अयोध्या पर अदालत का रुख सुखद

By Independent Mail | Last Updated: Jan 6 2019 6:55PM
अयोध्या पर अदालत का रुख सुखद

सुप्रीम कोर्ट ने राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद मामले में सुनवाई के लिए एक नई तारीख मुकर्रर करके स्पष्ट कर दिया है कि अदालती फैसले राजनीति से प्रभावित नहीं हो सकते। अब 10 जनवरी को तय होगा कि कौन सी पीठ इस मामले की सुनवाई करेगी और मुकदमा किस रफ्तार से आगे बढ़ेगा? प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति रंजन गोगोई और न्यायमूर्ति एसके कौल की पीठ ने कहा है कि एक उपयुक्त पीठ सुनवाई की तारीख तय करने के लिए 10 जनवरी को बैठेगी। कोर्ट का यह रुख संविधान के अनुकूल है। यह तो बताने की जरूरत ही नहीं कि अयोध्या विवाद अब तक लंबी यात्रा तय कर चुका है। साल 1528 में मस्जिद निर्माण के साथ क्या स्थिति रही होगी, यह तो बहुत साफ नहीं, पर दस्तावेजों में यह तो दर्ज है ही कि 1853 में इस स्थल के आसपास पहली बार दंगे हुए थे, जिसके बाद अंग्रेजों ने यहां बाड़ लगाकर दोनों पक्षों के लिए अलग-अलग व्यवस्था की थी। 1949 इस विवाद का दूसरा पड़ाव था, जब वहां अचानक भगवान राम की मूर्तियां मिलीं और मुकदमेबाजी के बाद इसे विवादित स्थल घोषित कर दिया गया। तीसरा महत्वपूर्ण और इतिहास में हलचल मचाने वाला बिंदु 1992 बना, जब छह दिसंबर को विवादित ढांचे को ढहा दिया गया और तब से लेकर इस पर विवाद और राजनीति साथ-साथ जारी है। इस विवाद ने 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद नया मोड़ लिया, जब तीन जजों की पीठ ने बहुमत के आधार पर विवादित जमीन को सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला के बीच समान रूप से बांटने का आदेश दिया, जो किसी भी पक्ष को मंजूर नहीं हुआ। जब आम चुनाव नजदीक हों, मंदिर-मस्जिद के बहाने धर्म राजनीति की धुरी बन चुका हो, तब सुप्रीम कोर्ट का सुनवाई की दिशा में एक कदम बढ़ा देना काफी महत्वपूर्ण है। बीते एक साल में कई बार इस विवाद के बहाने अदालत की मंशा पर तक सवाल उठाए गए कि सरकार फैसले के जरिये आम चुनाव से पहले अपनी राजनीति चमकाना चाहती है। सत्ता पक्ष ने भी कांग्रेस से जुड़े वकीलों को निशाना बनाते हुए उसे अयोध्या विवाद के फैसले की राह का रोड़ा साबित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। यह राजनीति इसलिए हुई कि 2014 में भाजपा सत्ता में आई ही इस वादे के साथ थी कि वह मंदिर बनवाएगी। लेकिन अब चुनाव में केवल तीन महीने बचे हैं, लेकिन वह कुछ नहीं कर पाई। हालांकि, कोर्ट पर विश्वास की घोषणा करना भाजपा के लिए सुरक्षा कवच बन गया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने यह घोषणा फिर कर दी कि उनकी सरकार सुप्रीम कोर्ट के निर्णय का पालन करेगी। लेकिन विश्व हिंदू परिषद समेत तमाम हिंदूवादी संगठन मोदी की घोषणा के बाद उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने भी नाराजगी जता दी है। यह सब भाजपा की मुश्किलें बढ़ाने वाला है। दरअसल, अयोध्या विवाद अब ऐसा शेर बन गया है, जिस पर सवारी करने के अपने जोखिम हैं। यह काम न सरकार करना चाहती है और न ही विपक्ष। सुखद सिर्फ यही है कि अदालत का पक्ष एकदम स्पष्ट है। उसने हमेशा की तरह एक बार फिर बता दिया है कि राजनीति चाहे जिस राह चले, अदालत अपनी राह और गति खुद तय करेगी। वह न तो भावनाओं के आधार पर निर्णय देगी और न ही धार्मिक मान्यताओं के सहारे। उसके लिए अयोध्या का मसला जमीन के एक विवाद से ज्यादा अहमियत नहीं रखता। उसकी ओर से आया यही संकेत सुखद और संविधान के अनुरूप है।

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