हेमा के ट्रैक्टर ड्राइविंग का सकारात्मक पहलू

By Independent Mail | Last Updated: Apr 11 2019 9:54PM
हेमा के ट्रैक्टर ड्राइविंग का सकारात्मक पहलू

स्वप्न सुंदरी के नाम से मशहूर हिन्दी सिनेमा की नायिका, हेमा मालिनी एक बार फिर से चर्चा के केन्द्र में आ गई हैं। इस बार उन्हें किसी फिल्म के लिए नहीं अपितु गेहूं की कटाई और ट्रैक्टर से खेत की जुताई को लेकर सुर्खियां मिल रही हैं। चुनावी मौसम है। हर राजनेता अपने-अपने अंदाज में चुनावी मैदान में हैं। कोई साइकल से जनसंपर्क कर रहा है, तो कोई दलितों के यहां रोटी खाकर वोट पाने की जुगत में है। नि:संदेह ये सारे प्रचार वाले हथकंडे सतही हैं, प्रचार में अतिरेक का अपना अलग महत्व है। मसलन दुनियाभर में प्रचार के लगभग यही रूप हैं। यदि किसी प्रोडक्ट का प्रचार किया जा रहा है तो अमूमन प्रोडक्ट के साथ कई मिथक जोड़ दिए जाते हैं, जिसका उस प्रोडक्ट के साथ दूर-दूर तक कोई संबंध नहीं होता है। उदाहरण के लिए, दाढ़ी काटने वाले ब्लेड के प्रचार के लिए दो तलवारों को दिखाया जाना। अब तलवार से दाढ़ी थोड़े बनाई जाती है, लेकिन प्रचार में तलवार दिखाई जाती है। राजनीतिक व्यक्ति और पार्टियों में भी लगभग यही बात है।

वे अपने को जनता का हितैषी और अन्य नेताओं की अपेक्षा ज्यादा प्रभावशाली बताने के लिए अपने आपको बढ़ा-चढ़ाकर दिखाते हैं। बिना इस हथकंडे जनता के बीच वे जो संदेश देना चाहते हैं वह देने में वे नाकाम रह जाते हैं। शायद मथुरा की सांसद हेमा मालिनी का भी यही अभिप्राय रहा होगा लेकिन आलोचकों का क्या, वे उनके खिलाफ सोशल मीडिया पर शुरू हो गए। हेमा मालिनी के इस ट्रैक्टर और गेहूं कटाई वाले प्रचार अभियान को सकारात्मक तरीके से भी लिया जा सकता था, जिसे पुरुषवादी भारतीय समाज ने बेहद सतही तरीके से लिया। हालांकि हेमा मालिनी जिस प्रकार से प्रचार में उतरी हैं उसके हित साफ-साफ दिख रहे हैं, लेकिन एक महिला द्वारा ट्रैक्टर से खेत की जुताई, अपने आप में महिला सशक्तिकरण का भी संदेश है। आलोचना तो हर किसी की होती है लेकिन आलोचकों को इस दृष्टिकोण पर भी गंभीरता से विचार करना चाहिए। हेमा मालिनी का प्रचार सतही हो सकता है, लेकिन वह इस प्रचार के माध्यम से शायद कोई संदेश देना चाह रही हों। बहुसंख्यक पुरुष समाज ने इस दिशा में सोचा ही नहीं। यह हमारे समाज की विडम्बना है। महिलाओं को घर की चौखट से बाहर नहीं जाने देने की मानसिकता वाला समाज भला एक महिला को ट्रैक्टर चलाते कैसे देख सकता है? अमूमन इस प्रकार के कामों में मर्दों का दबदबा है, लेकिन किसी जमाने में जिन कामों में केवल मर्दों का बोलबाला होता था, वहां अब मर्द अल्पसंख्यक होने लगे हैं।

क्या पता भविष्य में हेमा का यह प्रचार इस विधा में भी महिलाओं को प्रभावी बना दे। इसलिए आलोचना के साथ ही साथ हमें इस दृष्टिकोण से भी हेमा मालिनी के प्रचार को देखना चाहिए। याद रहे मनोरंजन उद्योग में सफलता के बाद हेमा मालिनी राजनीति में आई हैं। उन्हें अभिनय के प्रभाव का भी अंदाजा है। अभिनय के तिलिस्म को वह खूब समझती हैं। साथ ही उस काल्पनिक संसार की ताकत से भी हेमा वाकिफ हैं। इसलिए उन्होंने जो खेत-खलिहान में राजनीतिक नाटक खेले उसके प्रभाव को वह आंक चुकी हैं। यदि उन्होंने इस प्रकार का प्रचार नहीं किया होता तो आज रातोंरात उन्हें इतनी शोहरत नहीं मिल पाती। समझदार किरदार, जीवन को भूमिका मानता है और भूमिका को जीवन। हेमा मालिनी सफल किरदार की भूमिका में हैं। राजनीतिक नाटक के इस मंच पर भी हेमा खूब जम रही हैं। इसलिए आलोचना से ज्यादा उनके दृष्टिकोण की सराहना होनी चाहिए।

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