बस्तों का बोझ कम करने की कवायद

By Independent Mail | Last Updated: Nov 28 2018 10:48PM
बस्तों का बोझ कम करने की कवायद

पहली से 10वीं कक्षा तक के बच्चों के बस्तों का बोझ निर्धारित कर दिया जाना एक अच्छा प्रयास है। मानव संसाधन मंत्रालय ने सभी राज्य सरकारों और केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश दिए हैं कि अब स्कूली बच्चों के बैग का वजन वही होगा, जो मंत्रालय ने तय किया है। उसने पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों के बैग का वजन 1.5 किलोग्राम से लेकर दसवीं कक्षा के लिए पांच किलोग्राम तक तय किया है। इसके साथ ही उसने पहली और दूसरी कक्षा के बच्चों को होमवर्क देने पर भी रोक लगा दी है। बहरहाल, बस्तों के बोझ का मामला नया नहीं है। 1980 में प्रसिद्ध लेखक और सांसद आरके नारायण ने राज्यसभा में स्कूली बच्चों पर पढ़ाई और बस्ते के बोझ का मुद्दा जोर-शोर से उठाया। उसके बाद मानव संसाधन मंत्रालय ने प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में एक छह सदस्यीय समिति का गठन किया था। इस समिति ने बच्चों पर बस्ते के बोझ की जांच के दौरान समूची स्कूली शिक्षा-प्रणाली पर नजर डाली थी। कमेटी का कहना था कि बस्ते के बोझ की समस्या के कई पहलू हैं। उसने बताया था कि नर्सरी स्कूलों में बच्चों को दो-ढाई साल की आयु में भर्ती कर दिया जाता है। इसलिए उनकी दिनचर्या मशीनी हो गई है। सुबह स्कूल जाना, दोपहर में घर लौटकर होमवर्क करना, फिर ट्यूशन पढ़ना और शाम को टीवी देखना, यह उनकी दिनचर्या बन गई है। इस कारण बच्चे पढ़ाई से ऊबने लगे हैं। समिति ने शिक्षा में सुधार के तमाम सुझाव दिए थे। यह दुर्भाग्य ही है कि समिति द्वारा 1992 में केंद्र सरकार को सिफारिशें सौंपने के बावजूद उन पर आज तक अमल नहीं हुआ और अब जाकर मानव संसाधन मंत्रालय को निर्देश जारी करने पड़े हैं। बता दें कि बस्ते का बोझ कोई अनायास पैदा हुई समस्या नहीं है। यह बोझ उन निजी स्कूलों ने बढ़ाया है, जो यह दिखाने की कोशिश करते हैं कि उनके यहां बच्चों का चहुमुखी विकास होता है। बाजारवाद के इस दौर में उनकी यह नौटंकी चल निकली और अभिभावक अपने नौनिहाल से अचूक तीर मरवाने की गरज से उस पर बस्ते का बोझ सहर्ष बढ़ाते चले गए। उन्हें इसकी परवाह ही नहीं रही कि बस्ते के इस बोझ से बच्चे कुछ सीखें या नहीं, लेकिन यह उनके मन को जरूर तोड़कर रख देगा, उन्हें बीमार बनाएगा। मार्च-2017 में दिल्ली में एक सर्वेक्षण केजरीवाल सरकार ने कराया था, जिसमें पाया गया था कि 80 फीसद बच्चे रीढ़ की हड्डी के दर्द से परेशान हैं। यह शायद इसी का असर था कि सीबीएसई ने स्कूलों को सुझाव दिया था कि वे बस्ते के बोझ को कम करने का प्रयास करें। तब यह सुझाव के स्तर पर था और हम तब तक कुछ नहीं सुनते, जब तक हमें निर्देशों की जंजीर से न बांधा जाए। हालांकि, निर्देशों पर भी अमल होगा, यह कोई नहीं कह सकता। निजी प्रकाशकों की पुस्तकों पर उठे विवाद के बाद सीबीएसई ने ही अपने स्कूलों को किताब, कॉपियों और यूनीफॉर्म की बिक्री से दूर रहने और हर हाल में एनसीईआरटी की ही किताबें पढ़ाने का निर्देश दिया था, लेकिन कौन कह सकता है कि इस निर्देश का पालन हुआ। निजी स्कूलों की फीस को लेकर भी तमाम निर्देश जारी किए गए, लेकिन हम उनकी धज्जियां कहीं भी उड़ते हुए देख सकते हैं। ऐसे में यह कहना तो सही नहीं कि मानव संसाधन मंत्रालय के निर्देशों पर अमल होगा ही, लेकिन ये निर्देश हैं ठीक।

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