अयोध्या पर अधीरता दिखाने से बचें

By Independent Mail | Last Updated: Jan 11 2019 8:52PM
अयोध्या पर अधीरता दिखाने से बचें

अयोध्या विवाद की सुनवाई एक बार फिर टल गई है। अब सुप्रीम कोर्ट 29 जनवरी काे इसे सुनेगा। सुनवाई का टलना इस मामले के पक्षकारों के साथ ही उन लोगों के लिए भी निराशाजनक है, जो सदियों पुराने इस मसले के जल्द समाधान की प्रतीक्षा कर रहे हैं। लेकिन सच यह है कि उन्हें अधीर नहीं होना चाहिए। बहरहाल, इस बार सुनवाई इसलिए टली, क्योंकि सुन्नी वक्फ बोर्ड के वकील ने पांच सदस्यीय पीठ में न्यायामूर्ति यूयू ललित के शामिल होने को लेकर यह रेखांकित किया था कि एक वकील की हैसियत से वह तब कल्याण सिंह की पैरवी कर चुके हैैं, जब कल्याण को बाबरी मस्जिद ढह जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट में अवमानना का सामना करना पड़ा था। बेशक, वकील ने न्यायमूर्ति यूयू ललित को पीठ से हटाने की मांग नहीं की, लेकिन उन्होंने 1994 के इस मामले का जिक्र जिस तरह किया, वह कुल मिलाकर एक सवाल की तरह ही उभरा और जो सवाल उभरा, वह गलत भी नहीं था। लेकिन इसका अंतिम नतीजा यह निकला कि सुनवाई टल गई, क्योंकि न्यायमूर्ति यूयू ललित ने स्वयं को पीठ से अलग कर लिया, इसलिए नई पीठ के गठन के लिए सुप्रीम कोर्ट को वक्त तो खैर चाहिए ही था। लेकिन हिंदूवादी संगठनों का आरोप यह है कि अयोध्या मामले की सुनवाई को टलवाने की जान-बूझकर कोशिशें हो रही हैं। वे कह रहे हैं कि इसी कोशिश के तहत पहले यह दलील दी गई थी कि इस मामले की सुनवाई आम चुनाव के बाद होनी चाहिए। इसके बाद यह कहा गया कि पहले 1994 के उस मामले पर पुनर्विचार हो, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने यह व्यवस्था दी थी कि मस्जिद में नमाज पढ़ना इस्लाम का अभिन्न हिस्सा नहीं है। जब सुप्रीम कोर्ट ने इस पर विचार करने का फैसला किया, तो यह मांग की गई कि इस मामले की सुनवाई बड़ी बेंच करे। बेशक, अयोध्या विवाद को लेकर यह सब बातें हुई हैं। लेकिन यह सभी बातें भी सुनवाई का ही एक अंग हैं। इसकी अनदेखी निश्चित ही नहीं की जा सकती कि नवंबर-2018 अयोध्या विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में तारीख पर तारीख का ही सिलसिला कायम है। अभी यह कहना भी कठिन है कि 29 जनवरी को क्या होगा, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि यह सब अयोध्या मामले में ही हो रहा है। हमारे देश में अदालतों की गति बहुत धीमी जब है ही, तो अयोध्या का मामला रफ्तार कैसे पकड़ सकता है? हिंदूवादी संगठनों की दलील यह है कि अयोध्या का मामला उनकी भावनाओं से जुड़ा हुआ है, इसलिए इसका जल्द निपटारा होना चाहिए, लेकिन यह दलील ठीक नहीं है। चूंकि यह एक संवेदनशील मामला है, इसलिए इसकी सुनवाई बहुत धैर्य के साथ होनी चाहिए। न तो इस मामले पर आम जनता को अधीरता का प्रदर्शन करना चाहिए और न ही हिंदूवादी संगठनों को। आखिर, ये संगठन बहुत जल्दी में क्यों हैं? कहीं वे आम चुनाव से पहले ही तो इस विवाद को नहीं सुलझवाना चाहते? याद रखा जाना चाहिए कि यह मामला पिछले नौ साल से तो सुप्रीम कोर्ट में ही चल रहा है, लेकिन सुनवाई को लेकर जिस तरह का माहौल इस समय बनाया जा रहा है, वैसा इससे पहले कभी नहीं देखा गया। ऐसे में कुछ लोग अगर अयोध्या को चुनाव से जोड़ रहे हैं, तो उन्हें गलत नहीं कहा जा सकता। अदालत को इस मामले की सुनवाई धैर्य के साथ करनी चाहिए और धैर्य इस मामले के सभी पक्षकारों और आम लोगों को भी रखना चाहिए।

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