अयोध्या विवाद: दोंनों पक्ष करें अदालत की इच्छा का सम्मान

By Independent Mail | Last Updated: Mar 7 2019 10:06PM
अयोध्या विवाद: दोंनों पक्ष करें अदालत की इच्छा का सम्मान

अयोध्या के मंदिर-मस्जिद मामले का समाधान मध्यस्थता के जरिये करने को लेकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही यह पता चलेगा कि आपसी बातचीत से इस विवाद का हल निकालने की दिशा में आगे बढ़ पाना संभव है या नहीं। लेकिन उचित यही होगा कि सदियों पुराने इस प्रकरण को आपस में मिल-बैठकर सुलझाने की कोशिश नए सिरे से की जाए। यह सही है कि इसके पहले आपसी बातचीत से इस मसले के हल की कई कोशिशें हो चुकी हैं और वे कामयाब नहीं रहीं, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि इस दिशा में बढ़ने से ही बचा जाए। किसी काम में विफलता मिलते रहने के आधार पर इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि सफलता मिल ही नहीं सकती। सफलता हमेशा ढेर सारी विफलताओं के बाद ही मिलती है। यह भी याद रखना चाहिए कि पहले आपसी बातचीत से अयोध्या विवाद के समाधान की कोई राह इसलिए नहीं निकल सकी, क्योंकि तब कुछ राजनीतिक दलों का एक मात्र एजेंडा ही यह था कि यह विवाद अनसुलझा बना रहे, ताकि उनके संकीर्ण राजनीतिक हितों की पूर्ति होती रहे। उनके इस एजेंडे को पूरा करने में कुछ बुद्धिजीवी भी सहायक बने। आखिर यह किसी से छिपा नहीं कि प्रधानमंत्री चंद्रशेखर के कार्यकाल में जब आपसी बातचीत से अयोध्या मसले का हल निकालने के गंभीर प्रयास हो रहे थे, तब किस तरह कुछ इतिहासकारों ने एक पक्ष को सुलह की राह से हटने के लिए उकसाया। आज भी अगर मसला समाधान की तरफ बढ़ता दिखेगा, तो वे राजनीतिक दल इसमें अड़ंगा ही लगाएंगे, जो लंबे समय से इस मसले की आंच पर राजनीति की रोटियां सेंकते चले आ रहे हैं। ऐसे में अयोध्या मामले के सभी पक्षकार सुप्रीम कोर्ट की इस बात पर ध्यान दें, तो बेहतर रहेगा कि अगर मध्यस्थता के माध्यम से इस विवाद का हल निकलने की संभावना एक प्रतिशत भी है, तो ऐसा किया जाना चाहिए। ऐसा इसलिए किया जाना चाहिए, क्योंकि यह देश में सद्भाव को बल देगा और साथ ही दुनिया के लिए एक उदाहरण बनेगा कि जटिल मसले भी बातचीत से सुलझाए जा सकते हैैं। नि:संदेह इतिहास की भूलों को नहीं सुधारा जा सकता, लेकिन उनसे सबक लेकर भविष्य को बेहतर बनाया जा सकता है। मुस्लिम पक्षकारों को इस तथ्य पर खास तौर पर विचार करना होगा कि अयोध्या भगवान राम के जन्म स्थान के रूप में पूरी दुनिया में मान्य है। राम अयोध्या के पर्याय हैैं और साथ ही देश की अस्मिता के प्रतीक भी। अगर उनका मंदिर उनके जन्म स्थान पर नहीं बनेगा, तो और कहां बनेगा? अगर मुस्लिम इस साधारण से प्रश्न पर ईमानदारी से विचार करेंगे, तो नहीं लगता कि वे मंदिर का विरोध कर पाएंगे। इसके विपरीत, हिंदू पक्षकारों को मुस्लिमों को इसके लिए आश्वस्त करना पड़ेगा कि मथुरा और वाराणसी में वे वैसी स्थिति नहीं बनाएंगे, जैसी उन्होंने अयोध्या में बनाई थी। जो भी हो, लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अयोध्या विवाद के समाधान के लिए मध्यस्थता की सूरत बनेगी या नहीं। अगर ऐसी सूरत बनती है, तो फिर यह सुनिश्चित करना आवश्यक होगा कि मसले का समाधान जल्द हो। अयोध्या विवाद इस देश के सामाजिक ताने-बाने को बहुत नुकसान पहुंचा चुका है। इस विवाद का समाधान जितनी जल्दी हो, उतना ही ठीक रहेगा। यदि विवाद बातचीत से हल होने की सूरत न बने, तो सुप्रीम कोर्ट को सुनवाई प्रारंभ करनी चाहिए। यह केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार को सुनिश्चित करना चाहिए कि वे अदालत का फैसला हर हाल में लागू कराएंगी।

image
Copyrights @ 2017 Independent NewsCorp (P) Ltd., Bhopal. All Right Reserved