एक बार फिर से माओवादी हिंसा की चपेट में पड़ोसी नेपाल

By Independent Mail | Last Updated: Apr 7 2019 2:13AM
एक बार फिर से माओवादी हिंसा की चपेट में पड़ोसी नेपाल

गौतम चौधरी, वरिष्ठ पत्रकार

नेपाल में एक बार फिर से माओवादी चरमपंथी संगठित होने लगे हैं। सक्रिय चरमपंथी गुट के नेता नेत्र विक्रम चंद का दावा है कि उनके पास वे तमाम गुरिल्ले एकत्र हो गए हैं, जो किसी जमाने में सत्ता के खिलाफ संघर्ष में शामिल थे। विक्रम चंद का यह भी दावा है कि उनके पास लगभग 20 हजार गुरिल्ला लड़ाके हैं और वे लड़ाके संगठित रूप से नेपाल सरकार के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार हैं। मसलन एक बार फिर से नेपाल में अशांति का खतरा मंडरा रहा है। इस मामले में कई प्रकार की प्रतिक्रिया आ रही है। इस मामले में नेपाली राष्ट्रवादियों का अरोप है कि चूंकि नेपाल में शांति है और नेपाल, चीन व भारत को समान रूप से महत्व दे रहा है इसलिए भारतीय एजेंसिया, नेपाल को अशांत करने की फिराक में हैं, लेकिन इस तर्क को इसलिए खारिज किया जा रहा है कि वर्तमान नेपाली माओवादी ज्यादातर हमले भारतीय मिशन पर ही कर रहे हैं।

पिछले कुछ महीनों में नेपाल में बहुत कुछ बदला है। नेपाल की राजधानी काठमांडू में बीती 22 फरवरी को एक बहुराष्ट्रीय टेलीकॉम कंपनी 'एन्सेल' के दफ्तर के बाहर धमाका हुआ। इसमें एक व्यक्ति की मौत हो गई, जबकि दो अन्य घायल हो गए। इसके बाद स्वयंभू माओवादी नेता नेत्र विक्रम चंद ने इसकी जिम्मेदारी ली और कहा, नेपाली नागरिक के मारे जाने का मुझे अफसोस है, मैं इसके लिए माफी मांगता हूं। आपको बता दें कि यह माओवादी कार्यशैली का हिस्सा है। वे इसी प्रकार की रणनीति अपनाते हैं। इसलिए आशांका को अब बल मिलने लगा है कि माओवादी चरमपंथी नेपाल में एक बार फिर से जड़ जमा रहे हैं। आपको बता दें, जिस दिन काठमांडू में टेलीकम कंपनी के कार्यालय पर बम से हमला किया गया, उसी दिन पूरे नेपाल में कंपनी के दर्जनभर से ज्यादा मोबाइल टावरों को भी निशाना बनाया गया था। इसके दो दिन बाद 'कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल' के नेता नेत्र विक्रम चंद ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली। इस हमले के लिए नेत्र विक्रम ने कंपनी पर टैक्स चोरी का आरोप लगाया था और कहा कि जो भी कंपनी ऐसा करेगी, उसे बख्शा नहीं जाएगा। यही नहीं माओवादियों ने उक्त कंपनी के कई प्रतिष्ठानों को देशभर में निशाना बनाया।

नेपाल में हुए इन ताबड़तोड़ हमलों से पूरे देश में हलचल मच गई है। एक बड़े तबके में चिंता इस बात को लेकर भी उठी कि इस हमले की जिम्मेदारी एक ताकतवर माओवादी नेता ने ली है। इन हमलों के अलावा भी पिछले 6 से 8 महीनों में नेपाल में बहुत कुछ ऐसा हुआ है जिसके बाद यह सवाल पूछा जाना स्वाभाविक हो गया है। यहां थोड़ी चर्चा नेपाल के माओवादी इतिहास पर भी कर लेनी चाहिए। वैसे नेत्र विक्रम चंद एक समय माओवादी नेता पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' के सहयोगी हुआ करते थे। इन्हीं लोगों ने 1996 में कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ नेपाल (माओवादी) बनाई थी। इस पार्टी ने करीब 10 साल तक सरकार के खिलाफ सशस्त्र लड़ाई लड़ी। साल 2006 में पुष्प कमल दहल 'प्रचंड' ने शांति प्रक्रिया में शामिल होने व राजनीति में आने का फैसला किया। 2012 में प्रचंड की पार्टी टूट हुई। पार्टी के तीन प्रमुख नेता मोहन वैद्य, राम बहादुर थापा और नेत्र विक्रम चंद ने अलग पार्टी बना ली।

आपको बता दें कि जिस प्रकार भारत के पश्चिम बंगाल प्रांत स्थित नक्सलबाड़ी में माओवादियों ने सशस्त्र संघर्ष प्रारंभ किया उसी प्रकार नेपाल में ही लगभग उसी दौरान मोरंग के झापा में माओवादियों ने योजनाबद्ध तरीके से हथियाबंद मूवमेंट प्रारंभ किया था। उस दौरान राजशाही ने माओवादियों को बड़ी बेरहमी से कुचल दिया, लेकिन माओवादी अंदर ही अंदर अपना संगठन मजबूत करते रहे। चूंकि झापा मैदानी इलाका था और पहाड़ी सैनिकों ने उसके खिलाफ बेरहमी दिखाई और माओवादी टिक नहीं पाए, लेकिन यह तो एक झांकी थी। इसके बाद 80 के दशक में एक बार फिर से नेपाल में माओवादियों ने अपना संगठन खड़ा करना प्रारंभ किया। वह दौर भारत में गणपति और गोडपल्ली सीतारमैया का कालखंड था। गोडपल्ली के साथ नेपाली माओवादियों के कितने संपर्क रहे यह तो पड़ताल का विषय है, लेकिन बहुत जल्द नेपाल से लेकर आंध्रप्रदेश तक की योजना माओवादी लिब्रेट राजनीतिक नक्शा का हिस्सा लोगों के सामने आया। इस योजना के सार्वजनिक होते ही भारत और नेपाल सरकारों के होश उड़ गए। इन्हीं दिनों नेपाली माओवादियों ने रोल्पा, डोल्पा, जाजरकोट, रूकुम आदि स्थानों पर सशस्त्र अभियान प्रारंभ कर दिया। टुकड़ों में बंटे माओवादियों को वैचारिक और संगठनिक संबल पुष्प कमल दहल और डॉ. बाबूराम भट्टराई ने दिया।

राई और दहल दोनों के नेतृत्व में माओवादियों ने काठमंडू कूच किया और देखते ही देखते पूरे नेपाल में छा गए। चीन इस बात से परेशान होने लगा कि अगर नेपाल में सचमुच के माओवादी प्रभावशाली हो गए तो चीन में भी उसका असर होगा और चीन फिर से अस्थिर हो सकता है। चीन और भारत के दबाव के बीच नेपाली माओवादी लोकतांत्रिक व्यवस्था में शामिल होने के लिए बाध्य हुए, लेकिन इस संघर्ष से निकल कुछ माओवादी नेता बंदूक छोड़ने के लिए तैयार नहीं हुए। उन्हीं नेताओं में से मोहन वैद्य, राम बहादुर थापा और नेत्र विक्रम चंद हैं। हालांकि राम बहादुर थापा फिर से पुष्प कमल के साथ हो गए हैं। वे वर्तमान ओली सरकार के मंत्री भी हैं, लेकिन अन्य नेता आज भी माओवादी चिंतन को ओढ़े हुए हैं। इधर डॉ. बाबूराम भट्टराई भी कुछ खास नहीं कर रहे हैं। इसलिए ऐसी आशंका जताई जा रही है कि पुराने तमाम माओवादी एक बार फिर से संगठित हो रहे हैं। यह नेपाल और भारत दोनों के लिए खतरनाक साबित हो सकता है। इधर बीते एक साल में माओवादियों की ताकत में जबर्दस्त इजाफा हुआ है। पिछले कुछ महीनों में चंद माओवादी गुट की ताकत में जिस तरह से इजाफा हुआ है उससे प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली और सत्ताधारी पार्टी के दूसरे सबसे बड़े नेता 'प्रचंड' काफी चिंतित है। 'प्रचंड' ने सार्वजनिक रूप से कहा भी है कि वे चंद गुट की हिटलिस्ट में सबसे ऊपर हैं।

नेपाल के कुछ पत्रकार बताते हैं कि चंद गुट को पहले किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया, क्योंकि इसकी ताकत बहुत कम और सीमित इलाकों तक ही थी, लेकिन पिछले साल नई सरकार के गठन के बाद से यह माओवादी गुट सुरक्षा बलों के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनकर उभरा है। नेपाल के एक वरिष्ट पत्रकार ने बताया कि मैदानी इलाकों में भी माओवादियों की ताकत बढ़ी है। खासकर उन प्रदेशों में जहां किसान एवं भूमिहीन किसानों की संख्या अधिक है। वे माओवादी संगठनों के साथ खड़े होते दिख रहे हैं। कुल मिलाकर नेपाल एक बार फिर से माओवादी आतंकवाद की चपेट में आता दिख रहा है। नेपाल में जिस प्रकार माओवादी पृष्टभूमि के नौजवान तेजी से बढ़ रहे हैं वह चिंता का विषय है। साथ ही पड़ोसी देश भारत के लिए भी यह खतरनाक है। अगर नेपाल माओवादी हिंसा की चपेट में फिर से आ गया तो भारत का उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और बिहार बुरी तरह से प्रभावित हो सकता है। साथ ही इसका असर अशांत गोरखालैंडवाले उत्तर बंगाल पर भी पड़ने की संभावना है। इसलिए भारत को भी नेपाल के इस वर्तमान परिवर्तन को गंभीरता से लेनी चाहिए।

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