी नहीं है

By Independent Mail | Last Updated: Sep 2 2019 1:14AM
अर्थव्यवस्था की स्थिति उतनी भी बुरी नहीं है

अर्थव्यवस्था की सुस्त स्थिति पर समाचार माध्यम अटा-पटा है। इस स्थिति को भयावह बनाकर प्रस्तुत किया जा रहा है। बताया जा रहा है कि देश की अर्थव्यवथा आईसीयू में है लेकिन जिस प्रकार भारतीय अर्थव्यवस्था की व्याख्या की जा रही है विशेष उससे सहमत नहीं हैं। खबरों में बताया जा रहा है कि देश की आर्थिक वृद्धि दर 2019-20 की अप्रैल-जून तिमाही में घटकर पांच प्रतिशत रह गयी है। पिछले छह सालों में यह आर्थिक वृद्धि का न्यूनतम स्तर है। शुक्रवार को जारी आधिकारिक आंकड़ों में यह जानकारी दी गयी है। ठीक है कि विकास दर घटी है। यह भी सही है कि निवेश की स्थिति सुस्त है। यही भी सही है कि देश की अर्थव्यवस्था में कमजोरी आयी है लेकिन जो भयावह चित्र दिखाया जा रहा है वैसी स्थिति देश की नहीं है। सर्वविदित है कि आर्थिक मंदी से पूरी दुनिया जूझ रही है। भारत में भी उसका प्रभाव पड़ा है। दूसरी बात यह है कि अबतक भारत में एकीकृत कर वसूलने की व्यवस्था नहीं थी। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार ने एकीकृत कर वसूलने की व्यवस्था खड़ी की है। इस कर व्यवस्था में जो तकनीकी खामी है उसके कारण देश के व्यापारी डरे हुए हैं। जो व्यापारी उस तकनीकी खामियों की परवाह नहीं कर रहे हैं वे खुश हैं और जो कर रहे हैं वे सशंकित हैं। जब कोई नई व्यवस्था खड़ी की जाती है तो उस व्यवस्था में अच्छाई के साथ ही साथ खामी भी होती है। वह खामी पहले पकड़ में नहीं आती है। जब व्यवस्था लागू की जाती है तो खामियां दिखने लगती है। प्रबुद्ध प्रबंधन उन खामियो को निकाल कर नया प्रयोग करता है। इसी प्रकार व्यवस्था आगे बढ़ती जाती है। जब नरसिंहा राव की सरकार ने उदारीकरण का श्रीगणेश किया था तो उस समय की सारी विपक्षी पार्टियां विरोध में खड़ी हो गयी थी लेकिन उस उदारीकरण का परिणाम सकारात्मक रहा। महंगाई बढ़ी परंतु लोगों की आमदनी भी बढ़ गयी। इसलिए विरोध करना अपने आप में ठीक है पर सारी चीजें खराब ही नहीं होती है। इसलिए सरकार को और वक्त देने की जरूरत है। रही बात रिजर्व बैंक के रिजर्व मनी का तो इसमें भी कोई बुराई नहीं है। हमारी सरकार को आधारभूत संरचना खड़ी करने के लिए बड़े रकम की जरूरत है। ये रकम दो तीन माध्यमों से प्राप्त हो सकते हैं। एक विदेशी निवेश से, दूसरा स्वदेशी निवेश से, तीसरा संसाधन बेचकर, चौथा कर्ज से और पांचवां जमा रकम निकाल कर। सरकार ने सबसे सुरक्षित रास्ता अपनाया है। इसलिए सरकार की नियति पर प्रश्न नहीं खड़ा करनी चाहिए। थोड़ा वक्त और इंतजार करनी चाहिए। जिस प्रकार सरकार राजनीतिक भूगोल बदलने की पुरजोर कोशिश कर रही है उसी प्रकार आर्थिक परिथिति भी बदलने की कोशिश हो रही है। जरूरी नहीं है इसके परिणाम अच्छे ही हो लेकिन सरकार की नियत पर सवाल नहीं उठाया जा सकता है। यह सरकार जो भी कर रही है, देश हित के लिए कर रही है। कुछ निर्णय लिया गया है। कुछ लेने बाकी हैं। इस साल जनवरी-मार्च की तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर घटकर 5.8 फीसद पर आ गई थी।लेकिन 2019 की अप्रैल से जून की तिमाही में यह और घटकर पांच फीसद पर आ गई है। 2012-13 के बाद यह पहला मौका है, जब आर्थिक वृद्धि दर इतनी कम रही है। 2012-13 की जनवरी से मार्च की तिमाही में आर्थिक वृद्धि दर 4.9 प्रतिशत पर रही थी। आर्थिक वृद्धि में गिरावट की सबसे बड़ी वजह विनिर्माण क्षेत्र और कृषि उत्पादन की सुस्ती को बताया गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने जून में हुई मौद्रिक समीक्षा में चालू वित्तीय वर्ष की आर्थिक वृद्धि दर का अनुमान सात प्रतिशत से घटाकर 6.9 प्रतिशत कर दिया था। साथ ही केंद्रीय बैंक ने वित्त वर्ष की पहली छमाही में जीडीपी वृद्धि दर के 5.8 प्रतिशत से 6.6 प्रतिशत और दूसरी छमाही में 7.3 प्रतिशत से 7.5 प्रतिशत के दायरे में रहने का अनुमान जताया था। ये तमाम आंकड़े नकारात्मक ही नहीं हैं। इसमें भी सकारात्मकता है। जिस परिस्थिति में विश्व की अर्थव्यवस्था जा रही है वैसे में भारत बहुत अच्छी स्थिति में है। बता दें कि भारत के लोगों की अर्थ संग्रह 27 प्रतिशत है। यह दुनिया में सर्वाधिक है। इस ताकत को सरकार देश के विकास में लगाना चाहती है। अगर सरकार की यह योजना सफल रही तो बहुत कम दिनों में ही देश का चित्र बदल जाएगा लेकिन सरकार को इस योजना को लक्ष्य तक पहुंचाना होगा। 

 
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