समुद्र में शक्ति का बढ़ना सुखद

By Independent Mail | Last Updated: Dec 6 2018 2:36PM
समुद्र में शक्ति का बढ़ना सुखद

यह निश्चित ही प्रसन्नता की बात है कि राफेल सौदे पर हो रहे तमाम विवादों के बावजूद हमारे देश की रक्षा तैयारियां जारी हैं, राफेल विवाद का उन पर कोई असर नहीं दिख रहा है। नौसेना दिवस पर नौसेना प्रमुख एडमिरल सुनील लांबा ने जो कहा, उससे देश के भीतर यह भरोसा बढ़ा है कि हमारा देश हिंद महासागर में चीन से मिल रही चुनौतियों को गंभीरता से ले रहा है। भारतीय नौसेना के सामने हिंद महासागर और अरब सागर में तो चुनौती है ही, इसका विस्तार प्रशांत महासागर तक हो रहा है, क्योंकि भारत वहां चीन के बढ़ते प्रभाव की अनदेखी नहीं कर सकता। हालांकि, सुनील लांबा के मुताबिक हिंद महासागर में हम बेहतर स्थिति में हैं। उन्होंने बताया कि हिंद महासागर का शक्ति संतुलन अब भी चीन के मुकाबले भारत के पक्ष में है और पाकिस्तान के मुकाबले तो हम काफी बेहतर स्थिति में हैं। चूंकि सरकार ने भारतीय नौसेना का प्रभुत्व बनाए रखने के लिए बेड़े में 56 युद्धपोत और छह पनडुब्बियां शामिल करने का निर्णय कर लिया है, जबकि स्वदेशी विमानवाहक पोत को लेकर भी बातचीत ठोस रूप ले रही है, इसलिए अन्य किसी के भी हमसे आगे होने की आशंका नहीं हो सकती। खास बात यह है कि नौसेना रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से आत्मनिर्भरता की ओर भी अग्रसर है। 56 युद्धपोत और छह पनडुब्बियाें को एक दशक के भीतर नौसेना के बेड़े में शामिल कर लिया जाएगा। जाहिर है कि इनमें से कुछ युद्धपोत पुराने युद्धपोतों की जगह लेंगे, तो कुछ नौसेना के बेड़े का विस्तार करेंगे। देशवासियों को इस सूचना से भी हर्षित होना चाहिए कि हमारे शिपयार्ड में अभी 32 समुद्री पोतों और पनडुब्बियों का निर्माण चल रहा है। इनमें विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत, पी-15 बी श्रेणी के विध्वंसक, पी-17 ए श्रेणी के स्टेल्थ फ्रिगेट, समुद्री गश्त पोत और पनडुब्बियां शामिल हैं। विमानवाहक पोत आईएनएस विक्रांत निर्माण के अंतिम चरण में है। इसका समुद्री परीक्षण 2020 के मध्य में शुरू हो जाएगा। वस्तुत: ये सारी तैयारियां केवल वर्तमान नहीं, बल्कि भावी चुनौतियों और दायित्वों को ध्यान में रखकर की जा रही हैं। रक्षा तैयारियां हमेशा दीर्घकालीन सामरिक स्थितियों के मद्देनजर की ही जाती हैं। प्रसन्नता की बात है कि भारत इसी दिशा में ठोस तरीके से आगे बढ़ रहा है। अगर हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में भारत को सामरिक महाशक्ति के तौर पर अपनी भूमिका निभानी है, तो क्षेत्र के सभी देशों की नौसैनाओं और उनकी भावी योजनाओं का ध्यान रखते हुए तैयारी की जरूरत है और वही हो भी रहा है। दुनिया जानती है कि इस समय चीन की महत्वाकांक्षाएं अंगड़ाइयां ले रही हैं। उसके आसपास जितने भी देश हैं, उनमें से कुछ तो उसके झंडे के नीचे आ चुके हैं, जबकि कुछ देशों का उससे विवाद है। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो चीन के डर की वजह से चुप हैं। कुछ मामलों पर भारत भी चीन की अनदेखी करता है। मसलन, हमारा मीडिया भले ही कहता हो कि चीन पर दबाव बनाकर भारत ने डोकलाम का मसला सुलझा लिया है, लेकिन विदेशी मीडिया प्राय: इस तरह की खबरें देता रहता है कि चीन डोकलाम में अपनी हरकतों से बाज नहीं आ रहा है। हमारे विरोध के बावजूद पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर में चीन की गतिविधियां जारी हैं। यहां तक तो अनदेखी उचित है, क्योंकि चीन से सीधा युद्ध हम नहीं लड़ सकते। लेकिन इससे ज्यादा अनदेखी हम नहीं कर पाएंगे। ऐसे में शक्ति संतुलन जरूरी है। अच्छी बात है कि इस दिशा में काम हो भी रहा है।

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