बहाल की जानी चाहिए सीबीआई की साख

By Independent Mail | Last Updated: Jan 9 2019 9:31PM
बहाल की जानी चाहिए सीबीआई की साख

सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा को सरकार द्वारा जबरन दी गई छुट्टी को रद्द करते हुए उन्हें वापस उनकी कुर्सी पर बैठा दिया है। लेकिन अदालत ने यह भी साफ कर दिया है कि वह कोई नीतिगत निर्णय नहीं ले पाएंगे। यहां तक कि वह सीबीआई के किसी अधिकारी-कर्मचारी का स्थानांतरण भी नहीं कर पाएंगे। इसका एक अर्थ यह भी लगाया जा सकता है कि जिन आरोपों के तहत सरकार ने आलोक वर्मा और सीबीआई में उनके बाद दूसरे नंबर के अधिकारी को छुट्टी पर भेजा था, उन आरोपों के चलते सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें शक के दायरे से पूरी तरह बाहर नहीं किया है। सरकार का तर्क था कि केंद्रीय सतर्कता आयोग की सिफारिश पर ही उसने आलोक वर्मा को छुट्टी पर भेजा था, जबकि कोर्ट ने पाया कि उनके खिलाफ कार्रवाई की जो प्रक्रिया अपनाई गई थी, वह ठीक नहीं थी। कुल मिलाकर गलत प्रक्रिया अपनाकर लिए गए निर्णय को अदालत ने गलत ठहरा दिया है। उसके आगे की कहानी ज्यों की त्यों उलझी हुई है। अदालत के निर्णय के बाद क्या सीबीआई एक ऐसी संस्था में नहीं बदल गई है, जिसके मुखिया को कोई बड़ा नीतिगत फैसला करने की इजाजत ही नहीं होगी? हालांकि, आलोक वर्मा का कार्यकाल 31 जनवरी तक ही बचा है, लेकिन सीबीआई जैसी देश की सर्वोच्च जांच एजेंसी के लिए यह कोई छोटा समय नहीं है। इसलिए कोर्ट ने प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश को एक सप्ताह के भीतर मिलकर इस विषय पर फैसला करने को कहा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि मसला एक सप्ताह के भीतर निपट जाएगा। इसके साथ ही पहल सीबीआई की समस्या को सुलझाने की भी होनी चाहिए। देश की सबसे बड़ी जांच एजेंसी सीबीआई में पिछले कुछ साल के भीतर वह सब कुछ हो चुका है और कई बार हो चुका है, जो किसी भी संस्था की प्रतिष्ठा को मटियामेट करने के लिए पर्याप्त होता है। सीबीआई की साख इस कदर गिर चुकी है कि सुप्रीम कोर्ट को एक बार उसे पिंजड़े का तोता कहना पड़ा था। यानी, सीबीआई एक ऐसी संस्था है जिसकी अपनी कोई आवाज नहीं है। कौन नहीं जानता कि सरकारों द्वारा सीबीआई के दुरुपयोग के एक-दो नहीं, ढेरों उदाहरण देश में मौजूद हैं। इसमें सरकारों की भूमिका निश्चित ही खराब रही, लेकिन गलती सीबीआई की भी है। वह बार-बार ऐसी संस्था साबित हुई, जिसने अपना दुरुपयोग हो जाने दिया और ताजा मामले में तो सीबीआई के आला अधिकारियों पर भ्रष्टाचार तक के आरोप लगाए गए हैं। ये आरोप कहीं बाहर से नहीं आए हैं, बल्कि ये सीबीआई के अधिकारियों ने ही एक-दूसरे पर लगाए थे। इसलिए ताजा मामले से भी बड़ा मुद्दा सीबीआई की साख को बहाल करने का है। कोर्ट के निर्देश के अनुसार जब एक सप्ताह के भीतर प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश आलोक वर्मा को नीतिगत फैसला लेने का अधिकार देने या न देने के मुद्दे पर चर्चा करेंगे, तो उनकी बैठक में सीबीआई की साख बहाल करने पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। यह उम्मीद की ही जानी चाहिए कि वे सीबीआई को उस कीचड़ से निकालने की कोशिश करेंगे, जिसके छीटें गाहे-बगाहे सभी पर पड़ते रहते हैं। अगर आलोक वर्मा की बहाली के सवाल तक ही इन लोगों की बैठक उलझी रही, तो उससे देश को कुछ भी हासिल नहीं होगा। इस बैठक में यदि नीतिगत निर्णय लेने का अधिकार दे भी दिया जाता है, तो यह केवल आलोक वर्मा की जीत होगी, सीबीआई की नहीं।

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