देर से आया एक दुरुस्त फैसला

By Independent Mail | Last Updated: Nov 1 2018 9:46PM
देर से आया एक दुरुस्त फैसला

31 साल बाद ही सही लेकिन मेरठ के हाशिमपुरा के बहुचर्चित हत्याकांड में दोषी उत्तर प्रदेश पीएसी के 16 जवानों को आखिरकार उम्रकैद की सजा सुना दी गई, दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा। इससे पहले वर्ष 2015 में दिल्ली की ही निचली अदालत ने संदेह का लाभ देते हुए इन सभी जवानों को बरी कर दिया था। हाशिमपुरा में दो मई, 1987 को एक डरावनी घटना हुई थी। उसमें आरोप लगा था कि पीएसी के जवानों ने हाशिमपुरा के 42 युवकों का अपहरण कर उनकी हत्या कर दी। दरअसल, अप्रैल 1987 में मेरठ में दंगों पर काबू पाने के लिये प्रोविंशियल आर्म्ड कॉन्स्टेबुलरी यानी पीएसी को बुलाया गया था, पर राजनीतिक विरोध के चलते उसे वापस बुला लिया गया। जब दंगों पर पुलिस काबू नहीं कर पाई और 10 लोगों की मौत हो गई, तो पीएसी को दुबारा तैनात करना पड़ा। दंगे की आग हाशिमपुरा तक पहुंच गई और वहां 22 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद पीएसी के 19 जवानों को हाशिमपुरा भेजा गया। आरोप है कि करीब 42 युवाओं को पीएसी ने गोली मारकर मुरादनगर के पास गंगनहर में फेंक दिया। यह मामला बाद में गाजियाबाद के ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट के सामने 1996 में पेश किया गया। वहां की सुनवाई से मृतकों के परिजन संतुष्ट नहीं हुए और उन्होंने सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी, जिसने मामला उत्तर प्रदेश से स्थानांतरित कर दिल्ली की तीस हजारी अदालत भेज दिया। इस अदालत ने 28 साल बाद फैसला दिया जिसमें सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया गया। इसी फैसले को दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग तथा घटना में जीवित बचे एक व्यक्ति समेत कुछ निजी पक्षों ने हाईकोर्ट में अपील दायर की थी। नि:संदेह घटनाक्रम के साक्ष्य जुटाना बेहद कठिन था। गंभीर आरोप एक सरकारी एजेंसी यानी पीएसी पर थे। सरकारी एजेंसियों के खिलाफ साक्ष्य एकत्रित करना बहुत कठिन माना जाता है, क्योंकि उनके खिलाफ जांच भी कुल मिलाकर कोई सरकारी एजेंसी ही करती है। यही कारण था कि निचली अदालत साक्ष्यों से संतुष्ट नहीं हुई और उसने सभी आरोपियों को संदेह का लाभ देकर बरी कर दिया था। उसने अपना निर्णय वर्ष-2015 में दिया था। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने उसके फैसले में सुधार कर दिया। इस मामले का रुख तब पलटा, जब घटना के समय पुलिस लाइन में तैनात पुलिसकर्मी रणवीर सिंह विश्नोई ने अतिरिक्त साक्ष्य के तौर पुलिस की जनरल डायरी हाईकोर्ट में पेश कर दी। इस डायरी में पीएसी के जवानों को हाशिमपुरा भेजे जाने, जिन जवानों को वहां भेजा गया था, उन सभी के नाम, इसके साथ ही उन्हें दिए गए शस्त्रों और गोलियों का विवरण दर्ज था। हाईकोर्ट ने इस डायरी को ही अहम साक्ष्य माना और इसी साल छह मार्च को अपना फैसला सुरक्षित कर लिया। अब पीएसी के दोषी सिपाहियों को जो सजा सुनाई गई है, वह तो हमारे सामने है ही। दोषियों की कुल संख्या 19 थी, जिनमें से तीन की मौत हो चुकी है। जिन 16 को सजा सुनाई गई है, वे सभी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। 31 साल की अवधि बहुत लंबी होती है। इसलिए यह कहने में तो कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि हाशिमपुरा के पीड़ितों को बहुत देर में न्याय मिला, लेकिन उन्हें न्याय मिल गया है। पीड़ित पक्ष को न्याय मिलने से आमजनता में न्यायपालिका के प्रति भरोसा और दृढ़ हुआ है। हमारी न्यायपालिका की चक्की चलती बहुत धीमे-धीमे है, लेकिन वह पीसती बहुत बरीक है। हाशिमपुरा के दोषी भी पिसने से बच नहीं सके।

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