कारोबार के लिहाज से शुभ संकेत

By Independent Mail | Last Updated: Nov 4 2018 11:03PM
कारोबार के लिहाज से शुभ संकेत

भारत में व्यापार करना अब और आसान हो गया है जो देश की तरक्की के लिहाज से शुभ है। किस देश में व्यापार करना सरल हुआ और किसमें कठिन, यह जानकारी विश्व बैंक देता है, अपनी 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' रैंकिंग के जरिये। इस रैंकिंग में हमारा देश 23 अंकों की छलांग लगाकर 77वें पायदान पर पहुंच गया है। पिछले साल ऐसी ही छलांग लगाकर भारत 100वें पायदान पर पहुंचा था। विश्व बैंक ने ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग के लिए कुछ मानक निर्धारित किए हैं। इनमें प्रमुख हैं, निर्माण के लिए अनुमति जल्दी मिलती है या देर में। कारोबारियों को कर्ज आसानी से मिलता है या नहीं। करा-रोपण प्रणाली सरल है या कठिन। कंपनियां कर्मचारियों की नियुक्तियों और छंटनी में मानवीय मापदंडों का पालन करती हैं या नहीं। इन सवालों पर विदेशी कंपनियों की राय जानने की कोशिश की जाती है और जिस देश को लेकर उनकी राय सकारात्मक होती है, उसकी रैंकिंग में सुधार कर दिया जाता है। भारत की रैंकिंग इसी तरीके को अपनाकर सुधारी गई है। यह बताने की जरूरत नहीं कि नई आर्थिक प्रणाली में विदेशी निवेश का महत्व बहुत बढ़ गया है। हर देश, खासकर विकासशील देश अपने यहां विदेशी निवेश आमंत्रित करना चाहते हैं। लेकिन इसके लिए जरूरी है कि निवेशकों को हर तरह की सहूलियत मिले। एक देश की कंपनी दूसरे देश में कारोबार तभी कर पाएगी, जब उसे वहां व्यापार के अनुकूल माहौल मिलेगा। ईज आफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग से इस माहौल का ही अंदाजा मिलता है। इसे देखकर निवेशक या कारोबारी तय करते हैं कि अपने पैसे वे कहां लगाएं, कहां नहीं। इसी से उन्हें आश्वासन मिलता है कि उनकी पूंजी फंसेगी नहीं। वर्ष 2002 से विश्व बैंक ने इस रैंकिंग की शुरुआत की जिससे निवेशकों का काम आसान हो गया। भारत के साथ व्यापार करने वाले कई देश शिकायत करते रहे हैं कि उन्हें यहां नौकरशाही की अड़ंगेबाजी झेलनी पड़ती है। बिजली या अन्य सुविधाएं लेने में दिक्कत आती है। ये शिकायतें इधर काफी कम हुई हैं। आर्थिक सुधारों को आगे बढ़ाने के क्रम में सरकार ने प्रक्रियाओं को कई स्तरों पर आसान बनाया है, जिससे हमें ईज ऑफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स में ऊंचा स्थान मिल रहा है। हालांकि, कई विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को इस स्तर से संतुष्ट नहीं होना चाहिए। अभी कई क्षेत्रों में और सुधार की जरूरत है। लाल फीताशाही की जकड़ अब भी काफी मजबूत है। अब भी नए कारोबार प्रारंभ करने के लिए कई-कई फॉर्म भरने पड़ते हैं। भ्रष्टाचार भी हमारी व्यवस्था का सच है जिसे लेकर आंखें नहीं मूंदी जा सकतीं। यह भी एक विडंबना है कि कारोबार के सकारात्मक माहौल का जो लाभ आम जनता को मिलना चाहिए, वह अब भी नहीं मिलता। इसीलिए लोगों के मन में अब भी यह सवाल है कि अगर भारत का कारोबारी माहौल सुधरा है, विदेशी निवेश बढ़ने की बात भी कही जा रही है, तो रोजगार के नए अवसरों का सृजन क्यों नहीं हो रहा है? अगर रोजगार के मौके नहीं बढ़ेंगे, तो न विकास दर बढ़ने से कोई फायदा होगा और न ही ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में सुधार आने से। अच्छी रैंकिंग का कोई मतलब तभी है, जब उसका लाभ नीचे तक पहुंचे। कारोबारी माहौल में ऊंची रैंकिंग को सरकार अपनी उपलब्धि जरूर बताए, पर साथ में यह भी सुनिश्चित करे कि नई नौकरियों और वेतन वृद्धि के रूप में इसका फायदा पूरे देश को मिले।

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