जनरल रावत की चिंता गौरतलब

By Independent Mail | Last Updated: Nov 5 2018 10:05PM
जनरल रावत की चिंता गौरतलब

थलसेना प्रमुख जनरल बिपिन रावत ने केंद्र सरकार को आगाह करते हुए कहा है कि पंजाब में अातंकवाद को फिर से जीवित करने के प्रयास किए जा रहे हैं। यह प्रयास पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई कर रही है, कुछ स्थानीय लोगों के साथ मिलकर। जनरल रावत ने कहा कि अगर इसके खिलाफ जल्द कार्रवाई नहीं की गई, तो काफी देर हो जाएगी। उनकी यह चिंता आकस्मिक नहीं है। उन्होंने जो कहा है, बहुत सोच-समझकर कहा है। इसलिए उनके बयान को हल्के में नहीं लिया जा सकता। चिंता का असल कारण यह है कि इसके पीछे बाहरी ताकते हैं, जो पंजाब को एक बार फिर सुलगाना चाहती हैं। इसमें भीतरी तत्वों की संलिप्तता परिस्थिति को और जटिल बना देती है, जो पर्दे के पीछे रहकर अपना खेल खेलते रहते हैं। पंजाब में पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह की घटनाएं हुई हैं, उन पर दृष्टि डालने पर जनरल रावत की चिंता को समझने में आसानी होगी। कुछ पश्चिमी देशों में खालिस्तान समर्थक ताकतों द्वारा जनमत संग्रह के लिए अभियान चलाया जा रहा है। ब्रिटेन और ऑस्ट्रिया में बीते चार साल से इस तरह का अभियान चल रहा है। कनाडा और अमेरिका में भी पंजाब में जनमत संग्रह कराने की मांग हो रही है। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई तो स्थानीय लोगों को भड़काने में लगी ही है। अगर बात घर के भीतर की गड़बड़ियों की करें, तो अभी दो रोज पहले की ही बात है, जब बीएसएफ के एक जवान को पाकिस्तान के लिए जासूसी करने के आरोप में पंजाब के फिरोजपुर से गिरफ्तार कर लिया गया। पंजाब में खालिस्तान के समर्थन में नारेबाजी भी यदाकदा होती रहती है। इसका मकसद राज्य के सांप्रदायिक सौहार्द को खराब करने का होता है। लेकिन क्या ऐसी ताकतें अपने कुत्सित इरादों में सफल हो पाएंगी? बिल्कुल नहीं। एक बार आतंकवाद की आग में अपना हाथ जला चुका पंजाब उसके दुष्परिणाम को अच्छी तरह से जानता है। 80-90 के दशक में इस आतंकवाद के कारण वहां हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए थे। इससे पंजाब का सामाजिक और आर्थिक जीवन बुरी तरह तबाह हो गया था। सरकार और समाज के सहयोग से बहुत मुश्किल से इस पर काबू पाया गया था। इसलिए पंजाब का समाज उस दौर की वापसी कतई नहीं चाहेगा। आज की हकीकत भी यही है कि पंजाब में खालिस्तान समर्थक तत्व हाशिये पर हैं। समय- समय पर राजनीतिक दल इन्हें जरूर उकसाते रहते हैं, अकाली दल पर इन ताकतों को उकसाने का आरोप खास तौर पर लगता है, लेकिन वहां का समाज समाज इन्हें तवज्जो नहीं देता। लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि जनरल रावत की चेतावनी की अनदेखी कर दी जाए। उनकी चेतावनी के बाद सरकार और उसकी सारी सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क रहना होगा, ताकि पंजाब में भारत को अस्थिर करने वाली ताकतों की दाल न गले। याद यह भी रखा जाए कि केवल सुरक्षा बलों के भरोसे चरमपंथ पर काबू नहीं पाया जा सकता। इसके लिए समाज का समर्थन जरूरी होता है। 80-90 के दशक में पंजाब में आतंकवाद के खिलाफ सुरक्षा एजेंसियों के साथ समाज भी खड़ा था। दोनों के तालमेल के कारण देश ने वह उस दौर की सबसे कठिन लड़ाई जीत ली थी। पंजाब का समाज आज भी आतंकवाद का विरोधी है। ऐसे में जनता रावत की चिंता के अनुरूप समाज को और सतर्क करने की जरूरत है। अभी चीजें हाथ में हैं, इसलिए काम बहुत कठिन नहीं है।

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved